डांग के जंगलों से पलायन कर तेंदूओं ने सूरत के जंगलों को बनाया डेरा


प्रतिकात्मक तस्वीर। (PC : Wikipedia)

डांग के जंगलों में दशकों ने तेंदुओं की बस्ती रही है। लेकिन वहां जंगलों की कटाई और पानी की किल्लत के चलते इस जंगली बिल्ली ने अपना नया डेरा खोज लिया है। जी हां, डांग के जंगलों से पलायन कर तेंदुओं ने सूरत के वरेली गांव के आसपास के जंगल और खेतों को अपना डेरा बना लिया है। नजदीक से गुजरने वाली तापी नदी में पेयजल की इनकी आवश्यकता की भी पूर्ति हो जाती है। लेकिन इस इलाके में तेंदुए की बढ़ती आबादी से स्थानीय गांव वासी परेशान हैं।

वरेली और आसपास के इलाकों में गन्ने की खेती के कारण तेंदुओं को छुपने के लिये सुरक्षित जगह मिल जाती है। इसी का लाभ उठाकर वे क्षेत्र के पालतू जानवरों को अपना शिकार बनाते हैं। क्षेत्र के निवासियों पर हमलों की वारदातें भी प्रकाश में आत रही हैं। इसी के चलते वन विभाग नियमित रूप से यहां पिंजरे लगाकर तेंदूओं को पकड़ कर दूर जंगलों में छोड़ता रहा है। पिछले पांच वर्षों में यहां से बीस तेंदुओं को इसी तरह पकड़ा गया है। क्षेत्र के एक खेत में तो जंगली जानवर पकड़ने का पिंजरा स्थायी रूप से लगा दिया गया है। पिछले रविवार को भी एक तेंदुए को पकड़ा गया था। पिछले पांच वर्षों में इस एक खेत से ही दस तेंदूए पकड़े जा चुके हैं।

युसुफ माकडा का था खेत

रविवार को जिस खेत से तेंदुआ पकड़ा गया उसके मालिक हैं युसुफ मकडा। वे तेंदुए की मौजूदगी से इस हद तक परेशान हो चुके थे कि उन्हांने अपना खेत ही बेच दिया। उनसे खेत खरीदने वाले सोहेल शेख और जुनैद शेख केले, गन्ने और सब्जियों की खेती करते हैं। वहां उन्होंने मुर्गी पालन और फिर बकरी और मवेशी पालन में भी हाथ आजमाया, लेकिन तेंदुओं के आतंक के कारण पशुपालन छोड़ दिया।

शेख बंधुओं ने एक अंग्रेजी अखबार को बताया था कि तेंदुए के हमलों के कारण मुर्गी, बकरी और मवेशियों के पालन में असफल होने के बाद, आखिरकार उन्होंने घोड़ों को पालना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि घोडों की सुरक्षा के लिये विशेष बाड़े बनाये गये हैं जिसमें तेंदूओं की पहुंच न बन पाए। इतना ही नहीं खेतों में काम करने वाले श्रमिकों पर भी हमले हुए हैं। लेकिन अब उनके लिये यह आम बात हो गई है। अब वे तेंदुओं को देखकर डरते नहीं। सुरक्षा के लिये लाठियां रखते हें।

तेंदुओं के आतंक के कारण क्षेत्र से कुत्ते, मोर आद जानवरी भी गायब हो गये हैं। खतरों को भांप कर वे भी इस जंगल एरिया के गांवों वरेली, पटनी, गवाची, खारोली, पिपरिया और कोसाडी से पलायन कर चुके हैं। वन विभाग के अनुसार २०१६ की गिनती में मांडवी, महुवा और उमरपाडा तहसील में ४० तेंदुए पाये गये थे। अब उनकी संख्या और बढ़ी है। इस जंगली बिल्ली पर नजर रखने के लिये वन विभाग उनके शरीर पर माइक्रो चीप लगाने की योजना बना रहे हैं जिससे उन्हें लोकेशन की जानकारी उन्हें मिलती रहे। तेंदुए जैसे-जैसे पिंजरों के माध्यम से पकड़े जाते रहेंगे उन पर चीप लगाते रहेंगे। विभाग ने जंगल में जगह-जगह पेयजल के स्त्रोत भी बनाये हैं जिससे पानी की खोज में ये जानवर गांवों में न आएं।

तेंदुआ सफारी बनाने की योजना

तेंदुओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए प्रशासन अब पर्यटन के विकास की संभावनाओं को तलाश रहा है। ५० वर्ग किमी के क्षेत्र में इस सफारी के लिये प्लान बनाकर सरकार को दिया जायेगा। इसकी अनुमानित लागत १४ करोड़ रुपये है। खैर, उम्मीद करते हैं कि वन विभाग की सक्रियता से मांडवी तहसील के आबादी वाले इलाकों में तेंदूओं की समस्या दूर हो पाए।