मसूद अजहर पर लगाम भारत का पहला एजेंडा


नई दिल्ली । पठानकोट हमले ने पाक सर्मिथत आतंकवाद को लेकर भारत के नजरिए में भी थोड़ा बदलाव ला दिया है। भारत और पाक के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की अगली बैठक में मुंबई हमले के मास्टर माइंड हफीज सईद नहीं बाqल्क जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर मुख्य तौर पर बातचीत के वेंâद्र में होगा। भारत की खुफिया एजेंसियां स्वीकार करने लगी हैं कि अजहर के मंसूबे ज्यादा खतरनाक हैं। यही वजह है कि अजहर और पठानकोट पर हमला करने वाले उसके गुर्गों के खिलाफ सुबूत जुटाने में इस बार मुंबई हमले जैसी गलतियां नहीं दोहराई जा रही हैं। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक जैश कमांडर अजहर पाकिस्तान के आतंक की दुनिया में सिर्पâ कश्मीर का कार्ड खेलता है, यही उसका यूएसपी है। अपनी कश्मीर रणनीति को लेकर ही अजहर को इस बात का पूरा भरोसा है कि उस पर चाह कर भी पाक सरकार की तरफ से ज्यादा दबाव नहीं बनाया जा सकेगा। कश्मीर मुद्दे से जुड़ी पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई अजहर मसूद को पिछले डेढ़ दशक से छिपा कर रख रही है। इस दौरान कभी कभार ही वह सार्वजनिक तौर पर सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव में जब लश्कर-ए-तैयबा का नेटवर्वâ सुस्त पड़ने लगा तब आईएसआई ने अजहर की टीम को फिर से िंसचित करना शुरू किया है। इस बात की सूचना मिली है कि जैश के लड़ाकों को अफगानिस्तान में शुरुआती प्रशिक्षण दिया गया है और फिर उन्हें भारत पर हमला करने के लिए गुलाम कश्मीर में अंतिम प्रशिक्षण दिया गया।
अजहर ने हाल के हमलों के जरिए आइएसआई के समक्ष यह साबित किया है कि वह भारत में हमले के लिए अब ज्यादा तैयार है। यही डर भारतीय एजेंसियों को है कि वह कश्मीर में आतंकवाद का दौर नए सिरे से शुरू करने की कोशिश न करे। ऐसे में भारत की रणनीति यही होगी कि पाकिस्तान जैश की सारी गतिविधियों पर जल्द से जल्द लगाम लगाने की व्यवस्था करे। इसके लिए भारत सुबूत जुटाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा। सूत्रों के मुताबिक मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान को सबूत देने में कई तरह की गड़बड़ियां हो गई थीं जिसे इस बार नहीं दोहराया जा रहा है। मसलन, तब महाराष्ट्र पुलिस की रिपोर्ट को पहले गृह मंत्रालय भेजा गया फिर उसे विदेश मंत्रालय भेजा गया तब उसे पाकिस्तान को सौंपा गया। इस बार चूंकि एनआईए ही जांच कर रही है इसलिए सीधे एक ही एजेंसी सारे सुबूत उपलब्ध करा रही है। साथ ही पिछली बार पहले पाकिस्तान को सारी रिपोर्ट मराठी में चली गई थी। बाद में इसे अंग्र्रेजी में अनुवाद कराने में कई महीने लग गए थे।