आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर मुकेश को याद कीजिये….


(PC : youtube)

आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस है। आप जानते ही हैं, 31 मई को हर साल दुनिया भर में लोगों को तम्बाकू सेवन से होने वाले नुकसान के बारे में जागरुक किया जाता है। लोगों से कहा जाता है कि….

तंबाकू छोड़िये, स्वस्थ रहिये।
गुटखा, धूम्रपान, तम्बाकू कैंसर के कारण हैं, अभी छोड़िये।

आंकडों पर ध्यान दें तो तम्बाकू सेवन से हर साल १० लाख मौतें होती हैं। 12 करोड़ भारतीय अब भी धूम्रपान करते हैं, 44% भारतीय एक या दूसरे प्रकार से तंबाकू का सेवन करते हैं, 16 से कम आयु के 24% बच्चे भी तंबाकू सेवन कर चुके हैं। सूरत शहर की ही बात करें तो एक या दूसरे प्रकार से तम्बाकू का सेवन करने के कारण आज 5 हजार लोग मुंह के कैंसर का ईलाज करा रहे हैं।

अगर धूम्रपान छोड़ दिया जाए तो 30 से 50% तक फेफड़े के कैंसर का खतरा घट जाता है। एक सिगरेट का कश लेने से 11 मिनट की जिंदगी कम हो जाती है।

आंकड़े सब जानते हैं। तम्बाकू का सेवन करने वाले या सिगरेट का धूंआ उड़ाने वालों को सबकुछ पता होता है कि वो जो काम कर रहे हैं उससे उनको कितना नुकसान हो सकता है। सिगरेट और तम्बाकू के पैकेट्स पर भी बड़े अक्षरों में इसके सेवन से होने वाले खतरों के विषय में लिखा होता है, अब तो फोटो भी छपने लगी है। लेकिन पता नहीं क्यों इससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। फर्क तो उस मुकेश को भी नहीं पड़ा था, जिसे आप भी पहचानते हैं।

क्या कौन मुकेश? याद नहीं आया?

थोड़ा जोर दीजिये अपने दिमाग पर। थियेटर में आप फिल्म देखने तो जाते ही होंगे? और जब कोई फिल्म शुरू होती तो सबसे पहले मुकेश ही तो आता है परदे पर। जी हां, मुकेश हराने जिसे आपने कई बार देखा है। अब तो मुकेश हराने तम्बाकू निषेध अभियान का चेहरा ही बन गया है।

सरकारी विज्ञापन में जिस मुकेश हराने की कहानी बताई गई है, उसे आज तम्बाकू निषेध दिवस पर याद किया जाना चाहिये। महाराष्ट्र के भुसावल का रहने वाला एक गरीब परिवार का बेटा जिसे मां बार-बार तम्बाकू नहीं खाने के लिये टोका करती, लेकिन युवा मुकेश बात सुनी-अनसुनी कर देता। एक दिन उसे मुंह में कैंसर की बीमारी का पता चला, मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में उसका ‌ईलाज चला और साल भर में ही 27 अक्टूबर 2009 को उसकी मृत्यु हो गई।

आपने तो विज्ञापन में अस्पताल के बिस्तर पर नाक में नली लगाये टूटी-फूटी आवाज में कहते सुना ही होगा कि मैंने एक साल गुटखा चबाया, अब मुझे कैंसर हुआ है, मेरा ऑपरेशन हो रहा है, शायद अब मैं इसके आगे बोल नहीं सकूंगा।

 

सरकार ने तम्बाकू सेवन से होने वाले नुकसान पर जागरुकता फैलाने के लिये विज्ञापन-फिल्म बनाने का फैसला किया तो इसी मुकेश के परिजनों से उसके नाम और चेहरे का उपयोग करने की अनुमति मांगी। परिवार ने अनुमति दे दी। मुकेश का भाई मंगेश कहता है कि जब भी मैं परदे पर यह विज्ञापन देखता हूं, भाई की दास्तां सुन कर दिल भर आता है।

लेकिन एक विडंबना यह भी है कि लोग बड़े बेपरवाह होते हैं। बार-बार ‌थियेटर के परदे पर यह विज्ञापन देखते-देखते वे ऐसे आदि हो गये कि एक समय बाद जैसे ही परदे पर अस्पताल के बिस्तर पर लेटा बीमार मुकेश दिखाई देता है, लोग उसका एक ‘हीरो’ की तरह सीटी मारकर स्वागत करते हैं। वहीं कुछ लोग उसका मजाक उड़ाते।

जो लोग तम्बाकू का सेवन या स्मोकिंग नहीं करते उनको इस विज्ञापन से काफी परेशानी होती। फिल्म देखने जाते हुए जो मुड लोगों ने बनाया होता, उसका कचरा हो जाता। सच तो यह है कि ये विज्ञापन लोगों को जागरूक करने के लिये बनाया गया लेकिन हर फिल्म के पहले इसे देख-देख कर लोग अब बोर हो चुके हैं। इन विज्ञापनों से कितना फायदा हुआ होगा यह अलग मसला है लेकिन मुकेश हर घर तक पहुंच चुका है।

हम तो इतना ही कहेंगे कि मुकेश वाला विज्ञापन आपको जैसा भी लगे, लेकिन उसमें दिखाये गये संदेश को याद रखिये, गुटखा – तम्बाकू – सिगरेट छोड़ दीजिये।