बुधिया को भुला दिया जमाने ने


भुवनेश्वर। चार वर्ष की छोटी उम्र में बिना रुके ६५ दौड़ने वाले खिताबधारी बुधिया िंसह को लगता है ़जमाने ने भुला दिया है। कभी बुधिया पर बनी िंहदी फिल्म `दुरंतो’ को ६३वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया था। लेकिन रियो ओलाqम्पक की तैयारी कर रहे भारत के धावकों के बीच बुधिया कहीं नहीं है. बुधिया ने `लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस’ में जगह बनाई थी, लेकिन आज वह ओडिशा की गलियों में गुमनाम जीवन जी रहा है।
`दुरंतो’ फिल्म में दर्शाया गया कि वैâसे महज चार साल का बच्चा एक सितारा बन गया और फिर अचानक गिर कर कहीं गुम हो गया। ओडिशा के एक गरीब परिवार में २००२ को जन्मे बुधिया को उसकी मां ने एक व्यक्ति को मात्र ८०० रुपए में बेच दिया। इसके बाद जूड़ो-कराटे के एक कोच बिरांची दास ने उसे गोद ले लिया।
बिरांची ने बुधिया को मैराथन धावक बनाने के लिए उसकी प्रतिभा को प्रशिक्षण देकर तराशा। उनके ही मार्गदर्शन का नतीजा था कि चार वर्ष की उम्र में उसने इतना बड़ा करिश्मा कर दिखाया। बुधिया का मैराथन दौड़ के लिए दिया जाने वाला प्रशिक्षण ओडिशा सरकार के बाल कल्याण विभाग को रास नहीं आया और उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाकर उसे भुवनेश्वर के खेल छात्रावास में भेज दिया। हालांकि, वह अब भी ओिंलपिक पदक जीतने का इच्छुक है। चंद्रशेखरपुर के डीएवी विद्यालय में आठवीं कक्षा के छात्र बुधिया को पढ़ाई पूरी करनी है और इसलिए वह केवल एक घंटे अभ्यास करता है। उसकी मां सुकांती िंसह की भी राज्य सरकार के खेल प्रशासन के खिलाफ यहीं शिकायत है।