रोज़े का अर्थ मात्र भुखा-प्यासा रहना नहीं, और भी नियमों का करना होता है पालन


(Photo Credit : hindi.indiatvnews.com)

रमजान का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। यह महीना हर मुसलमान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह इस्लामी कैलेंडर के नौवें महीने में होता है। इस्लामिक धर्म के लोगों का मानना है कि रमज़ान के महीने में जन्नत यानी स्वर्ग के दरवाजे खुल जाते है और इस पवित्र महीने में हर दुआ पूरी होती है। यह भी कहा जाता है कि, यदि मुसलमान रमजान के महीने के महत्व को समझ जाता है, तो प्रत्येक मुसलमान यह चाहेगा कि रमजान एक महीने के लिए नहीं पूरे साल के लिए रहे।

बता दें कि, इस्लाम धर्म में रोजा को छोड़ने के लिए इसे गुनाह-ए-कबीरा माना जाता है। गुनाह-ए-कबीरा का मतलब इतना बड़ा पाप जिसमें कोई क्षमा नहीं है। इस्लामिक ग्रंथों में रोजा के बारे में कहा जाता है कि अल्लाह अपने बंधुओं से कहता है, रोजा केवल मेरे लिए है और रोज़ा का इनाम मैं स्वयं अपने बंदो को दुंगा।

(Photo Credit : thestar.com.my)

आपको यह भी बता दें कि इस्लाम में 7 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति के लिए रोज़ा रखना आवश्यक माना जाता है। हालांकि, 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बीमार और यात्रा करने वाले लोगों को रोज़े ना रखने की अनुमति दी गई है।

रोज़ा किन चीज़ों से टूटता है और किनसे नहीं:

पहली बात यह है कि, बहुत से लोग सोचते हैं कि रोजा रखने का मतलब केवल भूखे-प्यासे रहना है। लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है। बता दें कि, रोज़ा का मतलब सिर्फ खाने-पीने की वस्तुओं से दूर होना नहीं होता, बल्कि रोज़ा रखने के बाद व्यक्ति को इस्लाम में मना की गई हर चीज से दूर रहना पड़ता है।

खाने-पीने की चीजों से परहेज करने के अलावा आंख, नाक, कान और मुंह सभी चीजों का रोज़ा होता है। इसका मतलब यह है कि रोज़ा रखने के बाद कोई किसीकी बुराई नहीं कर सकता है और ना ही किसीका दिल दुखा सकता है। इस तरह रमज़ान के महीने में मुसलमान हर तरह की बुराइयों से पवित्र हो जाता है।

इसके अलावा, यदि व्यक्ति रोज़ा के दौरान गलती से कुछ खा लेता है या पी लेता है तो इससे उसका रोज़ा टूटता नहीं है।