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                <title>आदिशंकराचार्यः काल निर्धारण एवं कृति</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>चंद्रभूषण पाठक</strong><br /><br />भारतवर्ष देवी-देवताओं के अवतारों की भूमि रही है। ईस्वी सन् 2024 से 2531 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर शक संवत् 2631 वैशाख शुक्ल पंचमी, रविवार तदनुसार ईसा पूर्व 507 में भारत की पवित्र भूमि पर केरल राज्य के एर्नाकुलम जिलांतर्गत काल्टी गांव में एक ऐसी महान विभूति का अवतार हुआ, जिनकी प्रसिद्धि विश्व स्तर पर सार्वभौम धार्मिक गुरु आदिशंकराचार्य के रूप में हुई। उनके पिता शिवगुरु एवं माता आर्याम्बा की कोई संतान नहीं थी। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वरदान दिया। इसी कारण इनका नाम शंकर रखा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/101642/adi-shankaracharya-time-determination-and-work"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2024-05/adi-shankaracharya.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चंद्रभूषण पाठक</strong><br /><br />भारतवर्ष देवी-देवताओं के अवतारों की भूमि रही है। ईस्वी सन् 2024 से 2531 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर शक संवत् 2631 वैशाख शुक्ल पंचमी, रविवार तदनुसार ईसा पूर्व 507 में भारत की पवित्र भूमि पर केरल राज्य के एर्नाकुलम जिलांतर्गत काल्टी गांव में एक ऐसी महान विभूति का अवतार हुआ, जिनकी प्रसिद्धि विश्व स्तर पर सार्वभौम धार्मिक गुरु आदिशंकराचार्य के रूप में हुई। उनके पिता शिवगुरु एवं माता आर्याम्बा की कोई संतान नहीं थी। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने स्वयं उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वरदान दिया। इसी कारण इनका नाम शंकर रखा गया था।<br /><br />यह एक विडंबना ही है कि अनेक ग्रंथों तथा घटनाक्रमों के आधार पर शिवावतार भगवत्पाद आदिशंकराचार्य महाभाग का अवतार यद्यपि ईसा पूर्व 507 वर्ष सिद्ध है, तथापि विदेशी षड्यंत्र के अंतर्गत इसे विवादित बना दिया गया। किसी भी देश के इतिहास में उसके पूर्वजों की उपलब्धियों का भी सविस्तार उल्लेख होता है, जो वहां के लोगों के लिए प्रेरणास्रोत तथा गौरव का आधार बनता है। किंतु भारत में सदियों तक आक्रांता मुगलों तथा अंग्रेजों का शासन रहा। इन शासकों ने यहां की संस्कृति, परंपरा तथा गौरवशाली अतीत को नष्ट करने तथा अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए यहां के गौरवमय इतिहास को नष्ट करते हुए इसे गलत ढंग से तैयार करवाया। शिवावतार भगवत्पाद आदिशंकराचार्य महाभाग के अवतारकाल के साथ भी ऐसा ही हुआ। ईसा मसीह के जन्म के पूर्व किसी सार्वभौम धार्मिक गुरु होने की सच्चाई को अंग्रेज आत्मसात नहीं कर सके। अतः षडयंत्रपूर्वक आदिशंकराचार्य महाभाग के अवतारकाल को ईसा पूर्व 507 वर्ष की जगह आठवीं शताब्दी प्रचारित-प्रसारित करवा दिया गया। परिणाम यह हुआ कि भारत के तथाकथित शिक्षित महानुभव एवं शिक्षण संस्थाएं भी अंग्रेजों के इस षड्यंत्र को न समझकर आदि शंकराचार्य महाभाग के अवतारकाल को आठवीं शताब्दी मानने के पूर्वाग्रह से ही ग्रस्त हैं।<br /><br />ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्री गोवर्द्धनमठ पुरी के वर्तमान 145वें श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य महाभाग ने लगभग 1,100 पृष्ठों में विरचित 'शिवावतार भगवत्पाद आदिशंकराचार्य' नामक ग्रंथ में आदिशंकराचार्य के अवतारकाल के संबंध में ग्रंथों, घटनाओं एवं मान्यताओं का विस्तृत वर्णन करते हुए आदिशंकराचार्य महाभाग का अवतार ईसा पूर्व 507 वर्ष प्रमाणित किया है। उन सबका उल्लेख तो इस लेख में संभव नहीं है, तथापि पाठकों की जिज्ञासा की शांति एवं तथ्य की प्रामाणिकता के लिए कुछ प्रमाणों को यहां संक्षेप में सूत्रशैली में प्रस्तुत किया जा रहा है।<br /><br />बृहच्छंकरविजय के अनुसार आदिशंकराचार्य के गुरुदेव यतीन्द्र श्रीगोविंदपद्मपादाचार्य भगवत्पाद का देहावसान युधिष्ठिर शक 2646, प्लवंग संवत्सर, कार्तिक पूर्णिमा, बृहस्पतिवार को हुआ था। अतः आदिशंकराचार्य का अवतार तथा संन्यास ग्रहण युधिष्ठिर शक 2646 के पूर्व ही होना सुनिश्चित है। अतएव उनका अवतार ईसा के बाद होना हास्यास्पद है।