भाजपा ने शुरू की पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी


नई दिल्ली । भाजपा ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी अभी से शुरू कर दी है। इस सिलसिले में वेंâद्रीय कोर ग्रुप के नेताओं ने पंजाब के पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक की। बैठक में चुनाव को देखते हुए संगठन को और अधिक चुस्त-दुरुस्त करने से लेकर अकाली दल के साथ गठबंधन और राज्य में कांग्रेस और आप की चुनौतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व हिमाचल को लेकर बैठक होगी। इन राज्यों में २०१७ में विधानसभा चुनाव होने हैं। दिल्ली में वित्तमंत्री अरुण जेटली के घर पर हुई बैठक में राज्य के पदाधिकारियों के साथ-साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पंजाब के प्रभारी प्रभात झा भी मौजूद थे। उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार पंजाब को लेकर भाजपा की मुख्य िंचता पार्टी संगठन को मजबूत करने, अकाली दल के साथ गठबंधन को बनाए रखते हुए अधिक से अधिक सीटें लेने और आप व कांग्रेस की ओर से आ रही नई चुनौतियों को निपटने की है। बताया जाता है कि भाजपा पंजाब में कांग्रेस की तरह पार्टी अध्यक्ष बदलकर किसी दमदार नेता को लाना चाहती है। इसके लिए नवजोत िंसह सिद्धू पहली पसंद हैं। लेकिन अकाली दल के साथ गठबंधन रहते हुए सिद्धू ने यह जिम्मेदारी लेने से साफ मना कर दिया है।
वहीं भाजपा की राज्य इकाई लंबे समय से गठबंधन में भागीदारी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। ११७ सदस्यीय विधानसभा में भाजपा दो दर्जन से कम सीटों पर चुनाव लड़ती है। राज्य इकाई गठबंधन में इससे दुगुनी सीटें चाहती हैं। लेकिन अकाली दल इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती अकाली दल को इसके लिए मनाने की है। समस्या यह है कि पंजाब का आतंकवाद का इतिहास होने के कारण भाजपा महाराष्ट्र की तरह गठबंधन से अलग भी नहीं हो सकती है। राज्य में किसी भी तरह की राजनीतिक आqस्थरता का लाभ अलगाववादी तत्व उठा सकते हैं। बैठक के दौरान भाजपा अध्यक्ष ने पंजाब के नेताओं से अकाली दल के साथ गठबंधन के बारे में राय भी मांगी। इस पर सब एकमत थे कि गठबंधन भले ही कायम रहे, लेकिन हमारी सीटें बढ़नी चाहिए।
पंजाब में भाजपा के लिए नई चुनौती लोकसभा की चार सीटें जीतने वाली आप है। अरिंवद केजरीवाल ने पिछले महीने बड़ी रैली कर यह साबित कर दिया है कि पंजाब में अब आप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वहीं अमरिदर िंसह को पार्टी की कमान सौंपकर कांग्रेस ने भी वापसी के लिए दमदार कोशिश का संकेत दिया है। जबकि पिछले १० सालों से सत्ता में रहे भाजपा-अकाली गठबंधन को सत्ता विरोधी माहौल का भी सामना करना पड़ेगा। देखना यह है कि आने वाले दिनों में भाजपा इन चुनौतियों से वैâसे निपटती है।