900 साल पुराना इतिहास, कोहिनूर जिसके पास रहा उसका अंजाम बुरा!


नई दिल्ली। कोहिनूर अनमोल हीरा है लेकिन इसके साथ जुड़ा एक कड़वा सच ये भी है कि ये हीरा अभिशप्त है। कोहिनूर का ९०० साल पुराना इतिहास गवाह है कि वो जिस भी राजा या बादशाह के पास रहा, उसका अंजाम बुरा ही हुआ। कोहिनूर करीब ९०० साल पहले यानी सन ११०० के आसपास तेलंगाना में गोलकुंडा की खान में मिला था। उस वक्त इस चमकदार हीरे का आकार मुर्गी के अंडे के बराबर था और वजन करीब एक हजार कैरेट। गोलकुंडा की खान से निकाले जाने के बाद १४वीं शताब्दी की शुरुआत में ये हीरा काकतीय वंश के पास आया और इसी के साथ १०८३ ईस्वी से शासन कर रहे काकतीय वंश के बुरे दिन शुरू हो गए और १३२३ ईस्वी में तुगलक शाह प्रथम से लड़ाई में हार के साथ काकतीय वंश समाप्त हो गया। इसके बाद ये हीरा १३२५ से १३५१ ईस्वी तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा। उसके बाद ये चमकदार पत्थर कुछ साल तक तुर्को के पास भी रहा। तुर्कों के हाथ से निकलकर कोहिनूर १५वीं शताब्दी में भारत में मुगल वंश के संस्थापक बाबर के पास पहुंचा। इसके बाद करीब २०० साल तक ये हीरा अलग-अलग मुगल शासकों के पास रहा। शाहजहां ने इस हीरे को अपने शाही सिंहासन में जड़वाया था। १७३९ में पर्शिया के लुटेरे शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर धावा बोल दिया। उस वक्त मुगल सल्तनत की कमान मुहम्मद शाह रंगीला के हाथ में थी। कमजोर मुहम्मद शाह ने नादिर शाह के सामने घुटने टेक दिए और अपनी सारी दौलत उसे दे दी। साथ ही साथ कोहिनूर भी नादिर शाह के पास चला गया। जानकार बताते हैं कि हीरे की खूबसूरती और चमक देखकर नादिर शाह हैरान रह गया था। उसके मुंह से निकला ‘कोहिनूर’ (रोशनी का पहाड़)। उसी दिन से इस चमकदार हीरे का नाम कोहिनूर पड़ गया।
कोहिनूर को कब्जे में लेने के बाद नादिरशाह पर्शिया चला गया लेकिन ८ साल बाद ही उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद उसके वंशज कोहिनूर लेकर अफगानिस्तान भाग गए और कोहिनूर अफगानिस्तान के शहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास चला गया। फिर ये उसके वारिस शाह शुजा को मिला लेकिन उसका तख्तापलट दिया गया। १८३० में शाह शुजा कोहिनूर के साथ अफगानिस्तान से बच निकला और पंजाब पहुंचा और उसने कोहिनूर को पंजाब के राजा रणजीत सिंह को सौंप दिया। कोहिनूर को हासिल करने के कुछ ही साल के भीतर राजा रणजीत सिंह की तबीयत बिगड़ गई और १८३९ में उनका देहांत हो गया। इसी दौरान ब्रिटिश सरकार भारत पर अपना कब्जा जमा रही थी। उसने सिख साम्राज्य को भी अपने कब्जे में ले लिया। उस वक्त करीब ६ साल के रहे दिलीप सिंह को पंजाब का राजा घोषित कर दिया गया। इसके बाद १८५० में दिलीप सिंह को अंग्रेज अपने साथ ब्रिटेन ले गए। वहां ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की मौजूदगी में दिलीप सिंह ने कोहिनूर हीरे को तोहफे के तौर पर रानी विक्टोरिया को सौंप दिया। उस वक्त कोहिनूर का वजन था १९१ कैरेट यानी करीब ६५० साल के सफर में कोहिनूर एक हजार कैरेट से घटकर १९१ कैरेट का रह गया क्योंकि जिस राजा के पास ये पहुंचा उसने इसे अपनी मर्जी से तराशा और पॉलिश करवाया, जिससे इसका आकार घटता गया। जानकार बताते हैं कि पहली नजर में रानी विक्टोरिया को कोहिनूर कुछ खास पसंद नहीं आया। इसके बाद १८५२ में इसे फिर तराशा गया और पॉलिश कराया गया और जब दोबारा इसे रानी विक्टोरिया के सामने पेश किया गया, तब इस बेशकीमती हीरे का वजन सिर्फ १०५ कैरेट रह गया था। १०५ कैरेट का ये कोहिनूर फिलहाल ब्रिटेन की रानी के ताज में जड़ा हुआ है। कुछ जानकार बताते हैं कि १३०६ में संस्कृत में लिखी एक किताब में कोहिनूर का जिक्र मिलता है। इस किताब के मुताबिक इस हीरे को या तो भगवान धारण कर सकते हैं या कोई महिला। अगर कोई पुरुष इसे धारण करेगा तो उसका समूल नाश हो जाएगा। शायद अंग्रेज संस्कृत में लिखी इस इबारत से वाकिफ थे और उन्हें कोहिनूर का पुराना इतिहास भी मालूम था, इसीलिए उन्होंने इस हीरे को रानी विक्टोरिया के मुकुट में जड़वा दिया। साथ ही ये भी तय किया गया कि इस ताज को कभी भी कोई पुरुष नहीं पहनेगा। कोहिनूर के साथ एक अजीब सच्चाई ये भी जुड़ी है कि ये बेशकीमती हीरा कभी बिका ही नहीं। इसे या तो लूटा गया या तोहफे में दिया गया। बाबरनामा में इसकी खासियत बताते हुए लिखा गया है कि ये हीरा इतना महंगा है कि इसकी कीमत से पूरी दुनिया को ढाई दिन तक खाना खिलाया जा सकता है। होप डायमंड के नाम से मशहूर दुनिया के सबसे महंगे हीरे की कीमत ३५ करोड़ डॉलर है। होप डायमंड सिर्फ ४५.५२ कैरेट का है यानी कोहिनूर के आधे से भी कम।
झा/देवेंन्द्र/ईएमएस/११/फरवरीr/२०१६