‘नारियल’ का पौराणिक महत्व


नई दिल्ली । वैसे तो लगभग सभी धार्मिक अनुष्ठानों में नारियल फल का भोग लगाया जाता है लेकिन यह फल अपना पौराणिक महत्व भी रखता है। नारियल का वानस्पतिक नाम ‘कोकोस् नूकीपेâरा’ है। पं.बंगाल में नारियल को नारिकेल कहते हैं। नारियल का वृक्ष केरल, पं.बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र और गोवा के तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है। िंहदू पौराणिक ग्रंथो के अनुसार नारियल की पृथ्वी पर उत्पत्ति का श्रेय ऋषि विश्वामित्र को जाता है। एक बार राजा सत्यव्रत की इच्छा हुई कि वो पृथ्वी लोक से स्वर्गलोक जाएं। स्वर्गलोक की सुंदरता के बारे में वह अपने कवियों और ग्रंथों में काफी कुछ सुन और पढ़ चुके थे। लेकिन वहां वैâसे पहुंचा जाए, उन्हें मालूम नहीं था। समय बीतता गया। कुछ वर्षों बाद ऋषि विश्वामित्र तपस्या के लिए जब घर से दूर गए, तब उनके आश्रम की जिम्मेदारी राजा सत्यव्रत ने संभाली। कुछ समय बाद ऋषि लौट कर आए और राजा सत्यव्रत को आश्रम की देख-रेख के लिए धन्यवाद कहा। उन्होंने राजा से वर देने का वचन दिया। राजा को अपनी भूली-बिसरी याद वापस याद आ गई। राजा बोले, ‘मुनिवर मुझे स्वर्गलोक जाने का वरदान दीजिए।’ ऋषि विश्वामित्र ने अपने तप से र्अिजत शक्तियों से धरती से आसमान तक स्वर्ग के लिए मार्ग बनाया। राजा उस मार्ग पर चलते हुए स्वर्ग लोक पहुंचने वाले ही थे कि, ‘देवराज इंद्र ने उन्हें पीछे की ओर धकेल दिया।’
राजा सत्यव्रत पृथ्वी पर आ गिरे। उन्होंने अपनी आप-बीती ऋषि विश्वामित्र को सुनाई। ऋषि यह सुनकर क्रोधित हो गए। वह स्वर्ग लोक पहुंचे, वहां स्वर्ग के राजाओं से मिलें और आपसी सहमति से दूसरे स्वर्ग लोक के निर्माण करने का आदेश देकर वह धरती पर लौट आए। देवताओं और ऋषि के बीच तय हुआ कि यह स्वर्गलोक पृथ्वी और स्वर्गलोक के बीच में ाqस्थत होगा, ताकि देवी-देवताओं और मनुष्य दोनों को कोई कठिनाई न उठानी पड़े। राजा सत्यव्रत प्रसन्न थे, लेकिन इस कार्य के सूत्रधार ऋषि विश्वामित्र िंचता में डूबे हुए थे। ऋषि की िंचता थी कि कहीं स्वर्गलोक के बीच में होने के कारण नया स्वर्गलोक हवा के तेज बहाव से डगमगा न जाए। यदि ऐसा हुआ तो नया स्वर्गलोक धरती पर गिर जाएगा। तब ऋषि विश्वामित्र ने ही धरती पर खंभे का निर्माण किया। यह खंभे पेड़ के रूप में थे। इन खंभों ने नए स्वर्गलोक को सहारा दिया। कहते हैं कि यह लंबे खंभे एक पेड़ बन गए और राजा सत्यव्रत का सिर एक फल बन गया। पेड़ को नारियल का पेड़ और राज के सिर को नारियल कहा जाने लगा।