नौकरी कर रही पत्नी को भी गुजारा भत्ते का हक : अदालत


नई दिल्ली (ईएमएस)। एक अहम फैसले में नई दिल्ली की एक अदालत ने पति को अपनी पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्णय दिया कि अगर पत्नी कहीं नौकरी भी कर रही है, फिर भी वह उस जीवन स्तर और स्टेटस की हकदार है, जो उसे अपने वैवाहिक गृह में हासिल था। इस मामले में एक पति ने अपनी पूर्व पत्नी को 1.4 लाख रुपये गुजारा भत्ता देने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी।
अपने फैसले में अडिशनल सेशन जज सुरेश कुमार गुप्ता ने कहा कि अपने वैवाहिक गृह को छोड़ने के बाद एक महिला कई तरह की सुरक्षा से वंचित हो जाती है। कोर्ट ने कहा, ‘ कभी-कभी उसकी जीवन से दिलचस्पी खत्म हो जाती है। पति से मौद्रिक लाभ उसे कुछ राहत देता है। भले ही वह अपने पैतृक गृह में रह रही हो, फिर भी उसके कुछ खर्च होते हैं। उसे दिन-रात लगातार बच्चे की देखभाल करनी पड़ती है। इस स्थिति में उसे वह सहायता नहीं मिलती है, जो वैवाहिक गृह में रहते समय मिलती थी।’
दंपती का विवाह भारत में हुआ था जिसके बाद वे सिंगापुर चले गए थे। आपसी मतभेद के बाद पत्नी ने अपने पति पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाया और जून, 2011 में भारत लौट आई। एक सितंबर, 2014 को दोनों का तलाक हो गया जिसके बाद पत्नी ने सिंगापुर के कोर्ट में गुजारे भत्ते के लिए केस कर दिया लेकिन वहां के कोर्ट ने पत्नी की याचिका को खारिज कर दिया। वापस भारत आने पर पत्नी ने जब यहां के ट्रायल कोर्ट में केस किया तो कोर्ट ने गुजारा भत्ते के तौर पर पत्नी को 1 लाख रुपये और उनके नाबालिग बच्चे के गुजारा भत्ते के तौर पर 40,000 रुपये देने का आदेश दिया।
पति ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सेशन कोर्ट में चुनौती दी। पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी बिजनस एडमिनिस्ट्रेशन में पोस्टग्रेजुएट डिग्री होल्डर है। वह काफी क्वॉलिफाइड है और उससे ज्यादा कमा सकती है। पति ने यह भी दलील की कि सिंगापुर में दिल्ली के मुकाबले दोगुना ज्यादा खर्च है। उसकी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा उसकी रोजाना की जरूरतों को पूरा करने में खर्च हो जाता है। उसने अपने खर्च और वित्तीय देनदारी का भी ब्योरा दिया। लेकिन, कोर्ट ने पति की दलीलों को नहीं माना। कोर्ट ने कहा, ‘याचिकाकर्ता सिंगापुर में अपने खर्च को डॉलर में दिखाने में नाकाम रहा है इसलिए अंतरिम गुजारा भत्ते के लिए उसके डॉलर में मिलने वाले वेतन पर विचार किया जा सकता है।’
पत्नी की पैरवी कर रहे ऐडवोकेट प्रशांत मेंडिरत्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने दलील दी कि अगर पत्नी कमा भी रही है तो उसे अपने पति से गुजारा भत्ते के दावे से वंचित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, ‘बच्चे को भी उसी स्टैंडर्ड को पाने का हक है जो उसे पिता के साथ रहने के दौरान मिलता था या उसके साथ रहने की स्थिति में मिलता। पत्नी अपने वैवाहिक गृह में अपने बच्चे के रहने के साथ जिस लाइफ स्टैंडर्ड को पा सकती थी, उसके लिए उसकी आमदनी पर्याप्त नहीं है।’