भ्रष्टाचार निवारण संशोधन बिल पर रिपोर्ट 29 अप्रैल तक


नई दिल्ली। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम १९८८ में संशोधन करने संबंधी विधेयक का परीक्षण कर रही संसदीय समिति का कार्यकाल अप्रैल अंत तक के लिए बढ़ा दिया गया है। राज्यसभा की प्रवर समिति के अध्यक्ष अनिल माधव दवे ने यह जानकारी दी है।
बकौल दवे, समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए २९ अप्रैल तक का समय मिल गया है। हम उक्त तिथि तक राज्य सभा के सभापित को रिपोर्ट सौंप देंगे। उच्च सदन की प्रवर समिति भ्रष्टाचार निवारण संशोधन विधेयक का परीक्षण कर रही है। समिति को यह बिल पिछले वर्ष ७ दिसंबर को भेजी गई थी।
इस विधेयक के तहत यह प्रावधान किया गया है कि भ्रष्टाचार के आरोपी किसी रिटायर्ड या कार्यरत नौकरशाह के खिलाफ कारवाई शुरू करने से पहले या पुलिस के लिए पूर्व अनुमति हासिल करना अनिवार्य होगा। प्रस्तावित बिल में साफ कहा गया है, लोकपाल (वेंâद्रीय कर्मचारियों के संबंध में) और लोकायुक्त (राज्य सरकार के र्किमयों के संबंध में) की पूर्व अनुमति के बगैर कोई भी पुलिस अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अपराध के आरोपी सरकारी अफसर के खिलाफ जांच नहीं शुरू करेगा। हालांकि अभी वेंâद्रीय स्तर पर लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होना बाकी है।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने २०१४ में ऐसे ही एक कानूनी प्रावधान को अनुचित और असंवैधानिक करार दिया है। इसके तहत के लिए यह अनिवार्य है कि वह संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के स्तर के अफसर के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमति हासिल करे।