<br /><br />श्री वासुदेव अभ्यंकर द्वारा रचित अद्वैतामोद के अनुसार श्रीभगवत्पाद का जन्मकाल युधिष्ठिर संवत् 2631 तथा 32 वर्ष की आयु में तिरोधान काल (देहावसान) युधिष्ठिर संवत् 2663 है। युधिष्ठिर संवत् से कलि संवत् 36 से 37 वर्ष बाद आरंभ हुआ था। अभी ईस्वी सन् 2024 में कलि संवत् 5125 है। अतएव आदिशंकराचार्य भगवान का अवतार अभी से 5125 - 2594 = 2531 वर्ष पहले हुआ, जो ईस्वी सन् 2531 - 2024 = 507 वर्ष पूर्व होता है।<br /><br />‘भविष्योत्तर’ में भी आदिशंकराचार्य भगवान का जन्म युधिष्ठिर संवत् 2631 ही वर्णित है। द्वारका शारदा पीठ के प्रथम शंकराचार्य श्रीमज्जगद्गुरु सुरेश्वराचार्य के साक्षात पट्टशिष्य श्री चित्सुखाचार्य ने भी अपने ग्रंथ 'शंकर विजय' में भगवत्पाद का आविर्भाव युधिष्ठिर संवत् 2631 में ही उद्घोषित किया है। जैनों के अभिमत 'जिनविजय' के अनुसार तथा 'पुण्यश्लोकमंजरी' के अनुसार भगवत्पाद का निर्वाण युधिष्ठिर संवत् 2662 सिद्ध है। इस प्रकार उससे 31 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर संवत् 2631 ही उनका जन्मकाल सिद्ध होता है। भगवत्पाद ने युधिष्ठिर संवत् 2651 में अर्थात ईसा पूर्व 487 वर्ष में नेपाल की भी यात्रा की थी। रानी सुधन्वा द्वारा भगवत्पाद को समर्पित ताम्र प्रशस्ति पत्र में भी युधिष्ठिर शक 2663 का उल्लेख है, जो भगवत्पाद के देहावसान का वर्ष है। ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्री गोवर्धन मठ पुरीपीठ की स्थापना ईसा पूर्व 486 में हुई और तब से अभी तक के सभी शंकराचार्यों का उल्लेख उनके कार्यकाल के साथ उपलब्ध है, जिससे आदिशंकराचार्य महाभाग का अवतार ईसा पूर्व 507 वर्ष ही सिद्ध होता है, न कि ईसा मसीह के जन्म के बाद।<br /><br />आदि शंकराचार्य महाभाग का मात्र 32 वर्ष का जीवनकाल अनेक विचित्रताओं से भरा रहा। पांच वर्ष की अवस्था में उनका उपनयन संस्कार हुआ। उसी वर्ष उनके पिता का देहान्त हो गया। संन्यास लेने की भावना से आठ वर्ष की अवस्था में ही शंकर ने वैधव्य, जरावस्था तथा संन्यास के लिए पुत्र का गृहत्याग करने पर होने वाली पुत्र वियोग की व्याकुलता तथा मरणोत्तर संस्कारादि की चिंता से विह्वल माता से अनुमति प्राप्त कर गृहत्याग कर दिया। युधिष्ठिर शक 2639 कार्तिक शुक्ल देवोत्थान एकादशी को संन्यास पथ पर प्रयाण कर युधिष्ठिर शक 2640 फाल्गुन शुक्ल द्वितीया, गुरुवार को उन्होंने गुरुवर यतीन्द्र श्रीगोविंदपद्मपादाचार्य भगवत्पाद से विधिवत संन्यास ग्रहण किया।<br /><br />श्रीभगवत्पाद शंकराचार्य ने बदरीकाश्रम में रह कर युधिष्ठिर संवत् 2640 से 2646 तक 9 से 16 वर्ष की आयु तक श्रीविष्णुसहस्त्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता, ईश-केनादि उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों पर अद्भुत भाष्य लिखे। उन्होंने प्रपंचसार नामक तंत्रग्रंथ, विवेकचूड़ामणि आदि प्रकरण ग्रंथों तथा सौंदर्यलहरी आदि स्तोत्रग्रंथों की भी रचना की।<br /><br />32 वर्ष की अल्पायु की सीमा में ही आदिशंकराचार्य महाभाग ने उस समय भारत में बौद्धों के बढ़ते प्रभाव और सनातन धर्म के विरुद्ध उत्पात एवं सनातन देवी-देवताओं के अपमान का सामना करने में अक्षम बन चुके सनातनियों को संगठित कर तथा सनातन धर्म में पैठ बना चुकी विसंगतियों को दूर कर सनातन धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया।<br /><br />देश में धार्मिक, आध्यात्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था सही ढंग से चलती रहे, इस उद्देश्य से उन्होंने देश के चार भागों पुरी, शृंगेरी, द्वारिका तथा बदरीकाश्रम में चार शंकराचार्य आम्नाय मठों अर्थात् धार्मिक राजधानियों की स्थापना की तथा चारों मठों में एक-एक शंकराचार्य को प्रतिष्ठित कर सनातन धर्म की परंपरा को सुरक्षित रखने का मार्ग प्रशस्त किया। चारों मठों के शंकराचार्य को शिवावतार मानते हुए उन्होंने सबों का महत्व अपने सामान ही प्रतिष्ठित किया।<br /><br />(लेखक, श्रीगोवर्द्धनमठ पुरी से संबद्ध हैं।)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 May 2024 13:21:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
