इन तीन कारणों से ब्लैक फंगस ने लिया महामारी का रूप

(Photo Credit : Wikimedia Commons)

अन्य देशों की तुलना में भारत में मुकोरामायकोसिस के मामले ज्यादा

कोरोना महामारी के बीच एक और महामारी सामने आई है, जिसे ब्लैक फंगस या मुकोरामायकोसिस कहा जाता है। कई राज्यों ने इस बीमारी को महामारी घोषित कर दिया है। यह रोग उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पाया गया है। सवाल यह है कि कोरोना महामारी के बीच अचानक काले फंगस के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?
विदेशों में भी कोरोना का खूब आतंक था और इलाज के लिए स्टेरॉयड का भी खूब इस्तेमाल होता था, लेकिन काले फंगस के जितने मामले हमारे देश में नहीं थे, उतने कही और क्यों नहीं? फूड एंड ड्रग कंट्रोल फाउंडेशन और विशेषज्ञों ने सवाल किया है कि क्या हम ऑक्सीजन और आसुत जल के बजाय नल के पानी का उपयोग कर रहे हैं? क्योंकि इससे ब्लैक फंगस का खतरा भी बढ़ जाता है।
ऐसे में 3 बड़ी गलतियाँ सामने आई है जो इस बीमारी को तेजी से फैलाती हैं।
पहली गलती:
कोरोना संक्रमित रोगियों के अनुचित और असुरक्षित ऑक्सीजनकरण ब्लैक कवक के फैलने के प्रमुख कारणों में से एक है। जब ऑक्सीजन की कमी के समय ऑक्सीजन निर्माताओं ने उद्योगों के लिए मेडिकल ऑक्सीजन बनाया तो नियम लागू हुए ही नहीं। मेडिकल ऑक्सीजन औद्योगिक ऑक्सीजन की तुलना में अधिक शुद्ध होती है। लगभग 99.5 प्रतिशत शुद्ध। जिन सिलेंडरों में ऑक्सीजन रखी जाती है, उन्हें लगातार साफ किया जाता है। यह संक्रमण मुक्त होता है। साथ ही उच्च प्रवाह वाले रोगियों को यह ऑक्सीजन दिए जाने पर नमी की आवश्यकता होती है। इसके लिए इसे डिस्टिल्ड या जीवाणुरहित पानी से भरे कंटेनर से गुजारा जाता है। यह पानी जीवाणु रहित और शुद्ध होना चाहिए और प्रोटोकॉल के अनुसार इसे लगातार बदलना चाहिए।
भारत में ऑक्सीजन की कमी के कारण हम औद्योगिक ऑक्सीजन का उपयोग कर रहे हैं, जिसे ठीक से शुद्ध नहीं किया जा सकता है। हम यहां आर्द्रीकृत ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। साथ ही हो सकता है कि साफ पानी की जगह नल के पानी का इस्तेमाल किया जा रहा हो। या बोतल को ठीक से स्टरलाइज़ नहीं किया जा रहा हो।
ऐसे में यदि पानी साफ/ जीवाणुरहित नहीं हो और इसे बदला नहीं गया है, तो यह ब्लैकफंगस का कारण बन सकता है। खासकर तब जब मरीजों को लंबे समय से हाई फ्लो ऑक्सीजन दी जा रही हो। यदि बिना नमी के ऑक्सीजन दी जाती है, तो यह आवश्यक अंगों की रक्षा करने वाली श्लेष्मा झिल्ली को सुखा देगी और फेफड़ों की परत को नुकसान पहुंचाएगी। यह मल और लार को इतना गाढ़ा बना देगा कि इसे शरीर से बाहर निकालना मुश्किल होगा।
दूसरी गलती:
कोरोना के इलाज के दौरान स्टेरॉयड का इस्तेमाल सही समय पर करना चाहिए। यह केवल कोरोना के प्रभावों का प्रतिकार करता है, सीधे वायरस से नहीं। जब वायरस बढ़ रहा हो तो शुरुआती दौर में स्टेरॉयड देना खतरनाक है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होगी और वायरस को पनपने का मौका मिलेगा। मधुमेह के रोगी को समय से पहले और बिना कारण के स्टेरॉयड देने से उनका शुगर लेवल बढ़ जाएगा। जो कोरोना संक्रमण की गंभीरता और ब्लैक फंगस के प्रतिकूल प्रभावों को भी बढ़ा सकता है।
तीसरी गलती:
ब्लैक फंगस के उपचार और इसके उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एम्फोटेरिसिन बी का उपयोग एक अच्छी पहल है। लेकिन यह एम्फोटेरिसिन बी भी जहरीला होता है। ब्लैक फंगस की रोकथाम में उचित ऑक्सीजनकरण, सफाई, भंडारण और वितरण के दौरान गुणवत्ता नियंत्रण जरुरी है।
यह कवक हवा, नम स्थानों, मिट्टी आदि में पाया जाता है। स्वस्थ लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है लेकिन कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को ब्लैक फंगस होने का खतरा होता है।

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