फादर्स डे स्पेशल : रविन्द्र जाडेजा को आर्मी ऑफिसर बनाना चाहते थे उनके पिता

(File Photo: Surjeet Yadav/IANS)

दिव्यभास्कर को दिए एक अपने पहले साक्षात्कार में अनिरुद्धसिंह जडेजा ने अपने जीवन के कठिन पलों और जडेजा के सर जड़ेजा बनने के सफ़र के बारे में बताया

अगर क्रिकेट की दुनिया में वर्तमान समय और सर्वकालीनसबसे अच्छे हरफनमौला खिलाडी की बात होती हैं तो उस सूची में एक नाम अवश्य रहता है और वो नाम है रविन्द्र जडेजा। रवींद्र को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट ऑलराउंडरों में से एक माना जाता है। इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत का हाथ हैं जिसने उन्हें विकट समय में लड़ते रहने का जज्बा दिया। रवींद्र को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट ऑलराउंडरों में से एक बनाने में रविन्द्र के अलावा एक और इंसान ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई और वों हैं उनके पिता अनिरुद्धसिंह गुमानसिंह जडेजा!
फादर्स डे पर दिव्यभास्कर को दिए एक साक्षात्कार में अनिरुद्धसिंह जडेजा ने अपने जीवन के कठिन पलों और जडेजा के सर जड़ेजा बनने के सफ़र के बारे में बताया। अनिरुद्धसिंह जडेजा ने अपने सबसे कठिन पलों को याद करते हुए कहा "रवींद्र केवल 17 वर्ष के थे और उनकी माँ यानी मेरी पत्नी लता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उस समय, मैं घोर दुःख में था क्योंकि अभी एक बेटा और दो बेटियां बड़ी नहीं हुई थीं। रवींद्र की आँखों में कुछ सपने थे, मेरी आँखों में भी रविन्द्र के लिए कुछ सपने थे। लेकिन मैंने अपनी पत्नी लता की जगह और रविन्द्र के लिए अपने सपने यानी उसे आर्मी ऑफिसर की परीक्षा पास करने के बावजूद सैनिक बनाने के बदले क्रिकेटर बनने दिया। इसका कारण यह था कि लता का सपना रविन्द्र को क्रिकेटर बनाना था, जिसे मैंने साकार करने की पूरी कोशिश की।
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रवींद्र जडेजा के पिता द्वारा देश भर के किसी भी मीडिया को दिया गया यह पहला इंटरव्यू है। बच्चों के पालन-पोषण में पिता की भूमिका के महत्व को अपने संस्मरणों के साथ समझाते हुए, अनिरुद्ध सिंह ने दिव्य भास्कर को बताया कि जिस क्षण रविन्द्र की माँ का एक्सीडेंट हुआ, हमारी स्थिति वास्तव में गंभीर थी और कुछ भी समझ में नहीं आया। जब उनसे पुचा गया कि माँ के बिना बच्चे की परवरिश करना आपके लिए कितना मुश्किल था? तो अनिरुद्धसिंह ने बताया कि उनकी पत्नी उनके गोद में तीन बच्चों देकर गईं। उन्होंने कहा “आप समझ सकते हैं कि यह हमारे लिए कितना मुश्किल था। लेकिन संघर्ष के बिना कोई काम नहीं होता। मेरे पास कोई सरकारी या कोई अन्य नौकरी नहीं थी। हमारा पूरा परिवार बिना सहारे के रह गया। हमारा दिल जानता है कि हमने वो दिन कैसे बिताए।”
इसके बाद जब दिव्य भास्कर ने उनसे पूछा कि एक आदमी के लिए अपने बच्चों को माता-पिता दोनों को प्यार देना मुश्किल है, तो आपने इन दोनों कर्तव्यों को कैसे पूरा किया? इस पर अनिरुद्धसिंह ने बताया “रविन्द्र की माँ नहीं थी, इसलिए मैं ही अपने तीनों बच्चों का माँ था और मैं ही पिता। हमने कुछ भी कम नहीं होने दिया। मैं अपने बेटे की तरह ही अपनी बेटियों से बात करता था। अगर उन्हें कोई समस्या होती, तो हम बिना किसी झिझक के बात करके उसका समाधान करते। मेरे पास भी उनसे छिपाने के लिए कोई सवाल नहीं था और उनके लिए भी ऐसा ही था।
