गुजरात : अग्रेज हुकुमत के खिलाफ किसानों के हित में दो सपूत खड़े थे, जानें

गुजरात :  अग्रेज हुकुमत के खिलाफ किसानों के हित में दो सपूत खड़े थे, जानें

महात्मा गांधी जी ने भू-राजस्व एवं कर का भुगतान न करने के लिए किसानों को शपथ दिलाया था

किसान हित में खमीर खेड़ा का  अमूल्य योगदान रहा  
एडवोकेट केशवलाल मोतीलाल एजुकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित संस्थाएं एक विशाल प्रांगण  में स्थित हैं। जैसे ही इस  प्रांगण में प्रवेश करते है, इस मैदान के बीच में कीर्ति-स्तंभ आगंतुकों का ध्यान आकर्षित करती है।
ब्रिटिश शासन के दौरान 1917 में भारी बारिश के कारण दुकाल पड़ा था। सरकारी अधिकारियों ने अत्यधिक वर्षा के कारण दुकाल के मुद्दे को स्वीकार नहीं किया और बलपूर्वक किसानों से भू-राजस्व वसूल करना जारी रखा। किसानों के हित में दो सपूत खड़े थे। स्वर्गीय  मोहनलाल कामेश्वर पंड्या (प्याज चोर) और स्व.  शंकरलाल द्वारकादास पारिख (कठलाल का कायापलट करने वाले मुखसेवक) इन दोनों सेवकों ने ये प्रश्न उठाये और समाचार पत्रों में इस बात की खबर दी और इस प्रश्न को सरकारी अधिकारियों के सामने पेश किया। अंतत: तत्कालीन मुंबई विधान सभा में  गोकलदास पारेख और  विट्ठलभाई पटेल ने खेड़ा जिले के किसानों की शिकायतें प्रस्तुत कीं लेकिन सरकार ने हार नहीं मानी क्योंकि ब्रिटिश सरकार अपने अधिकारियों द्वारा भेजी गई रिपोर्ट को स्वीकार करने जा रही थी।  इससे अपेक्षित परिणाम नहीं निकला, इसलिए पूरे मामले व पूरी स्थिति का विवरण महात्मा गांधी को दिया गया। उन्होंने गुजरात सभा (उस समय के कांग्रेस) द्वारा सही परिस्थिति का आंकलन करने तथा कई स्थलों पर महात्मा गांधीजी स्वयं मंडली के साथ जाकर असलियत से वाकिफ हुए।  अगर सरकार लोगों की सच्चाई को मानने को तैयार नहीं है, तो नागरिक कानून के उल्लंघन के अलावा कोई इलाज नहीं है। यह खेड़ा सत्याग्रह 20-11-1917 से शुरू हुआ और 6-6-1918 को समाप्त हुआ।
इस सत्याग्रह के संबंध में 18-02-1918 को  महात्मा गांधी जी ने किसानों को भू-राजस्व का भुगतान न करने और कर का भुगतान न करने पर सरकार की सजा को हंसते-हंसते सहन करने का संकल्प दिलाया। इस प्रकार, सामूदायिक सत्याग्रह स्मारक स्तम्भ या सत्याग्रह स्मारक स्तम्भ का निर्माण गांधी स्मारक निधि दिल्ली द्वारा इस स्थान से होने वाले भारत के पहले सामुदायिक सत्याग्रह की स्मृति में किया गया है। इस स्तंभ का खार्तमुहूर्त समारोह गुजरात के सबसे युवा सरदार स्वर्गीय  चंदूलाल देसाई द्वारा किया गया था। 15-8-2019 को राष्ट्रीय पर्व के शुभ दिन पर किया गया। इस स्तंभ का अनावरण समारोह पूज्य सुशीलाबेन गणेश मावलंकरे द्वारा  12-1-1958 को किया गया।
स्तंभ की ऊंचाई 33 फीट है। पूरा खंभा पत्थर का बना है। स्तंभ के नीचे संगमरमर से तराशी गई पूर्व की ओर जुताई करते एक किसान का सुंदर दृश्य है। अन्य तीन दिशाओं में तीन भाषाओं गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में इस तरह के लिखे गये हैं।
1917 में भारी बारिश के कारण खेड़ा जिले में फसल खराब हो गई। किसानों की ओर से गुजरात सभा की मांग के बावजूद सरकार ने राजस्व के मामले में कोई राहत नहीं दी।  इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में टैक्स की लड़ाई शुरू हुई। हमारे देश में ऐसा पहला सामुदायिक सत्याग्रह 18-2-1918 को किसानों ने शपथ लेना शुरू किया।
स्तंभ के शीर्ष पर संगमरमर से बनी नंदी का प्रतीक है। किसान का सच्चा साथी वह बैल है जिसके बिना वह दौड़ नहीं सकता। इसके अलावा, नंदी शक्ति का प्रतीक है। अत: दर्शनीय होने के साथ-साथ इस स्तंभ का ऐतिहासिक महत्व भी है।
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