दुनिया में सबसे ़ज्यादा आत्महत्या के मामले भारत में


नई दिल्ली। आत्महत्या, खुदकुशी एक डरावना शब्द। इस शब्द के सुनते ही आंखों के सामने मौत का भयावह दृश्य नजर आने लगता है। भले ही ये मनचाही मौत हो, लेकिन खौफ कम नहीं होता। हँसते-खेलते जीवन को अपनी मर्जी से खत्म कर देने के लिए हिम्मत की जरुरत होती है। लेकिन जब इंसान पूरी तरह हार जाता है तो उसके सामने मौत के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। हताश, परेशान और खुद से हार चुका इंसान अंत में मौत को चुन लेता है। ऐसे में ये जानना जरुरी है कि आखिर क्यों इंसान मौत को चुन लेता? जो आंकड़े हम बता रहे हैं वो बयां करते हैं कि आखिर किस तरह से देश में आत्महत्या की भावना बढ़ती जा रही है? क्यों युवा इस मानसिकता का शिकार बन रहा हैं? आंकड़े हैरान करने वाले हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई है…विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे ़ज्यादा आत्महत्या के मामले भारत में हो रहे हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो भारत में साल २०१२ में २,५८,०७५ लोगों ने आत्महत्या की। इनमें पुरुषों की संख्या ़ज्यादा है, जिन्होंने अपनी जान ली है।एनसीआरबी के नए आंकड़े के मुताबिक, २०१४ में हर घंटे आत्महत्या करने वाले १५ लोगों में से १० पुरुष हैं।२०१४ में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पाqश्चम बंगाल, कर्नाटक और तेलंगाना में ही कुल आत्महत्या मामलों में से ५१.१ फीसदी मामले दर्ज किए गए।एनसीआरबी के तुलनात्मक आंकड़े भी बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की दर विश्व आत्महत्या दर के मुकाबले बढ़ी है। भारत मे ३७.८ फीसदी आत्महत्या करने वाले लोग ३० वर्ष से भी कम उम्र के है। जबकि ४४ वर्ष तक के लोगों में आत्महत्या की दर ७१ फीसद तक बढ़ी है।एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष २०१४ में अपने जीवन का खुद अंत करने वालों में ६५.९ फीसदी विवाहित थे, जबकि २१.१ प्रतिशत ऐसे थे, जो शादी के बंधन में नहीं बंधे थे। खुदकुशी करने वालों में १.४ प्रतिशत लोग या तो तलाकशुदा थे या किसी वजह से अपने जीवनसाथी से अलग रह रहे थे।मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक भरत के लोगों में सहनशक्ति नहीं रह गई हैं। मानसिक रुप से वो कमजोर हो गए हैं। लोगों में तेजी से सब कुछ हासिल करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी है। ऐसे में जब वो उसे हासिल नहीं कर पाते तो टूट जीते हैं और घातक रास्ता चुन लेते हैं।
-बातचीत खत्म
परिवार में संवाद ख्तम हो गया है। आपस में बात करने के बजाए लोग टीवी और मोबाईल में गुम होने लगे हैं। माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं बचा है। बच्चे एकांत जीवन जीने लगते हैं और जब परिाqस्थति विषम होती है तो खुद की कठिन पैâसले लेकर अप ने जीवन का अंत कर बैठते हैं।
-एकांत जीने की आदत
आज का आत्मकोqन्द्रत युवा अपने सिवा किसी को देख ही नहीं रहा है। वह अपने दुख-तकलीफों को ही बहुत बड़ा मान लेता है। कोई उससे यह पूछने वाला नहीं है कि उसके भीतर क्या चल रहा है। पैâसले लेने में असमर्थ ये वर्ग कठिन वक्त में गलत कदम उठा लेता है। डिप्रेशन आत्महत्या का मुख्य वजह है। शहर के साथ गांव के लोग भी डिप्रेशन का शिकार हो रहे है। ़खास करके युवा और किसान, जिसकी वजह से आत्म हत्या के आंकड़े बढे है।