रविन्द्र के क्रिकेटर बनने की बात को लेकर उनके पिता अनिरुद्धसिंह ने बताया कि वो चाहते थे की रविन्द्र को सेना में एक वरिष्ठ अधिकारी बनाया जाए। इसके लिए मैंने रविन्द्र को आर्मी के एक ट्यूशन स्कूल में 6 महीने की ट्रेनिंग भी दी। ट्यूशन में अंतिम परीक्षा देने के बाद रविन्द्र ने इसे पास भी कर लिया। रविन्द्र सेना का अफसर बन गया होता लेकिन उसकी नियति थी उसे दूसरी जगह ले जाना। प्रवेश के लिए सैनिक स्कूल जाने से एक दिन पहले, रविन्द्र ने फैसला किया कि वह एक क्रिकेटर बनना चाहता है। हमने घर पर इस पर चर्चा की और फिर सभी ने फैसला किया कि वह क्रिकेटर ही बनेगा। उन्होंने बताया कि रविन्द्र की मां का भी यही सपना था कि रविन्द्र एक दिन भारतीय टीम के लिए क्रिकेट खेले। रविन्द्र ने बचपन से ही इसके लिए काफी मेहनत भी की थी और रविन्द्र ने छोटी उम्र में ही अपनी मां से कहा था कि वो एक दिन भारत के लिए क्रिकेट खेलेंगे। आज हम खुश और गौरवान्वित हैं कि रविन्द्र ने अपना वादा निभाया। पर दुःख की बात ये है कि ये सपना देखने वाली रविन्द्र की माँ रविन्द्र को टीम इंडिया के लिए खेलते हुए नहीं देख पाई।
अनिरुद्धसिंह ने जीवन के संघर्षों के बारे में बताया कि वो बचपन से ही रवींद्र को लेकर हर जगह जाते थे। उन्होंने बताया “उसे साइकिल चलाना पसंद नहीं था और मैं उसे साइकिल नहीं देना चाहता था। रविंद्र की मां लता नर्स का काम करती थीं, इसलिए हमारी आमदनी अच्छी थी और हम रोजी-रोटी कमा रहे थे। लेकिन उनकी मां के देहांत के बाद हमें काफी परेशानी हुई. हमने एक साल ऐसे ही बिताया क्योंकि कोई आय नहीं थी। अगर मैं अब उन दिनों को याद करूं तो सच कहूं तो हम अपनी किस्मत पर हंसते हैं।”
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क्रिकेटर के रूप में रवींद्र की पहली सफलता के बारे में उनके पिता अनिरुद्ध सिंह ने बताया कि लता की मृत्यु के एक साल बाद, रविन्द्र को अंडर -19 क्रिकेट विश्व कप टीम में चुना गया था। उनकी टीम ने विश्व कप जीता तो सभी खिलाड़ियों को 15 लाख रुपये का बोनस मिला। इसे हम अपनी भाषा में फीस या डोनेशन कहते हैं, लेकिन जब से उसे 15 लाख रुपये मिले, हमारी आर्थिक दिक्कतें दूर होने लगी हैं. उसके बाद, हमारी वित्तीय समस्याएं दूर होने लगीं। अनिरुद्धसिंह ने आगे बताया कि रवींद्र जडेजा को बनाने में उनकी सबसे बड़ी बेटी नयना का बड़ा हाथ है। नयना न होती तो रविन्द्र आज जहां हैं वहां नहीं पहुंचते। माँ के निधन के बाद रविन्द्र टूट गए और उन्होंने यह भी फैसला किया कि अब क्रिकेट नहीं खेलना चाहिए। ऐसे में नयना ने उन्हें मां का प्यार देकर बचा लिया। वह उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का बहुत ख्याल रखती। नयना रविन्द्र का किट तैयार करती थीं, कपड़े तैयार करती थीं, मोजे भी धोती थीं।
रविन्द्र के लिए अपने त्याग के बारे में अनिरुद्धसिंह ने बताया कि जब रविन्द्र का जन्म भी नहीं हुआ था तब मैं शादी के बाद 1997 में 5 से 7 साल तक रिलायंस में सुपरवाइजर के तौर पर काम कर रहा था। उसके बाद दूध डेयरी के साथ काम किया। तब रविन्द्र की मां एक सरकारी अस्पताल में नर्स की नौकरी कर रही थीं और परिवार चल रहा था. लेकिन एक दुर्घटना में रवीनी की मां की मौत के बाद उनकी आमदनी कम हो गई। लेकिन मुझे जो काम मिला वह मैंने किया।

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