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                <title> सबसे व्यापक और प्रचंड अवतार है भगवान परशुराम का</title>
                                    <description><![CDATA[<p>पृथ्वी पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना के लिए भगवान नारायण ने अनेक अवतार लिए हैं। इनमें परशुराम का अवतार पहला पूर्ण अवतार है। जो सर्वाधिक व्यापक है। संसार का ऐसा कोई कोना, कोई क्षेत्र या कोई देश ऐसा नहीं, जहां भगवान परशुराम की स्मृति या चिह्न नहीं मिलते हों। उन्होंने संसार में शांति और मानवता की स्थापना के लिए पूरी पृथ्वी की सतत यात्राएं कीं। यदि यह कहा जाय कि विश्व में आर्यत्व की स्थापना भगवान परशुराम ने की तो यह सच्चाई का महत्वपूर्ण तथ्य होगा।<br /><br />भगवान् परशुराम का चरित्र वैदिक और पौराणिक इतिहास में सबसे प्रचंड और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/91447/incarnation-day-akshaya-tritiya-is-the-most-extensive-and"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2023-04/lord-parashurama.jpg" alt=""></a><br /><p>पृथ्वी पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना के लिए भगवान नारायण ने अनेक अवतार लिए हैं। इनमें परशुराम का अवतार पहला पूर्ण अवतार है। जो सर्वाधिक व्यापक है। संसार का ऐसा कोई कोना, कोई क्षेत्र या कोई देश ऐसा नहीं, जहां भगवान परशुराम की स्मृति या चिह्न नहीं मिलते हों। उन्होंने संसार में शांति और मानवता की स्थापना के लिए पूरी पृथ्वी की सतत यात्राएं कीं। यदि यह कहा जाय कि विश्व में आर्यत्व की स्थापना भगवान परशुराम ने की तो यह सच्चाई का महत्वपूर्ण तथ्य होगा।<br /><br />भगवान् परशुराम का चरित्र वैदिक और पौराणिक इतिहास में सबसे प्रचंड और व्यापक है। उन्हें नारायण के दशावतार में छठे क्रम पर माना गया। वे पहले पूर्ण अवतार हैं। उन्हें चिरंजीवी माना गया इसीलिए उनकी उपस्थित हरेक युग में मिलती है। उनका अवतार सतयुग के समापन और त्रेतायुग आरंभ के संधि क्षण में हुआ। वह वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया थी। चूंकि उनका अवतार अक्षय है इसलिए यह तिथि अक्षय तृतीया कहलाई।<br /><br />इस तिथि का प्रत्येक पल शुभ होता है। उनका अवतार एक प्रहर रात्रि के शेष रहते हुआ इसलिए यह ब्रह्म मुहूर्त कहलाया। उनकी उपस्थिति सतयुग के समापन से आरंभ होकर कलियुग के अंत तक रहने वाली है। इतना व्यापक और कालजयी चरित्र किसी देवता, ऋषि अथवा अवतार का नहीं मिलता। उन्होंने ही वह शिव धनुष राजा जनक को दिया था जिसे भंग करके रामजी ने माता सीता का वरण किया। भगवान परशुराम ने ही वह विष्णु धनुष भगवान राम को दिया था जिससे लंकापति रावण का वध हुआ। इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र और गीता का ज्ञान भी देने वाले परशुराम ही हैं। पुराणों में यह भी उल्लेख है कि धर्म रक्षा के लिए कलयुग में कल्कि अवतार होगा तब उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देने के निमित्त भी भगवान परशुराम ही होंगे।<br /><br />भगवान् परशुरामजी का अवतार ऋषिकुल में हुआ। भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि थे और माता रेणुका सूर्यवंशी प्रतापी सम्राट राजा रेणु की पुत्री थीं। भगवान परशुराम पांच भाई और एक बहन हैं। उनके सात गुरु है। पहली गुरु माता रेणुका हैं, दूसरे गुरु पिता महर्षि जमदग्नि। तीसरे गुरु महर्षि चायमान, चौथे गुरु महर्षि विश्वामित्र, पांचवे गुरु महर्षि वशिष्ठ, छठें गुरु भगवान् शिव और सातवें गुरु भगवान् दत्तात्रेय हैं। भगवान शिव की भक्ति तो पूरा संसार करता है पर उनके एक मात्र शिष्य भगवान् परशुराम ही हैं। वे मन की गति से भ्रमण करते हैं। इसे मन व्यापक गति कहते हैं। उन्हें चिर यौवन का वरदान है अर्थात वे कभी वृद्ध नहीं होंगे।