रिक्शा चलाने वाला बना िंप्रसिपल


कपूरथला। कहते है कि संगत ही गुण उपजे, संगत ही गुण जाएं। ऐसा ही भूषण के साथ हुआ। वह नशे की उस अंधेरी दुनिया से बाहर निकला बल्कि दूसरों के लिए भी `मसीहा’ बन गया। खुद पढ़े, आगे बढ़े.. इतना कि कॉलेज में िंप्रसिपल तक बन गए। आज वह न जाने कितने गरीब और लाचार बचों की िंजदगी में तरक्की के रंग भरने में जुटे हैं। नशे के खिलाफ मुहिम भी छेड़ रखी है। भूषण पासवान ऐतिहासिक शहर सुल्तानपुर लोधी के तलवंडी चौधरिया पुल के पास ाqस्थत झुग्गी झोपड़ी में रहा करते थे। िंजदगी नर्वâ से बदतर थी, हरदम नशे में रहना शौक था। रिक्शा चलाकर जो कमाया, वह शराब और जुए में लुटा दिया। परिवार भुखमरी की कगार पर था। मां कलावती देवी किसी तरह लोगों के घर काम करके घर चलाती थीं। वह जो कुछ बचातीं, उसे भी भूषण उड़ा देता। िंजदगी बस चले जा रही थी, बिल्कुल बेमकसद..।
भूषण के साथ भी यही हुआ था। गलत लोगों के साथ ने शराबी बना दिया, मगर.. २००४ उनके लिए संजीवनी बनकर आया। एक रोज संत बलबीर िंसह सीचेवाल उसकी झुग्गी में पहुंचे। वहां आसपास के लोगों के साथ बैठक की। उन्हें प्रेरित किया बचों को क्यों नहीं पढ़ाते? हां, यह भी सलाह दी कि अगर उनके बीच ही कोई पढ़ा लिखा हो तो क्या कहने.. फिर क्या था, भूषण का नाम सभी की जुबां पर आया। पता चला, वह मैटिक पास है। बाबा ने उसे मिलने का वक्त देकर अपने पास बुलाया और लौट गए।
चूंकि, भूषण नशे के आदी थे। मां के कहने पर बमुाqश्कल बाबा के पास पहुंचे। यहां संत बलबीर िंसह सीचेलाल ने सवाल किया, क्या अपनी झुग्गी बस्ती के बचों को पढ़ाओगे..? भूषण असमंजस में पड़ गए। जुबां से चंद शब्द ही निकले-वादा नहीं करता, कोशिश करूंगा। इसके बाद १२ बचों संग काली बेई के किनारे पेड़ के नीचे क्लास शुरू कर दी। हालांकि, इस दौरान वह शराब का मोह नहीं छोड़ सके। यहां भी संत की संगत काम आई। संत सीचेवाल ने काउंसिंलग की तो भूषण ने मन पक्का कर लिया। प्रण किया, शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा। वही हुआ, भूषण ने पूरी तरह नशे से तौबा कर ली।