ममता भी नहीं बदल पार्इं मुस्लिमों का मुकद्दर


कोलकाता . मुस्लिमों की मसीहा ममता दीदी भी अपने बंगाल में मुाqस्लमों का मुकद्दर बदलने में नाकाम रहीं हैं. हाल ही में जारी स्नैप की रिपोर्ट में बताया गया है कि पाqश्चम बंगाल में ८० फीसदी ग्रामीण मुसलमान ५,००० रुपये प्रति महीने से कम की मासिक आमदनी पर िंजदा है. यह रिपोर्ट रिपोर्ट गाइडेंस गिल्ड प्रतीचि ट्रस्ट ने मिलकर तैयार की गई है. मशहूर अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन भी इस रिपोर्ट का जिक्र कर चुके हैं.
रिपोर्ट के अनुसार २०१५ में राज्य सरकार की नौकरियों में मुाqस्लमों की भागीदारी ५.४७ फीसदी रही जबकि २०१०-११ में वेंâद्र सरकार की नौकरियों में मुाqस्लमों की भागीदारी १० फीसदी रही इस तरह बंगाल का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी कम है. स्नैप एसोसिएशन की तरफ से आरटीआई फाइल्स की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि ममता बनर्जी के पांच सालों के शासनकाल में मुाqस्लम की भागीदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.
पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने रंगनाथ समिति की सिफारिशों को २०१० में ही स्वीकार किया था और उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में ओबीसी मुसलमानों को १० फीसदी आरक्षण भी दिया था.
हालांकि स्नैप एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक केवल १९ लाख ओबीसी मुसलमानों को ही नौकरी मिली जबकि ओबीसी मुसलमानों की आबादी २.३ करोड़ है. २००७ में कोलकाता पुलिस में मुाqस्लम की भागीदारी ९.१ थी जो अब बढ़कर ९.४ फीसदी हो चुकी है. सब इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारियों में मुाqस्लमों की भागीदारी ७ फीसदी है. वहीं सार्जेंट रैंक की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी महज २ फीसदी है. कोलकाता म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में मुाqस्लम की हिस्सेदारी ४.७ फीसदी है. २००७ में यह ४.४ फीसदी थी. आंकड़ों से पता चलता है कि २००६ में सच्चर समिति की सिफारिशों के बाद मुाqस्लमों की ाqस्थति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है. इसके अलावा ममता बनर्जी के शासनकाल में भी बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है.
२०११ के चुनावी घोषणापत्र में ममता ने मुाqस्लमों के सशक्तिकरण के लिए एक्शन एजेंडा का वादा किया था और उन्होंने इसे सत्ता में आने के २०० दिनों के भीतर पूरा करने का वादा किया था.
हालांकि एक्शन प्लान को लेकर ममता बनर्जी को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा क्योंकि यह अल्पसंख्यकों का खतरनाक तरीके से तुाqष्टकरण किए जाने जैसा था. ममता ने दावा किया कि उनकी सरकार ने साढ़े चार सालों में ६८ लाख युवाओं को नौकरी दी है. हालांकि यह बयान इस लिहाज से भी बेकार है क्योंकि इसमें उन्होंने नरेगा और आशा कार्यकर्ताओं की नौकरी को भी जोड़ दिया है. लेकिन स्नैप का आंकड़ा बुरी तस्वीर पेश करता है. आगामी चुनाव में वाम दल राज्य की ३० प्रतिशत मुाqस्लम आबादी को अपने पक्ष में करने इसे बड़ा मुद्दा बना सकती हैं.