दिल्ली : 10 फरवरी तीनों पार्टियों का टर्निंग प्वॉइट होगा


नई दिल्ली। समर्थकों, ‘नेताओं’ और ‘बड़े नेताओं’ सबके लिए १० फरवरी टर्निंग प्वॉंइट होगा। ये वो दिन है, जो तय कर देगा कि बीजेपी आने वाले समय में किस तरफ बढ़ेगी। उसे अभी की तरह बेधड़क, बेलौस लीडरशिप मिलती रहेगी, या देश के अन्य ताकतवर क्षत्रप, जो अभी नेपथ्य में हैं, वो सर उठाएंगे। ये १० फरवरी इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसी तारीख को तय हो जाएगा कि बीजेपी अगले चुनावों में क्या रणनीति बनाएगी। किसकी अगुवाई में क्या दिल्ली में किरन बेदी की तरह देश के अन्य हिस्सों में कोई बोल्ड कदम उठा पाएगी बीजेपी क्या बीजेपी की ये लीडरशिप मौजूद भी रहेगी ये बड़ा सवाल है। साफ शब्दों में कहें तो दिल्ली में बीजेपी की हार का मलतब है, मोदी-शाह लीडरशिप से पहले की एक्टिव लीडरशिप के ताकतवर होने की पूरी संभावना। इसके अलावा दूसरी पीढ़ी की लीडरशिप भी अपनी उभार के लिए जोर डालेगी। यहां से इन गुटों में टकराव की पूरी-पूरी संभावना नजर आती है। आडवाणी खेमा जो लोकसभा चुनाव से ६ महीनों तक पूरी तरह से हावी था, उसे नरेंद्र मोदी ने पीछे ढ़केल दिया था। वो राजनाथ की मदद से खुद फ्रंट पर आए, और लगातार चुनाव दर चुनाव फतह करते रहे। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा तो उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण किले यूपी के घेरेबंदी की कमान अमित शाह के हाथों में दी। अमित शाह के बनाए समीकरणों में बीजेपी ने सभी दलों का सफाया कर दिया। इसका इनाम नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ बताकर दिया और सरकार गठन के साथ ही उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया। और जो भी चेहरे दौड़ में थे, उन्हें नेपथ्य में ढकेलते हुए बहुतों को तय मंत्रालय से बेदखल कर दिया गया, तो बहुतों को कोई कुर्सी ही न मिली। वो चेहरे जो बीजेपी की रीढ़ हुआ करते थे, अंधेरे में डूब गए। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने बड़े चेहरों को पीछे ढकेलने के साथ ही विजय रथ आगे बढ़ाना जारी रखा। उन्होंने महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, एमपी, छत्तीसगढ़, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर के चुनाव में भारी सफलता हासिल की। लेकिन कहते हैं कि लगातार जीत के बाद एक ‘हार’ विरोधियों को फिर से उभरने का मौका देती है। दिल्ली में बीजेपी की हार ऐसे ही नेताओं के अंधेरे से निकलकर उजाले में आ खड़े होने, और मोदी-शाह को ललकारने का मौका देगा। ऐसा माना जा रहा है कि किरन बेदी को लाने के लिए बीजेपी की तय लाइन तोड़ने की वजह से शाह-मोदी पहले से ही अंदरूनी तौर पर घिरे हुए हैं। ऐसे में उनके इस दांव के फेल होने को विपक्षी नेता महज चूक मानकर जाने नहीं देने वाले। बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में चुनाव को देखते हुए ये नेता खुद को अगुवा की दौड़ में शामिल करना चाहेंगे। मौजूदा दौर में भले ही कमजोर से दिखने वाले ये चेहरे अगर एकसाथ आ गए, और उन्होंने आरएसएस का समर्थन हासिल कर लिया। तो मोदी-शाह के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। ऐसे में भले ही चेहरे न बदले जाएं, लेकिन उनके फैसलों में हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। फिर वो खुलकर किसी किरन बेदी को सीएम पद का चेहरा नहीं बना पाएंगे, और न ही किसी शाजिया, धीर, अश्विनी, कृष्णा तीरथ जैसे नेता को निर्विवादित तरीके से पार्टी में स्थापित कर पाएंगे। क्योंकि तब शाह-मोदी का हाथ पकड़ने के लिए उनके हाथ मजबूत हो चुके होंगे, जो अभी नेपथ्य में रहकर अपनी पारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में ये १० फरवरी न सिर्फ मोदी-शाह के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उस लीडरशिप के लिए भी। जो मौके के इंतजार में है।