आखिर चंद्राबाबू नायडू भारत भ्रमण कर क्यों रहे थे, अपने घर में तो सफाया हो गया!


(Photo: IANS/PIB)

लोकसभा चुनाव 2019 की मतगणना जारी है और राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी के फिर से प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रुप में अपने बूते स्पष्ट बहुमत के 272 आंकड़े को पार कर गई है। वहीं एनडीए गठबंधन के रूप में अपने 300 के लक्ष्य को पार कर दिया है। इन रुझानों के बीच सबसे चौंकाने वाला परिणाम आंध्रप्रदेश से आया है। यहां तेलगूदेशम के नेता और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू का लभगभ सफाया हो गया है।

यह लिखे जाने तक आंध्रप्रदेश की कुल 25 लोकसभा सीटों पर चंद्राबाबू नायडू की तेलगूदेश केवल एक सीट पर आगे चल रही है जबकि वायएसआर कांग्रेस शेष सभी 24 सीटों पर बढ़त बनाये हुए हैं।

उधर विधानसभा चुनाव के रूझान दिखा रहे हैं कि 173 सीटों में से जगन रैड्डी की 142 सीटों पर आगे है, जबकि तेलगूदेशम केवल 29 सीटों पर आगे है।

प्रश्न यह उठता है कि जब अपने खुद के गृहराज्य में चंद्राबाबू नायडू की राजनीतिक हालत इतनी पतली थी, तो पिछले पखवाड़े से वे क्यों भारत भ्रमण कर रहे थे। बता दें कि भाजपा को दोबार सत्ता में आने से रोकने के लिये चंद्राबाबू नायडू प्रमुख विपक्षी दलों के साथ बैठकें कर रहे थे। शायद उन्होंने देश का कोई ऐसा क्षेत्रीय दल नहीं छोड़ा जिसके नेता से उन्होंने जाकर मुलाकात न की हो। नायडू ने जहां कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी से मुलाकात की वहीं वे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती, तृणमुल कांग्रेस की अध्‍यक्ष ममता मुखर्जी, एनसीपी नेता शरद पवार से मिले। इतना ही नहीं तमाम विपक्षी नेताओं को लेकर चुनाव आयोग के दरवाजे खटखटाये और विपक्षी एकता का पूरा ढिंढोरा पिटा। लेकिन सच्चाई तो यह है कि उनकी इतनी राजनीतिक ताकत ही नहीं थी कि वे अपने राज्य से बाहर निकल कर राष्ट्रीय स्तर पर अपने आपको किंग मेकर की भूमिका में प्रस्तुत कर सकते।

चंद्राबाबू नायडू शायद अब एनडीए से अलग होने के लिये पछता रहे होंगे। नरेन्द्र मोदी का साथ छोड़कर वे उन्हें ही सबक सिखाने के चक्कर में स्वयं को इतना कमजोर कर चुके हैं कि राज्य की राजनीति से भी दूर हो गये हैं।

खैर, अब तो नतीजे स्पष्ट हैं। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में दोबार एनडीए की सरकार बन रही है और कह सकते हैं 2014 से भी मजबूत सरकार बन रही है। विपक्ष को अब केवल सशक्त विरोधी दल की भूमिका निभाने तक ही सीमित रहना पडेगा।