ऑनलाइन गेम व चैटिंग का नशा खतरनाक


नई दिल्ली । इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में ऑनलाइन गेम व चैटिंग का नशा बच्चों और युवाओं के लिए कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदाजा दिल्ली के दो सगे भाइयों की कहानी से लगाया जा सकता है। जो इंटरनेट की लत और ऑनलाइन गेम के नशे में ऐसे चूर हुए कि अपना सुधबुध ही खो बैठे। न खाने की चिंता न नहाने की। धीरे-धीरे वे ऐसी मानसिक बीमारी से ग्रसित हो गए कि पैंट में शौच हो जाने पर भी इंटरनेट पर ऑनलाइन गेम खेलना बंद नहीं करते थे। दो बार तो उनके घर में रहते हुए लूट हो गई, लेकिन दोनों भाइयों ने ऑनलाइन खेल जारी रखा। वे घर-परिवार, पढ़ाई-लिखाई यहां तक कि खुद का ख्याल रखना भी भूल गए और उनकी दुनिया इंटरनेट तक सिमट कर रह गई। भारत में इंटरनेट एडिक्शन (इंटरनेट की लत) का यह सबसे विचित्र मामला है। हाल ही में यह अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है। यह मामला प्रकाश में आने के बाद डॉक्टरों का कहना है कि इंटरनेट एडिक्शन नाम की बीमारी बच्चों व युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। यह डिजिटल होते भारत के लिए बड़ी चेतावनी है। बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल करने, घंटो ऑनलाइन गेम व चैटिंग करने पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले दिनों में परिणाम ज्यादा घातक होंगे। डॉक्टर कहते हैं कि सोशल साइट पर घंटो चैटिंग करने व पढ़ाई ठीक से नहीं करने की शिकायत लेकर कई माता-पिता अपने बच्चों का इलाज कराने के लिए आते हैं। लेकिन दोनों भाइयों का मामला बहुत दुर्लभ है। दोनों भाइयों का इलाज करने वाले मनोचिकित्सक डॉ अंकुर सचदेवा (अभी ईएसआईसी अस्पताल फरीदाबाद में कार्यरत) ने कहा कि उनके माता-पिता सरकारी नौकरी में अच्छे पद पर हैं। वे अपने दोनों बेटों को लेकर इलाज के लिए आरएमएल अस्पताल पहुंचे थे। तब एक की उम्र २२ और दूसरे की १९ साल थी। उनका बड़ा बेटा इंजीनियरिंग दूसरे वर्ष का छात्र था और छोटा १२वीं क्लास में पढ़ता था।
घर में इंटरनेट का कनेक्शन होने के चलते उन्हें ऑनलाइन गेम खेलने की लत लग गई। शुरुआत में वे दो से चार घंटे ही खेलते थे, लेकिन धीरे-धीरे वे प्रतिदिन १४ से १८ घंटे तक ऑनलाइन गेम खेलने में ही व्यस्त रहने लगे। दोनों पढ़ने में बहुत तेज थे, लेकिन दो साल से ऑनलाइन गेम का नशा ऐसा चढ़ा कि वे क्लास में फेल कर गए। चिड़चिड़ापन होने लगा। वे दिन-रात गेम में ही व्यस्त रहते थे। रोकने पर अपने माता-पिता के साथ गालीगलौज व मारपीट भी करते थे और उन्हें कमरे में बंद कर देते थे। ऑनलाइन गेम में दिक्कत यह है कि उसे बीच में छोड़ने पर गेम पूरा नहीं हो पाता। ऐसे में वे दिन-रात का फर्क भूल गए। उनके व्यवहार में ऐसा बदलाव आया कि खेलते समय उनके पैंट में शौच हो जाता था। वे कई दिनों तक कपड़ा नहीं बदलते थे, खाना नहीं खाते थे, कोई फोन पिक नहीं करते थे और खेल जारी रखते थे। घर में कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश भी कर जाए तब भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। दो बार उनके घर में लूट हो गई और वे कमरे में खेलते रहे। वे एक महीने तक आरएमएल अस्पताल में भर्ती रहे। इसके अलावा डॉक्टरों ने छह महीने तक उनका फालोअप किया। डॉक्टरों ने उनका चिड़चिड़ापन दूर करने और पूरी नींद लेने के लिए दवाएं दी। इसके अलावा उन्हें जब भी गेम खेलने की बेचैनी होती तो उन्हें कम समय वाला वीडियो गेम खेलने का मौका दिया जाता। तब जाकर उनके व्यवहार में दोबारा बदलाव आया और पढ़ाई लिखाई भी शुरू की। डॉ सचदेव ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। बच्चे, युवा यहां तक कि हर उम्र के लोग इंटरनेट पर चैटिंग, ऑनलाइन गेम व शॉपिंग करते हैं। कई लोगों को ऑनलाइन शॉपिंग में भी मजा आता है और बेवजह की खरीदारी करते रहते हैं। यह भी इंटरनेट एडिक्शन का कारण बन रहा है।