NSG : चीन को उसी की ‘भाषा’ में समझाने में जुट मोदी, किया रूस को फोन


नई दिल्ली। एनएसजी ग्रुप के लिए भारत को अमेरिका के सपोर्ट पर चीन ने रविवार को कहा- इस मुद्दे पर अभी काफी मतभेद है। इस पर रजामंदी बनाने के लिए बातचीत किए जाने की जरूरत है। यह देखना पड़ेगा कि सेंसिटिव न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी तक पहुंच को कंट्रोल करने के लिए किन देशों को मेन ग्रुप में शामिल किया जा सकता है और किन्हें नहीं। बता दें कि अमेरिका NSG ग्रुप में इंडिया की मेंबरशिप के फेवर में है, जबकि चीन इसका कड़ा विरोध कर रहा है।चीन का दावा है कि 48 देशों के इस ग्रुप में भारत को शामिल किए जाने को लेकर न्यूजीलैंड, टर्की, साइथ अफ्रीका और ऑस्ट्रिया के डिप्लोमेट भी अपना प्रोटेस्ट रजिस्टर्ड करा चुके हैं। एनएसजी में इंडिया की एंट्री का विरोध कर रहे देश मानते हैं कि इंडियन को मेंबर बनाए जाने के लिए न्यूक्लियर वेपन और इन्हें बनाने में यूज होने वाले आइटम के फैलाव को रोकने के लिए बने NPT (नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) के नियमों की अनदेखी की जा रही है।’ चाइना की फॉरेन मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन हॉन्ग ली ने कहा कि इंडिया ऑटोमेटिक वेपन डेवलप कर रहा है। उसने अभी तक NPT (नॉन प्रोलिफिरेशन ट्रीटी) पर साइन नहीं किए हैं। जो एक अहम पैक्ट है।  ली ने कहा है कि NPT पर साइन कर चुके कंट्रीज के बीच इंडिया की एंट्री को लेकर ‘लार्ज डिफरेंसेज’ हैं। ‘चीन किसी नॉन NPT सिग्नेट्री कंट्री को एनएसजी में शामिल किए करने के मसले पर पहले आम रजामंदी बनाए जाने के फेवर में है।’ ली ने कहा कि NPT पर सिग्नेचर करना ही NSG में एंट्री करने का एक लीगल और पॉलिटिकल तरीका है। ‘चीन इंडिया की एनएसजी मेंबरशिप को लेकर सिओल में होने वाली मीटिंग में आम रजामंदी बनाने पर बातचीत किए जाने की कोशिश करेगा।’ बता दें कि चीन, पाकिस्तान की आड़ लेकर भारत की एनएसजी में एंट्री का विरोध कर रहा है। पाक और चीन का तर्क है कि NPT पर साइन किए बिना भारत एनएसजी की मेंबरशिप कैसे हासिल कर सकता है?  चीन के विरोध के बावजूद माना जा रहा है कि NSG कंट्री की 24 जून को सिओल में होनी वाली प्लेनरी मीटिंग में मेंबरशिप को लेकर फैसला हो सकता है।
 भारत का तर्क है कि एनएसजी की मेंबरशिप के लिए एनपीटी पर साइन करना जरूरी नहीं है। भारत ने इसके लिए फ्रांस का एग्जाम्पल भी दिया था। अमेरिका के अलावा जापान, मेक्सिको और स्विट्जरलैंड ने भी भारत को सपोर्ट करने की बात कही है। वियना मीटिंग में यूएस फॉरेन मिनिस्टर जॉन कैरी ने मेंबर कंट्रीज को लेटर लिखकर भारत को सपोर्ट करने की बात कही थी। माना जा रहा है कि अमेरिका, स्विट्जरलैंड और मेक्सिको के सपोर्ट के बाद भारत को एनएसजी की मेंबरशिप मिल सकती है। मोदी की अमेरिका विजिट के दौरान वॉशिंगटन में भारत-अमेरिका के ज्वाॅइंट स्टेटमेंट के मुताबिक, “दोनों लीडर भारत की मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) में एंट्री को बेहतरी के रूप में देखते हैं। प्रेसिडेंट ओबामा एनएसजी मेंबरशिप को लेकर भारत की एप्लिकेशन का वेलकम करते हैं। “अमेरिका इस बात को दोबारा कन्फर्म करता है कि भारत मेंबरशिप के लिए तैयार है। हम दूसरे देशों से भी अपील करते है कि इस महीने होने वाली NSG प्लेनरी की मीटिंग में वे भारत को सपोर्ट करें।” एनएसजी ग्रुप मई 1974 में भारत के न्यूक्लियर टेस्ट के बाद बनाया गया था और इसकी पहली बैठक नवंबर 1975 में हुई।- भारत के टेस्ट से साबित हुआ कि कुछ देश, जिनके बारे में माना जाता था कि उनके पास एटमी वेपन्स बनाने की टेक्नोलॉजी नहीं है, वो इसे बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं। एनएसजी ऐसे 48 देशों का ग्रुप है, जिनका मकसद न्यूक्लियर वेपन्स और उनके प्रोडक्शन में इस्तेमाल हो सकने वाली टेक्नीक, इक्विपमेंट्स, मटेरियल के एक्सपोर्ट को रोकना या कम करना है।
 1994 की एनएसजी गाइडलाइंस के मुताबिक कोई भी सप्लायर कंट्री उसी वक्त ऐसे इक्विपमेंट्स के ट्रांसफर की परमिशन दे सकता है, जब उसे इत्मिनान हो कि ऐसा करने पर एटमी वेपन्स का फैलाव नहीं होगा।
एनएसजी की वेबसाइट के मुताबिक इसकी गाइडलाइंस NPTs के अनुकूल हैं।एनएसजी गाइडलाइंस की प्रोसिडिंग्स हर मेंबर देश के नेशनल लॉ और वर्किंग प्रॉसेस के मुताबिक होता है। इस ग्रुप में फैसले आम रजामंदी के आधार पर होते हैं। सभी फैसले एनएसजी प्लेनरी बैठकों में होते हैं। हर साल इसकी एक बैठक होती है