जानिये दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध-क्षेत्र सियाचीन की खास बातें जहां रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जा रहे हैं!


(PC : defencelover.in)

केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सोमवार को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध-क्षेत्र सियाचीन ग्लेशियर की यात्रा पर जा रहे हैं। उनके साथ सेनाध्यक्ष जनरल बीपिन रावत भी मौजूद रहेंगे। बता दें कि सियाचीन ग्लेशियर की सबसे ऊंची चोटियों पर तापमान शून्य से 50 डिग्री कम तक रह सकता है। राजनाथ सिंह सियाचीन में तैनाम भारतीय जवानों से मुलाकात करेंगे और उनका हालचाल जानेंगे।

सियाचीन के लिये रवाना होने से पूर्व रक्षामंत्री ने ट्वीट करके कहा कि वे नई दिल्ली से लद्दाख के लिये रवाना हो गये हैं। पूरे दिन का कार्यक्रम है। सियाचीन में जवानों से भेंट करने का अवसर मिलेगा। शाम को श्रीनगर में भारतीय जवानों से भी मुलाकात होगी।

राजनाथ सिंह से पहले भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी सियाचीन का दौरा कर चुके हैं।

बता दें कि सियाचीन ग्लेशियर हिमालय की काराकोरम की पूर्वी पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है। भारत और पाकिस्तान की लाईन ऑफ कंट्रोल का यह आखिरी छोर है। काराकोरम का यह 76 किमी सबसे लंबा ग्लेशियर है जो समुद्र से लगभग १९ हजार फुट की ऊंचाई पर है। १९८४ से संपूर्ण सियाचीन ग्लेशियर और उसके सभी महत्वपूर्ण पास भारत के नियंत्रण में हैं। उधर ग्लेशियर के पश्चिम में सेल्टोरो रीज नामक क्षेत्र पाकिस्तान के नियंत्रण में है जो भारत की १०० से अधिक पोस्ट से लगभग ३ हजार फुट नीचे है। वहां का मौसम कितना विषम रहा करता होगा इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकत है कि सर्दिंयों में यहां का तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे तक चला जाता है और औसत हिमवर्षा लगभग 35 फुट तक की होती है।

सियाचीन में ऑपरेशन मेघदूत

समग्र सियाचीन क्षेत्र पर भारत और पाकिस्तान दोनों दावा करते हैं। लेकिन १९८४ में भारत ने ऑपरेशन मेघदूत चलाकर समग्र सियाचीन ग्लेशियर पर अपना कब्जा हासिल कर लिया। १९८४से १९९९ के बीच भारत और पाकिस्तान के बीच इस क्षेत्र में कई छोटे-मोटे संघर्ष होते रहे। बता दें कि इस क्षेत्र में कब्जा करने के लिये पाकिस्तान ऑपरेशन अबाबील चलाने वाला था जिसकी भनक भारत को लग गई और जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तानी ऑपरेशन के सिर्फ एक दिन पहले भारत ने ऑपरेशन मेघदूत लॉंच करके क्षेत्र में अपना परचम लहरा दिया।

सियाचीन के हालात कितने विषम हैं इसका संकेत इसी बात से चल जाता है कि यहां सैनिक-संघर्ष में उतने जवानों की मौत नहीं हुई है जितने मौसत की विषमताओं की वजह से मरे हैं।ऑपरेशन मेघदूत के लॉंच होने से लेकर वर्ष २०१५ तक सियाचीन क्षेत्र में मौसम एवं पर्यावरण संबंधी विषमताओं में भारत ने ८६९ जवान खोए। यह जानकारी लोकसभा में एक लिखित बयान में तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री राव इन्दरजीत सिंह ने दी थी। भारत और पाकिस्तान की ओर से हजारों सैनिक इस क्षेत्र में तैनात किये जाते रहे हैं, जो सामरिक दृष्टि से यहां के महत्व को दर्शाता है। बता दें कि १९८४ से पहले यहां किसी भी देश की सैनिक उपस्थिति नहीं थी।

सियाचीन में सैनिकों के अलावा कोई मानव-बस्ती नहीं है। सबसे नजदीकी गांव भारतीय बेज कैम्प से १० माईल नीचे वार्षी है। २०१२ में भारतीय सेनाध्यक्ष बिपीन रावत ने कहा था कि भारतीय सेना को इस क्षेत्र में सामरिक दृष्टि से महत्व को देखते हुए नियंत्रण बनाये रखना होगा। साथ ही भारतीय जवानों ने सियाचीन के लिये काफी खून बहाया है, इस दृष्टि से भी यह हमारे लिये मायने रखता है।

यहां के ग्लेशियर के पिघलने से उपजने वाला पानी भारत के लद्दाख क्षेत्र में बहने वाली नूबरा नदी का मुख्य स्त्रोत है, जो आगे चलकर श्योक नदी में मिलता है। श्योक नदी आगे ३००० किमी के बाद इन्डस नदी में तब्दिल हो जाती है जो पाकिस्तान के लिये पेयजल और सिंचाई के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

जानकारों का मानना है कि सियाचीन में सैनिक बस्ती के कारण पिछले कुछ वर्षों में यहां बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ी है और ग्लेशियर की ऊंचाई घटी है। यहां सैनिक अड्डे और पोस्ट के‌ निर्माण के लिये की जाने वाली कैमिकल ब्लास्टिंग भी इसका एक कारण है। भारत ने २००१ में २५० किमी लंबी तेल पाईपलाईन स्थापित की जिसके मारफत बैज़ कैम्प तक केरोसिन और ऐवियेशन ईंधन सप्लाय किया जा सके। भारतीय सेना ने क्षेत्र में स्वच्छता कायम रखने के लिये ‘ग्रीन सियाचीन, क्लिन सियाचीन’ अभियान भी चलाया हुआ है। क्षेत्र में हिम तेंदूए और भूरे भालू जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं।

क्षेत्र में भारतीय दबदबा प्रमाणित करने के लिये सितम्बर २००७ से सेना ने चुनींदा पर्वतारोही अभियानों को इजातत भी दी है, जो यह दर्शाने के लिये है कि समग्र पर्वत श्रृंखला पर भारतीय नियंत्रण है और पर्वतारोही अभियानों के लिये भारत को किसी की मंजूरी की जरूरत नहीं है।

खैर, आज जब भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सियाचीन पहुंच रहे हैं, कम से कम वहां तैनात भारतीय जवानों को निसंदेह बल और हौसला मिलेगा।