अपनों का दर्द छिपाए घर से हुए पराए, वृद्धाश्रम बना वरदान

देश के कई प्रांत के बुजुर्ग विंध्याचल के वृद्धाश्रम में करते हैं निवास

अपनों का दर्द छिपाए घर से हुए पराए, वृद्धाश्रम बना वरदान

मीरजापुर, 14 मई (हि.स.)। परिवार दो प्रकार के होते हैं। एकाकी परिवार और संयुक्त परिवार। प्राचीन काल से ही संयुक्त परिवार की धारणा रही है। इसमें परिवार के सबसे बुजुर्ग को संबल प्रदान होता रहा है और उनके अनुभव व ज्ञान का लाभ बच्चे और युवा उठाते रहे हैं। संयुक्त पूंजी, संयुक्त निवास व संयुक्त उत्तरदायित्व के कारण घर के बुजुर्गों का प्रभुत्व होने के कारण परिवार में अनुशासन व आदर का माहौल हमेशा बना रहता था, लेकिन बदलते समय में तीव्र औद्योगीकरण, शहरीकरण, आधुनिकीकरण के कारण संयुक्त परिवार की परंपरा चरमरा गई है। यूं कहा जाए कि संयुक्त परिवार लगभग खत्म सा हो गया है। अब बुजुर्गों को आज के बच्चे अपने साथ रखना पसंद नहीं करते।

वृद्धाश्रम और उसमें रहने वाले बुजुर्गों की बढ़ती संख्या को देखने से लगता है कि आज की युवा पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच की खाई काफी गहरी हो गई है। इस खाई को पाटना बहुत जरूरी है, ताकि माता-पिता और बुजुर्गों का आशीर्वाद बच्चों को हमेशा मिलता रहे। बुजुर्गों की जब अंतिम विदाई हो तो उनके बच्चों के कंधों पर ही हो। हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उसकी अर्थी बच्चे के कंधे पर ही जाए।

मातृ देवो भवः पितृ देवो भवः, धरती पर माता-पिता ही असली देवी-देवता

विंध्याचल के पटेंगरा नाला स्थित वृद्धजन आवास (वृद्धाश्रम) के अधीक्षक संजय शर्मा ने बताया कि वृद्धाश्रम में रहने वाले सभी वृद्ध परिवार जैसे हैं। हम इनके बच्चे तो नहीं है, लेकिन इनके बच्चे से भी बढ़कर प्यार करते हैं और इनके अंदर अपने माता-पिता की छवि देखते हैं। इनकी सेवा अपने माता-पिता के रूप में ही करता हूं। कहा कि मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मुझे इतने ढेर सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिला है। मातृ देवो भवः पितृ देवो भवः...। धरती पर सही मायने में देखा जाए तो माता-पिता ही असली देवी-देवता के रूप में हमारे पास विराजमान हैं, लेकिन फिर भी हम उनको समझ नहीं पाते और जब तक हम समझते हैं तब तक वह मेरे पास नहीं होते।

बंगाल के अनाथ मदन को खींच लाईं मां विंध्यवासिनी, रोचक है कहानी

वृद्धाश्रम में रह रहे बंगाल निवासी वृद्ध मदन दत्तू ने बताया कि छह वर्ष की अवस्था में माता का स्वर्गवास हो गया था और आठ वर्ष की अवस्था में उनके पिता भी स्वर्गवासी हो गए। इसके बाद वे रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई जाने को निकल पड़े। उनके पास पैसे भी नहीं थे। उन्होंने हिम्मत जुटाकर बिना टिकट की यात्रा शुरू की तो प्रयागराज में उनको टीटी ने ट्रेन से उतार दिया। फिर दूसरी ट्रेन से वे मुंबई जाने लगे, लेकिन एक बार फिर शंकरगढ़ में दूसरे टीटी ने उन्हें ट्रेन से उतार दिया। इसके बाद वे वहां से वापस लौटने का इरादा कर लिए और दूसरी ट्रेन से वापस बंगाल के लिए निकल पड़े, लेकिन उनको विंध्याचल रेलवे स्टेशन पर एक टीटी फिर मिले और यहीं पर उन्होंने उतार दिया। कहा, तुम आगे नहीं जा सकते हो। दो दिन भूखा प्यासा रहने के बाद उन्होंने एक होटल में काम करने का मन बनाया और विंध्याचल के एक होटल संचालक ने उनको अपने यहां बर्तन वगैरह धुलने के लिए नौकरी पर रख लिया। उसके बाद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी यानी 50 वर्ष तक उसी होटल में रहकर काम किया। जब वृद्ध हो गए तो उनको होटल वाले ने हटा दिया। उस समय वे कहीं जाने लायक नहीं थे और न ही काम करने के लायक। इसी बीच एक फरिश्ते ने उनको सलाह दी कि आप वृद्धाश्रम में जाकर रहिए, वहां पर सारी व्यवस्थाएं मिलेंगी। इस समय वे दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं और उनका अपना परिवार यही वृद्धाश्रम है।

