बेजोड़ नेता थे बाबू जगजीवन राम


5 अप्रैल को जन्म दिवस पर विशेष
-मनोहर पुरी
राजनीति में धुरन्धर राजनेता होने के साथ बेजोड़ प्रशासक होने को मणि कंचन संयोग ही कहा जा सकता है। ऐसे ही राजनेता और प्रशासक थे बाबू जगजीवन राम जिन की प्रशासकीय क्षमता को उनके विरोधी भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे। स्वतंत्र भारत में डॉ भीमराव अंबेडकर के पश्चात बाबू जगजीवन राम ही एक मात्र ऐसे नेता हुए हैं जिन्हें दलित वर्ग ने एक स्वर से अपना मसीहा स्वीकार किया। भारतीय राजनीति में आम जनता के आदमी के रूप में तेजस्वी और प्रतिभाशाली नेता जगजीवन राम वह व्यक्ति थे जिन्होंने दलित समाज को वह सब सुविधाएं उपलब्ध करवाई जिन का सपना डॉ अंबेडकर ने अपने जीवन काल में देखा था। बाबू जी ने ही शिक्षा में अधिक प्रतिष्ठित पदों पर आरक्षित लोगों को नियुक्त करने के लिए आरक्षण तय किया। उन्हीं के अथक प्रयासों से भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान हो सका। यह आरक्षण केवल दस वर्ष की अवधि के लिए ही किया गया था परन्तु बाबू जी इसकी अवधि को अपने विशेष प्रयासों से पचास वर्षों तक बढ़वाते रहे। उनके निधन के बाद भी यह प्रावधान आज भी लागू हैं।
स्वंतत्रता से पूर्व हरिजनों को कृषि भूमि पर स्वामित्व का अधिकार नहीं था। हरिजन निरन्तर जमींदारों और जगीरदारों द्वारा उत्पीडित किए जाते थे। उनसे बेगार ली जाती थी। बाबू जी ने सरकार द्वारा यह प्रावधान करवाया कि जो हरिजन जिस जमीन को मजदूर के रूप में जोतता है उसे ही उसका मालिकाना हक दे दिया जाए। बाबू जी के प्रयासों के फलस्वरूप लाखों हरिजन भूस्वामी बन गए। उनकी विलक्षण कार्य क्षमता को पहचानते हुए ही कांग्रेस ने महात्मा गांधी के सम्मुख उन्हें एक विश्वसनीय नेता के रूप में प्रस्तुत किया। कुछ लोगों का मत है कि बाबू जगजीवन राम को डॉ अंबेडकर की साख को कम करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने उभारा था। वास्तविकता यह है कि अपनी प्रतिभा और कार्य क्षमता के बल पर वह १९३६ से लेकर १९८६ तक हर चुनाव में निरन्तर विजयी होते रहे और १९४६ के पश्चात उनके निधन तक देश में गठित प्रत्येक मंत्रीमंड़ल में उन्हें महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित किया जाता रहा।
दलितों एवं शोषितों के सच्चे प्रतिनिधि बाबू जगजीवन राम का जन्म बिहार के एक छोटे से गांव चंदवा में शोभी राम नामक दलित के निर्धन परिवार में ५ अप्रैल १९०८ को हुआ। अभी उनकी आयु मात्र छ: वर्ष की ही थी जब उनके पिता का निधन हो गया। उनकी विधवा माता ने अत्यंत गरीबी की स्थिति में रहते हुए उनका लालन पालन इस ढंग से किया कि एक दिन उनका बेटा देश का एक प्रमुख राजनीतिज्ञ ही नहीं बना बल्कि उप प्रधान के पद तक जा पहुंचा। इसे उनका दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि एक से अधिक अवसरों पर वह देश के प्रधान मंत्री बनते बनते रह गए। उनकी शिक्षा के लिए ईसाई मिशनरियों ने निर्धन माता को कई प्रकार के प्रलोभन दिए परन्तु उन्होंने संघर्ष करते हुए अपने ही बलबूते पर बेटे को शिक्षित किया। दसवीं की परीक्षा पास करने के पश्चात जगजीवन राम ने बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय में प्रवेश लिया। यहां पर उन्हें बिरला छात्रवृति प्रदान की गई। १९३१ में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.एससी. की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।
