दुनिया की सबसे बड़ी मंदी – भारतीय बैंक दिवालिया होने के कगार पर


– कच्चा तेल, शेयर बाजारों तथा औद्योगिक मंदी का असर सारी दुनिया में
नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल शुक्रवार को ३० बैरल प्रति डालर के नीचे आ गया। जानकारों की माने तो २० डालर प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसी बीच ईरान ने अपना तेल निर्यात किसी भी कीमत पर करने की घोषणा से सारी दुनिया में अफरा-तफरी मचा दी है।
पेट्रोलियम पदार्थों के कारण विकास की गति तेज हुई थी। पछले ५ दशकों में तेल की कमाई से यूरोप तथा ओपेक संघ के देशों की आर्थिक स्थिति बदली थी। पिछले दो वर्षों में कच्चा तेल १२० डालर प्रति बैरल से गिरकर ३० डालर के नीचे आने से सारी दुनिया की अर्थ व्यवस्था गड़बड़ा गई है। पिछले १५वर्षोंं में जबरदस्त औद्योगिक बढ़त तथा विकास दर बढ़ती देखकर दुनिया के तमाम देशों की सरकार और उनके नागरिकों ने अपने खर्चे कई गुना बढ़ा दिए थे।
२०१४ से सारी दुनिया के देश कर्ज की मार से आर्थिक संकट में आ गए है। अमेरिका और यूरोप के देश २००८ से ही मंदी के शिकार थे। चीन और भारत ही २०१४ तक अपनी औद्योगिक विकास दर तथा सकल जीडीपी में वृद्धि को बनाए रखे थे। कच्चे तेल के दाम घटने के बाद भी कर्ज की मार से बाजार में मांग लगभग खत्म हो गई है। वहीं सप्लाई बढ़ी हुई है। जिसके कारण बड़ी तेजी के साथ गिरावट का दौर चल रहा है।
२००८ में विश्व बैंक की सलाह पर सारी दुनिया के देशों को सोना खरीदने पर मजबूर कर दिया था। अमेरिका की आर्थिक मंदी में जब सैकड़ों बैंक दिवालिया हुए थे उस समय विश्व बैंक ने सेंट्रल बैंकों (रिजर्व बैंक) से सोना खरीदने का सुझाव दिया था। सारी दुनिया के देशों ने बड़ी मात्रा में सोना खरीदा। जिसके फलस्वरूप आठ हजार प्रति १० ग्राम का सोना ३० हजार के ऊपर पहुंच गया। इसका फायदा अमेरिका को मिला। अमेरिका ने पिछले वर्षों में सोना बेचकर काफी कमाई की। मंदी की लहर चलने के बाद सोेने के भाव में भी गिरावट का दौर शुरू हो गया। मंदी के कारण बाजार से खरीददार गायब हो रहे हैं। इसका असर सट्टाबाजी पर भी पड़ रहा है। बाजार में अब तेगड़ियों के स्थान पर मंदड़ियों का बोलबाला हो गया है।
कर्ज के बोझ से दबे और अपने खर्चे की पूर्ति के लिए अधिकांश देश कच्चा तेल तथा सोना बेचकर अपनी जरूरतें पूरा कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय अर्थ शास्त्रियों का मानना है कि कच्चा तेल २० डालर प्रति बैरल के स्तर पर अगले एक माह में आ सकता है। इसी तरह सोना भी भारतीय मुद्रा में २० हजार प्रति १० ग्राम के निचले स्तर पर आ सकता है।
– वित्तीय संस्थानों को भारी नुकसान
भारत के वित्तीय संस्थानों ने पिछले सात वर्षों में अपनी जमा पूंजी का ५० फीसदी से अधिक हिस्सा शेयर बाजारों में निवेश करने तथा बड़े उद्योग समूहों को कर्ज देने में किया है। आर्थिक मंदी के कारण भारतीय शेयर बाजार २४४५५ के स्तर पर पहुंच गया है। सटोरियों ने भारतीय शेयर बाजार को ऋणात्मक स्तर तक पहुंचा दिया था। विदेशी निवेशकों तथा देशी निवेशकों ने पिछले सात वर्ष लगातार शेयर बाजार से मुनाफा वसूली की। शेयर बाजार को बिकवाली से गिरने से रोकने के लिए वित्त मंत्रालय के दबाव में राष्ट्रीयकृत बैंकों, जीवन बीमा निगम, सरकारी संघ की कम्पनियों तथा पीएफ की राशि शेयर बाजार में निवेश कराकर बाजार को थामने का अविवेकहीन निर्णय वेंâद्र सरकार का था। अब जब शेयर बाजार गिर रहे हैं तो बैंकों और वित्तीय संस्थानों को हजारों करोड़ रूपया का नुकसान हो गया है। जिस तरह से बाजार गिर रहे हैं।
विशेषज्ञों की माने तो भारतीय शेयर बाजार मार्च २०१६ तक १७ हजार के स्तर पर आने की संभावना है। इससे दर्जनों बैंकों के दिवालिया होेने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
– एनपीए में पंâसे लाखों करोड़
बैंकों का चार लाख करोड़ से ज्यादा एनपीए में दिसम्बर माह में पंâसा था। शेयर बाजारों की गिरावट, बढ़ती महंगाई तथा टेक्स के बढ़ते बोझ से २०१५-१६ की अंतिम तिमाही में यह राशि ६ लाख करोड़ का स्तर पार कर जाएगी। इस स्थिति में बैंक जमा कर्ताओं को उनकी राशि लौटाने में सक्षम नहीं होंगे। इस स्थिति में भारतीय बैंक भी अमेरिका की तरह दिवालिया होने की कगार पर खड़े हैं।