अब वृद्धाश्रम से घर जाने की नहीं होती इच्छा

वृद्धाश्रम के एक अन्य वृद्ध मीरजापुर निवासी कमला प्रसाद की भी कहानी दुःखद है। इनका एकमात्र पुत्र है, जो नशे का आदी है। वह नशे में घर आकर माता-पिता को बहुत परेशान करता है। पत्नी और बच्चों को भी प्रताड़ित करता है। इससे क्षुब्ध कमला प्रसाद घर छोड़कर तीन वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। वे यहां बहुत खुश हैं। वे कहते हैं कि अब यह वृद्धा आश्रम ही मेरा परिवार है। यहां से घर जाने की अब इच्छा नहीं होती।

वाह! रे जमाना, पुत्र अरब में और प्रोफेसर पिता वृद्धाश्रम में

बिहार के वैशाली जनपद के लालगंज स्थित एबीएस कालेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे डा. बालेश्वर सिंह की भी कहानी अत्यंत पीड़ादायक है। इनके एक पुत्र और दो पुत्रियां है। सभी की शादी हो गई। उनका पुत्र कुवैत (अरब) में रहता है। प्रोफेसर की पत्नी 25 वर्ष पहले ही गुजर गई थी। यह बिहार में अकेले रह रहे थे। एकाकीपन की वजह से मां विंध्यवासिनी धाम स्थित वृद्धाश्रम आ गए और यहीं रहने लगे। वे भी अब कहते हैं कि वृद्धाश्रम के लोग ही मेरे परिवार हैं।

घर जैसा ही है वृद्धाश्रम, किसी भी चीज की कमी नहीं

मीरजापुर निवासिनी कमला देवी दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रही हैं। एक समय था जब इनके पास किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन समय ने ऐसी करवट बदली कि इनके पास अब कुछ भी नहीं है। दो पुत्र हैं, लेकिन वह इस लायक नहीं कि उन्हें साथ रख सकें। वे वृद्धाश्रम में काफी खुश हैं और कहती हैं कि मुझे यहां किसी भी चीज की कमी नहीं है। यहां घर जैसा ही परिवार है।

वृद्धाश्रम के अलावा मेरा न कुछ पहले था और ना अब

बचपन से ही अनाथ बंगाल के बावड़ा निवासी रतन चैधरी मां विंध्यवासिनी धाम सहारा बना हुआ है। अब उन्होंने मां विंध्यवासिनी की आंगन में जगह बना ली है। उन्होंने बताया कि बचपन में ही उनके माता-पिता स्वर्गवासी हो गए। वे अपने माता-पिता को जानते तक नहीं हैं। किसी तरह गुजर-बसर करता रहा। पिछले चार वर्ष से वृद्धाश्रम की शरण में हूं। उन्होंने कहा कि वृद्धाश्रम के अलावा मेरा न कुछ पहले था और ना अब है।

कई आश्रमों में गया, लेकिन विंध्याचल का आश्रम अच्छा लगा

सोनभद्र निवासी कमलेश जायसवाल ने बताया कि उनके दो पुत्र हैं और पत्नी भी, लेकिन उनका व्यवहार मेरे साथ अच्छा नहीं था। काफी समय से खुद को प्रताड़ित महसूस कर रहा था। इस वजह से वृद्धाश्रम में आ गया। मैं वैसे तो कई आश्रमों में गया, लेकिन विंध्याचल के आश्रम में आने के बाद मुझे यहां पर बहुत अच्छा लगा। काफी सुकून महसूस करता हूं। यहां जो भी आ जाता है, फिर कहीं जाने का मन नहीं करता। हम लोग यहां पर एक परिवार की तरह रहते हैं।

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