कलकत्ता के विद्यासागर विद्यालय में विद्याध्ययन करते हुए ही वह सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेने लगे। इसी सन्दर्भ में वह सुभाष चन्द्र बोस, डॉ विधान चन्द्र राय,जवाहर लाल नेहरू और प्रपुâल्ल चन्द्र घोष के सम्पर्वâ में आए। उन्होंने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया और पुलिस के उत्पीडन के शिकार भी बने। अखिल भारतीय दलित वर्ग के सम्मेलन में उनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा। देखते ही देखते वह दलित वर्ग का भली भान्ति नेतृत्व करने लगे। जीवन को सुख सुविधामय बनाने के लिए नौकरी करने की अपेक्षा वह अपने उत्पीड़ित समाज की उन्नति और गुलाम भारत को आजादी दिलवाने का लक्ष्य अपने सामने रख कर स्वतंत्रता संग्राम में वूâद पड़े। अपने बलबूते पर ही वह १९३६ में बिहार विधान परिषद के सदस्य चुने गए परन्तु सिंचाई उपकर के मुद्दे पर उन्होंने त्याग पत्र दे दिया। बाद में वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए।
बाबू जी १९४० के असहयोग आन्दोलन और १९४२ के भारत छोड़ों आन्दोलनों में सक्रियता से भाग लेने के कारण लंबे समय तक जेल में रहे। यहां पर उन्हें तरह तरह की यातनाएं सहनी पडीं। सन् १९४६ में कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया। इस मंत्रीमंडल में बाबू जी को वैâबिनेट स्तर के मंत्री के रूप में श्रम विभाग के मुखिया के तौर पर सम्मिलित किया गया। बाबू जी १९५२ तक देश के श्रम मंत्री रहे। इतना ही नहीं इस मंत्रीमंडल में वह सबसे कम आयु के मंत्री थे। संविधान निर्मात्री सभा में भी बाबू जी को अनेक महत्वपूर्ण समितियों का सदस्य बनाया गया। १९५६ में उन्हें रेल मंत्री बनाया गया। इसके बाद तो उन्होंने विभिन्न विभिन्न विभागों का बहुत ही कुशलतापूर्वक संचालन करके प्रशासन के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी। आम जनता भी यह मानती थी कि जिस मंत्रालय का दायित्व बाबू जगजीवन राम अपने कंधों पर उठायेंगे उसमें किसी प्रकार की समस्या होगी ही नहीं। बाबू जी के नाम के साथ यह बात भी जुड़ गई थी कि वह उचित समय पर उचित कदम उठाते हैं और जिस के साथ बाबू जी का समर्थन होता है वही राजनीति में सफलता प्राप्त करता है।
इंदिरा गांधी को भारत के प्रधान मंत्री के पद पर बिठाने में बाबू जगजीवन राम का महत्वपूर्ण योगदान रहा। १९६९ में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तब बाबू जी ने सिंडिकेट के विरोध में श्रीमती इंदिरा गांधी का समर्थन किया। इसके बदले में उन्हें इंदिरा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। १९७१ में जब भारत की पूर्वी सीमा पर बंगलादेश नामक एक नए राष्ट्र का उदय हुआ तब बाबू जी देश के रक्षा मंत्री थे और उनके कुशल नेतृत्व के कारण ही पाकिस्ताान के एक लाख सैनिकों ने आत्म समर्पण किया।
१९७७ में बाबू जी ने हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ मिल कर अपनी नई पार्टी बनाई जिसका नाम कांग्रेस फॉर डेमोव्रेâसी रखा गया। इस दल ने जनता पार्टी के साथ मिल कर चुनाव में कांग्रेस को पराजित करके केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार का गठन किया। मोरार जी देसाई इस सरकार के प्रधान मंत्री बने और बाबू जगजीवन राम को उप प्रधान मंत्री बनाया गया। बाबू जी एक जातिविहीन और लोकतांत्रिक हिन्दू समाज की कल्पना को साकार करने में जीवन भर लगे रहे। उनका मानव की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था। अपने इन्हीं मूल्यों को समाज में स्थापित करने का प्रयास करते हुए ६ जुलाई १९८६ को वह परलोक सिधार गए।