<br /><br />संसार को श्रीविद्या का ज्ञान भगवान् परशुराम ने दिया। शक्ति की उपासना भी भगवान परशुराम से आरंभ हुई। परशुराम के ज्ञान, साधना, ओजस्विता और तेजस्विता के आगे कोई नहीं ठहर पाया। उनके आगे चारों वेद चलते हैं। पीठ पर अक्षय तीरों से भरा तूणीर रहता है। एक हाथ में शास्त्र हैं तो दूसरे में शस्त्र। वे श्राप देने और दंड देने दोनों में समर्थ हैं। यह क्षमता किसी और अवतार में या ॠषि में नहीं। उन्होंने यदि प्रत्यक्ष युद्ध करके आतताइयों का वध किया है तो तप करके शिवजी को प्रसन्न भी किया है। उन्होंने समाज निर्माण के लिए दो बार विश्व की यात्रा की। ऋषि रूप वेद ऋचाओं का सृजन भी किया है। मध्यकाल में जिस भारत के मान बिंदुओं को कलंकित किया गया उसी प्रकार भारत के आदर्श चरित्र गाथा में अनेक कूटरचित कथाएं जोड़कर विवादास्पद बनाने का कुचक्र चला। आक्रामणकारियों का घोषित नारा था बांटो और राज करो इसके अंतर्गत ही भगवान परशुराम की गाथा में कुछ प्रसंग जोड़े। जो पूरी तरह असत्य और भ्रामक हैं।<br /><br />भगवान् परशुराम पर दो आक्षेप लगाये जाते हैं एक तो यह कि उन्होंने क्षत्रियों का क्षय किया, दूसरा यह कि वे बहुत क्रोधी थे। ये दोनों आक्षेप असत्य हैं और समाज में भेद पैदा करने के लिए कुछ विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा रचित हैं ताकि समाज को विभाजित कर भारत को कमजोर किया जा सके। वे अपने षड्यंत्र में कुछ सफल भी हुए, लेकिन अब हमें स्वयं अध्ययन करके समस्त भ्रांतियों का निवारण करना चाहिए। इन दोनों प्रश्नों पर शास्त्रों में पर्याप्त प्रमाण हैं। श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है कि दुष्टं क्षत्रम् शब्द आया है। अर्थात "दुष्ट राज्य"। पुराण कथाओं में तीन शब्द आतें हैं क्षत्र, क्षत्रप और क्षत्रिय। इन तीनों शब्दों में अंतर होता है। क्षत्र यानि राज्य, क्षत्रप यानि राजा और क्षत्रिय यानि राज्य के लिए समर्पित। यदि शब्द दुष्ट क्षत्रम् है तो उसका अर्थ हुआ ऐसे राज्य जो दुष्टता करते थे। महाभारत के एक प्रसंग में भगवान् शिव ने आदेश दिया कि "तुम मेरे समस्त शत्रुओं का वध करो"। संस्कृत में शब्द चाहे "क्षत्र" आया हो या "क्षत्रप" लेकिन हिंदी अनुवाद में सीधा क्षत्रिय ही करके भ्रम फैलाया गया।<br /><br />परशुराम के संदर्भ में क्षत्रिय शब्द का वर्णन पहली बार कालिदास के रघुवंश में हुआ और यहीं से क्षत्रिय विनाश के किस्से चल पड़े। इसके बाद जो साहित्य रचा गया उसमें इसके वर्णन में विस्तार होता गया। भला बताइये भगवान परशुराम नारायण के अवतार हैं। क्षत्रिय की उत्पत्ति नारायण के बाहुओं से हुई तो क्या नारायण स्वयं अपनी बाहुओं का विनाश करने के लिए अवतार लेंगे? इसके अतिरिक्त उनकी माता देवी रेणुका क्षत्रिय, उनकी दादी देवी सत्यवती क्षत्रिय, भृगु वंश की अनेक ऋषि कन्याएं क्षत्रियों को ब्याहीं तब भला कैसे वे क्षत्रिय विरोधी अभियान छेड़ सकते हैं।<br /><br />इसके अतिरिक्त एक बात और नारायण जब भी अवतार लेते हैं, उनके अवतार का कहीं न कहीं निमित्त होता है। यदि किसी अवतार में पत्नी वियोग होना है, वानरों का साथ लेना है, एक ही विवाह करना या एक से अधिक विवाह करना या रणछोड़ का आक्षेप लगना सब निर्धारित होता है। इसीलिए नारायण के अवतार के कार्यों को कर्म नहीं लीला कहा जाता है। नारायण के किसी प्रसंग में किसी शास्त्र में यह उल्लेख नहीं आया कि कभी वे क्षत्रिय हंता बनेंगे। अतएव यह भ्रामक बात समाज को मन से निकालनी होगी। समाज को बांटने के यूं भी कम षड्यंत्र नहीं हो रहे हैं। अतएव हमें सत्य को समझना चाहिए।<br /><br />भगवान परशुराम से संबंधित प्रसंग पूरे विश्व में मिलते हैं। उनके विभिन्न नामों में एक नाम भृगुराम भी है। यह शब्द अपभ्रंश होगा बगराम बना। अफगानिस्तान में भी बगराम नामक स्थान है यहां विमानतल भी बना है। एक बगराम नगर ईराक में भी है। लैटिन अमेरिका की खुदाई में श्रीयंत्र जैसी आकृति निकली है। भगवान परशुराम के कहने पर मय दानव पाताल गया था। संभवतः मय दानव से ही लैटिन अमेरिका की "मायन सभ्यता" विकसित हुई होगी। रोम की खुदाई में पत्थर पर उकेरी गई एक ऐसी आकृति निकली जिसके कंधे पर धनुष बाण है और परशु जैसा शस्त्र भी।<br /><br />यद्यपि इस आकृति के सिर पर टोप तो रोमन ही, पर परशु और धनुष बाण धारण करने वाले एक मात्र परशुराम हैं। संभव है कि रूस नाम ऋषिका का अपभ्रंश हो। पर इस पर व्यापक शोध की आवश्यकता है। मैक्समूलर की पुस्तक "हम भारत से क्या सीखें" के अनुसार संसार का ज्ञान भारत से ईरान पहुंचा और ईरान से पूरे विश्व में। इस कथन से यह धारणा प्रबल होती है कि विश्व में जो परशुराम से मिलते जुलते शब्द या चिह्न मिलते हैं वे सब परशुराम से ही संबंधित हो सकते हैं। इस प्रकार भगवान परशुराम अवतार विश्व व्यापक है, सबसे प्रचंड है और संसार में अधर्म का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है। (लेखक -रमेश शर्मा)</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फिचर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Apr 2023 19:14:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Dharmendra Mishra]]></dc:creator>
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                <title>ऑनलाइन बुकिंग से अब सीधे पहुंच सकेंगे महाकाल के गर्भगृह में, मई से नई व्यवस्था लागू</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भोपाल, 16 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन के लिए देश-दुनिया से आने वाले भक्त अब बहुत निकट से अपने इष्ट के दर्शन कर सकेंगे। इसके लिए मंदिर प्रशासन व्यवस्थाएं बनाने में जुटा है।<br /><br />दरअसल, भक्तों की इच्छा बाबा महाकाल के दर्शन नजदीक से ही करने की रहती है। साथ ही उन्हें जल, दूध चढ़ाने और स्पर्श करने की इच्छा लिए भक्त दरबार में पहुंचते हैं। अब तक भस्मारती को छोड़कर ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था से सीधे गर्भगृह में पहुंचने का अवसर भक्तों के पास नहीं था, लेकिन अगले माह मई से भक्त सीधे गर्भगृह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/91319/online-booking-will-now-directly-reach-the-sanctum-sanctorum-of"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2021-03/2638_ujjain-mahakal-mandir-temple.jpg" alt=""></a><br /><p>भोपाल, 16 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकाल के दर्शन के लिए देश-दुनिया से आने वाले भक्त अब बहुत निकट से अपने इष्ट के दर्शन कर सकेंगे। इसके लिए मंदिर प्रशासन व्यवस्थाएं बनाने में जुटा है।<br /><br />दरअसल, भक्तों की इच्छा बाबा महाकाल के दर्शन नजदीक से ही करने की रहती है। साथ ही उन्हें जल, दूध चढ़ाने और स्पर्श करने की इच्छा लिए भक्त दरबार में पहुंचते हैं। अब तक भस्मारती को छोड़कर ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था से सीधे गर्भगृह में पहुंचने का अवसर भक्तों के पास नहीं था, लेकिन अगले माह मई से भक्त सीधे गर्भगृह में पहुंचकर महाकाल के दर्शन कर पाएंगे। उन्हें जल भी चढ़ा पाएंगे।<br /><br />महाकालेश्वर मंदिर के प्रशासक संदीप कुमार सोनी कहते हैं कि फिलहाल इससे जुड़े तकनीकी पक्ष पर कार्य किया जा रहा है। हम उम्मीद कर रहे हैं कि इस माह के अंत तक हमारा सॉफ्टवेयर तैयार हो जाएगा और उसके बाद सुबह 6:00 से दोपहर 12:30 बजे तक छह स्लॉट में भक्तों को सीधे गर्भगृह के दर्शन कराना आरंभ होगा।<br /><br />उन्होंने बताया कि प्रत्येक स्लॉट में 50 भक्तों को ऑनलाइन बुकिंग के माध्यम से गर्भगृह में प्रवेश दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। यदि पूर्व से ऑनलाइन बुकिंग रहेगी, तो उसकी रसीद दिखाने भर से तत्काल उन्हें अंदर गर्भगृह में प्रवेश दिया जाएगा। महाकाल के दर्शन करने का शुल्क 750 से लेकर 1500 तक रखा जा सकता है।<br /><br />फिलहाल महाकाल परिसर में प्रोटोकॉल कार्यालय पर बने काउंटर से भक्त स्वयं पहुंचकर टिकट लेकर प्रतिदिन सशुल्क गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। कई लोग पहले दिन गर्भगृह में प्रवेश नहीं मिलने की स्थिति में दूसरे दिन रुककर दर्शन करते हैं। अभी प्रतिदिन डेढ़ हजार के लगभग भक्त दर्शन कर पाते हैं। अब मई से ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने के बाद कहीं से भी बुकिंग करके सीधे उज्जैन आकर भगवान महाकाल के गर्भगृह में प्रवेश करेंगे। उन्हें किसी लाइन में लगने की आवश्यकता नहीं रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फिचर</category>
                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 16 Apr 2023 19:13:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चित्रकूट की शीतल धारा से मिली थी हनुमान को लंका दहन के तपन से मुक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[अविरल धारा के शीतल जल के सेवन में मिलती है कई असाध्य रोगों से निजात]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/91289/hanuman-got-freedom-from-the-heat-of-lanka-dahan-from"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2023-04/k15042023-07.jpg" alt=""></a><br /><p>चित्रकूट, 15 अप्रैल(हि.स.)। विंध्य पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित विश्व प्रसिद्ध पौराणिक तीर्थ चित्रकूट के प्रमुख स्थल 'हनुमान धारा' का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व है। पहाड़ के शिखर पर स्थित इस पावन धाम से निकली अविरल जलधारा से असुरराज रावण की सोने की लंका का दहन करने वाले राम भक्त हनुमान को तपन से मुक्ति मिली थी। देश-दुनिया में हनुमान धारा के नाम से विख्यात प्राचीन धाम के दर्शन के लिए प्रतिमाह लाखों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है।<br /><br />आदि तीर्थ के रूप में समूचे विश्व में विख्यात भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट की महिमा का गुणगान स्वयं संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में किया है। 'चित्रकूट निश दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत।' चौपाई के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी ने बताया है कि चित्रकूट ही सृष्टि का एकमात्र ऐसा पावन धाम है जहां पर प्रभु श्रीराम,माता सीता और लखन के साथ नित्य निवास करते हैं। इस पावन भूमि से भक्त हनुमान का भी गहरा संबंध है।<br /><br /><strong>श्रीराम रक्षा स्रोत के पाठ से प्रकट हुई थी 'हनुमान जलधारा'</strong><br /><br />मान्यता है कि विंध्य पर्वत श्रृंखला के मध्य बसे चित्रकूट के हनुमान धारा में ही राम भक्त हनुमान जी को वह सुख और शांति मिली थी जो पूरे ब्रह्मांड में हासिल नहीं हुई। इस पवित तीर्थ स्थल को लेकर किवदंती है कि जब लंका दहन में हनुमान जी भगवान का पूरा शरीर तप गया था। लंका विजय के बाद हनुमान जी ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम से शरीर के तपन को शांत करने का उपाय पूछा। तब प्रभु श्रीराम ने उन्हें उपाय बताया कि विंध्य पर्वत पर जाएं। जहां पर आदिकाल के ऋषि-मुनियों ने तप किया था। उस पवित्र भूमि की प्राकृतिक सुषमा से युक्त स्थान पर जाकर तप करो। हनुमान जी ने चित्रकूट आकर विंध्य पर्वत श्रृंखला की एक पहाड़ी में श्री राम रक्षा स्त्रोत का पाठ 1008 बार किया। जैसे ही उनका अनुष्ठान पूरा हुआ ऊपर से एक जल की धारा प्रकट हो गयी। जलधारा शरीर में पड़ते ही हनुमान जी के शरीर की तपन शांत हुई और शीतलता की प्राप्त हुई। आज भी यहां वह जल धारा निरंतर गिरती है। इसी वजह से पूरे देश में इस पावन धाम को 'हनुमान धारा' के रूप में जाना जाता है।<br /><br /><strong>देश भर से हर महीनें जुटते हैं लाखों श्रद्धालु</strong><br /><br />कामदगिरि प्रमुख द्वार के महंत मदन गोपाल दास महाराज एवं गायत्री शक्तिपीठ के व्यवस्थापक डा0 राम नारायण त्रिपाठी कहते हैं कि धर्म नगरी चित्रकूट के कण-कण में भगवान श्रीराम का वास है। इस धरा पर भगवान श्रीराम, माता सीता और अनुज लखन के साथ साढ़े 11 वर्षाे तक निवास किया था। इसी पावन भूमि पर स्थित हनुमान धारा पर लंका का दहन करने वाले राम भक्त हनुमान के शरीर का तपन शांत हुआ था। बताया कि इस तीर्थ स्थल में विद्यमान हनुमान जी की विशाल मूर्ति पर लगातार गिरने वाली शीतल जलधारा को देखने एवं पूजन-अर्चना के लिए हनुमान जयंती आदि पर्वों के साथ-साथ हर महीनें देश भर से लाखों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है।<br /><br /><strong>हनुमान जल धारा में स्नान करने से खत्म होते हैं 'पेट' संबंधी 'रोग'</strong><br /><br />भरत मंदिर के महंत दिव्य जीवन दास महाराज प्रकटी शीतल जल धारा की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि इस पर्वत से निकलने वाली धारा की अलग ही विशेषता है। मान्यता है कि इसके जल से स्नान करने से 'पेट' संबंधी रोग खत्म हो जाते हैं। इसी वजह से देश भर से आने वाले श्रद्धालु हनुमान धारा के पवित्र जल को ले जाना नहीं भूलते। ऊंची पहाड़ी पर स्थित हनुमान धारा में पहुंचने के लिए पहले श्रद्धालुओं को 360 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। लेकिन अब रोपवे बन जाने से देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को हनुमान धारा के दर्शन अत्यंत सुगम हो गए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Apr 2023 14:04:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पंचमुखी भगवान शिव के दर्शन कर प्राचीन कुंड में स्नान से मिलती है 'चर्मरोग' से मुक्ति</title>
                                    <description><![CDATA[प्रतिवर्ष लाखों शिव भक्त मड़फा पहुंच करते हैं भगवान नीलकण्ड की आराधना]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/91218/bathing-in-the-ancient-kund-after-seeing-the-five-faced-lord"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2023-04/k13042023-06.jpg" alt=""></a><br /><p>चित्रकूट, 13 अप्रैल(हि.स.)। भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट अपनी धार्मिक, आध्यात्मिक और पौराणिक महत्ता के लिए समूचे विश्व में विख्यात है। धर्म नगरी के भरतकूप क्षेत्र में घने जंगलों के बीच करीब ढाई सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर मड़फा किले के रूप में विख्यात आदि ऋषि मांडव्य का आश्रम है।<br /><br />इस प्राचीन मड़फा आश्रम में नृत्यमुद्रा में विराजमान पंचमुखी भगवान शिव की महिमा का बखान वेदों और पुराणों में भी मिलता है। इस दिव्य धाम की ऐसी महिमा है कि यहां स्थित कुंड के जल में आस्था की डुबकी लगाकर भगवान शिव का पूजन करने से 'कुष्ठ' रोग से निजात मिलने के साथ-साथ पुनर्जन्म से मुक्ति मिल जाती है। पंचमुखी शिव के दर्शन मात्र से ही सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है।<br /><br />गौरतलब है कि मार्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट विश्व के अनादि, अचल और ऐतिहासिक पावन तीर्थों में से एक है। इस प्राचीन धर्म स्थली में स्वयं सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा समेत अगस्त, अत्रि, बाल्मीकि आदि प्रख्यात ऋषि-मुनियों ने तपस्या की है। इसी वजह से ब्रह्माण्ड के सबसे श्रेष्ठ स्थल चित्रकूट की तुलना स्वर्गलोक से की जा सकती है। लगभग 84 कोस में फैले चित्रकूट में विविध प्रकार के शिखर (कूट) स्थित है। इस प्राचीन आश्रम में भगवान शंकर अपने पंचमुखी रूप में सशरीर विद्यमान हैं।<br /><br />इस दिव्य स्नान को लेकर ऐसी मान्यता है कि यहां पर ऋषि मांडव्य ने तपस्या की थी। इसी तपोस्थली पर महाराज दुष्यंत की पत्नी शकुंतला ने पुत्र भरत को जन्म दिया था। इसी तालाब के पास चंदेलकालीन वैभवशाली नगर के ध्वंसावशेष भी देखे जा सकते हैं। जैन धर्म के प्रवर्तक आदिनाथ के भी यहां पर आने की बात कही जाती है। महाशिवरात्रि व प्रत्येक सोमवार को यहां सदियों से मेला लगता चला आ रहा है। इस धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्राचीन धरोहर को केंद्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है।<br /><br />चित्रकूट के सुप्रसिद्ध संत भरत मंदिर के महंत दिव्य जीवन दास महाराज,रामायणी कुटी के महंत राम हृदयदास महाराज एवं गायत्री शक्ति पीठ के व्यवस्थापक डॉ रामनारायण त्रिपाठी मड़फा किले की महिमा बताते हैं कि देवराज इंद्र ने वेदवती नामकी अपूर्व सुंदरी अप्सरा को कोढ़ (कुष्ठ) होने का शाप दिया था। शापग्रस्त अप्सरा के अनुनय विनय करने पर इंद्र ने माण्डव ऋषि के आश्रम में स्थित न्यग्रोध कुंड में स्नान करके वहां विराजमान पंचमुखी भगवान शिव की उपासना से शापमुक्त होने का मार्ग बताया था। आज भी देश भर से लोग कुष्ठ निवारण के लिए यहां आते हैं। इसके अलावा यहां स्थित पंचमुखी शिव के दर्शन और उपासना करने से पुनर्जन्म से मुक्ति मिलने की मान्यता है।<br /><br />मंदिर के विकास के लिए चिंतित समाजसेवी दिनेश कुमार सिंह ने शासन से मड़फा धाम में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोपवे बनवाने की मांग की है। इतिहासकार रमेश चौरसिया का कहना है कि मड़फा दुर्ग एक चन्देल कालीन किला है।</p>
<p>यह दुर्ग चित्रकूट से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। भरतकूप मार्ग पर बरिया मानपुर के समीप दुर्ग एक पहाड़ी पर है। चन्देल शासन काल में इस दुर्ग का महत्वपूर्ण स्थान था। दुर्ग के भग्नावशेष यहां आज भी उपलब्ध होते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इस दुर्ग का विशेष महत्व था। यहां का प्राकृतिक सौन्दर्य बड़ा ही मनोरम है। इस दुर्ग में चढ़ने के लिए तीन रास्ते हैं। पहला मार्ग उत्तर पूर्व से मानपुर गाँव से है। तथा दूसरा मार्ग दक्षिण पूर्व से सवारियाँ गाँव से है तथा तीसरा मार्ग कुरहन गाँव से है।<br /><br />यहाँ दर्शन को आये श्रद्धालु ओम प्रकाश केशरवानी,महेंद्र जायसवाल और ऋषि आर्य का कहना है कि मड़फा की ऊँची पहाड़ी पर विराजमान पंचमुखी भगवान शिव के दर्शन मात्र से व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु देश भर से इस पौराणिक तीर्थ आकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। इसके मंदिर के पास स्थित प्राचीन कुंड में स्नान कर चर्म रोगों से मुक्ति पाते हैं।<br /><br />जिला पर्यटन अधिकारी अनुपम श्रीवास्तव का कहना है कि केंद्र और प्रदेश की सरकार चित्रकूट समेत पूरे बुंदेलखंड के धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व से जुड़े स्थलों को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने को संकल्पित है। कहा कि पर्यटन विभाग के माध्यम से मड़फा मंदिर को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने का काम किया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>फिचर</category>
                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Apr 2023 13:05:41 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सूरत : शहर का एक अनोखा मंदिर जहां पर खांसी ठीक करने के लिये मन्नत रखते हैं श्रद्धालू!</title>
                                    <description><![CDATA[खांसी ठीक होने के बाद भक्त खोखली माताजी के मंदिर में गांठीया का प्रसाद चढ़ाते है!]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/89682/a-unique-temple-in-surat-city-where-devotees-make-a"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2023-02/story-12022023-b13.jpg" alt=""></a><br /><p>सूरत में माताजी का एक ऐसा मंदिर है जहां लोग खांसी दूर करने के लिए मन्नत रखते हैं। इतना ही नहीं देश भर से श्रद्धालु यहां आते हैं। लोग मन्नत पूरी होने के बाद माताजी को गांठीये का प्रसाद चढाते हैं। </p>
<p>इस बारे में विस्तार पूर्वक बताएं तो सूरत में अंबिका निकेतन के पास एक मंदिर है, जहां लोग खांसी दूर करने के लिए माताजी से मन्नत मांगते हैं। इस मंदिर को खोखली माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। केवल पारले पॉइंट ही नहीं बल्कि कापोद्रा इलाके में भी खोखली माता का मंदिर है और इसकी खासियत यह है कि भक्त मन्नत पूरा होने के बाद माताजी को गांठीया चढ़ाते हैं।</p>
<p>गुजरात में गांठीया फरसाण के रूप में बेसन से बनने वाला प्रख्यात नाश्ता है। बहुत ही कम लोगों को ज्ञात होगा की गांठीयों का प्रसाद  माताजी के मंदिर में चढ़ाया जाता हो। बरसों पुराने इस मंदिर के संबंध में मान्यता है कि जो लोग लंबी चलने वाली खांसी से पिड़ीत हैं और उससे छुटकारा पाना चाहते हैं, वह इस मंदिर में आकर माताजी से खांसी छुडाने की मन्नत मांगें तो माताजी उनकी मन्नत पुरी करती हैं। भक्ती-भाव से आने वाले श्रध्दालुओं की खांसी दूर होने पर वह माताजी को गांठीयां का प्रसाद चढ़ाते हैं।</p>
<p>इस मंदिर में पूजा अर्चना करने वाले परिमल गज्जर कहते हैं कि यह मंदिर 100 साल से अधिक पुराना है। वरीष्ठ लोगों से सुनी बातों के अनुसार यहां पर पहले एक कुंआ हुआ करता था। जिन लोगों को खांसी जैसी कोई बिमारी होती थी तो उन लोगों को इस कुंए का पानी पीलाकर उनकी खांसी दूर की जाती थी।</p>
<p>वर्तमान में यहा पर कुंआ नहीं है। मगर माताजी की मन्नत रखने के लिए भक्त आज भी इस मंदिर में आते हैं। भक्तों की मन्नत पूरी होने के बाद वह माताजी को गांठीया का प्रसाद चढ़ाते हैं। कोरोना काल के दौरान भी भक्तों ने इस मंदिर में मन्नतें रखी थीं। माताजी के आशीर्वाद से उनकी खांसी ठीक होने के बाद वह प्रसाद लेकर मंदिर में माताजी के दर्शन करने और आभार व्यक्त करने आते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सूरत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Feb 2023 19:18:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
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