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                <description>Ocean RSS Feed</description>
                
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                <title>गुजरात : जानें कहां से मिला लाल रंग का दुर्लभ अफ्रीकी बिच्छू!?</title>
                                    <description><![CDATA[गुजरात में पहली बार देखने को मिला ‘रेड फ्रॉग क्रैब’]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><div>सौराष्ट्र का समुंद्री विस्तार लाखों समुंद्री जीव-जंतुओं का घर है। सागर के नीचे तरह तरह के और अलग-अलग प्रजाति के समुंद्री जीव-जंतु रहते है। इनमें से बहुत सारे तो ऐसे है जिनके बारे में हम जानते ही नहीं। हाल ही में सौराष्ट्र के समुंद्री तट पर एक दुर्लभ जीव देखा गया। दरअसल सिर्फ सौराष्ट्र ही नहीं बल्कि पुरे गुजरात में कछुए के आकार का लाल रंग का केकड़ा पाया गया। इस केकड़े को ‘अफ़्रीकी मेंढक’ या ‘रेड फ्रॉग क्रैब’ के नाम से जाना जाता है। वेरावल के तट पर इस अनोखे जीव को देखकर वहां मौजूद हर कोई हैरान था। वेरावल के फिशरीज कॉलेज के प्राध्यापक भी इसे अनोखी घटना बता रहे है।</div><div>आपको बता दें कि ‘रेड फ्रॉग क्रैब’ का आकार किसी सामान्य कछुए जैसा और वजन लगभग 550 ग्राम का होता है। इस जीव का वैज्ञानिक नाम रेनीना है। भारत में ये प्रजाति सबसे पहले केरल के तटों पर 2018 में देखा गया था। अब इसे गुजरात के सौराष्ट्र के वेरावल में पाया गया है। इस पर वहां के फिशरीज कॉलेज के प्राध्यापक डॉ। जितेश सोलंकी, डॉ प्रकाश परमार से इसके ‘रेड फ्रॉग क्रैब’ कोने की पुष्टि की है। केकड़े की यह प्रजाति अफ्रीका, जापान, मोरेशियस, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पाई जाती है। भारत में केकड़े की इस प्रजाति का मिलना अपने आप में अचरज की बात है।</div>                                                                            ]]></content:encoded>
                
                                                            <category>गुजरात</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Jan 2022 11:57:30 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
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                <title>तो क्या वैज्ञानिकों को समुद्र के नीचे मिल गया ‘कोरोना का इलाज’?</title>
                                    <description><![CDATA[दो साल से दुनिया भर में फैली है कोरोना महामारी, अभी तक नहीं मिला कोई पुख्ता इलाज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/80300/so-did-scientists-find-the-cure-for-corona-under-the-sea"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2021-11/3433_algae-01.jpg" alt=""></a><br /><div>दो साल पूरी दुनिया मे कोरोना महामारी फैली हुई है। इतने समय के बाद भी अभी तक इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं खोजा जा सका है। ऐसे में एक अच्छी खबर सामने आई है. दरअसल वैज्ञानिकों ने तब समुद्र के तल में एक ऐसे पदार्थ की खोज की है जो कोरोना का स्थायी इलाज प्रदान कर सकता है।</div><div>आपको बता दें कि वैज्ञानिकों का कहना है कि पेनिसिलिन चिकित्सा के इतिहास में सबसे बड़ी खोज थी। यह एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एंटीबायोटिक है। जब इसकी खोज हुए तो चिकित्सा का इतिहास बदल गया। ऐसे में अब कोरोना को हराने के लिए हमें ऐसे एंटीवायरल की जरूरत है जो प्राकृतिक रूप से बड़ी मात्रा में मौजूद हों। सबसे बड़ी बात है कि कई नैदानिक परीक्षणों के विभिन्न चरणों में परिक्षण के बाद अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने भी इस समुद्री जानवरों में पाए जाने वाले पदार्थों को उपचार के लिए मंजूरी दे दी है। यह पदार्थ समुद्री शैवाल, विद्रूप और मछली में पाया जाता है। इन्हें समुद्री सल्फेटेड पॉलीसेकेराइड कहा जाता है।</div><div>जानकारी के अनुसार समुद्री सल्फेटेड पॉलीसेकेराइड एक विशेष प्रकार का कार्बोहाइड्रेट होता है जिसमें सल्फर होता है। यह सल्फर समुद्री शैवाल या समुद्री शैवाल की कोशिकाओं की बाहरी दीवारों में जमा हो जाता है। यह कुछ मछली और मैंग्रोव पौधों में भी पाया जाता है। वैज्ञानिक लगातार एमएसपी के साथ प्रयोग कर रहे हैं। यह हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस, एचआईवी, चिकनपॉक्स, साइटोमेगालोवायरस, इन्फ्लूएंजा और हेपेटाइटिस वायरस के खिलाफ प्रभावी साबित हुआ है। मान लेते हैं कि एमएसपी कोरोना की दवा हो सकती है। लेकिन इसके लिए समुद्री शैवाल ढूंढना, उसे बाहर निकालना, उसका प्रसंस्करण करना और फिर इस पदार्थ को निकालकर उसकी दवा या टीका बनाना, यह एक बहुत लंबी और जटिल प्रक्रिया है। लेकिन अच्छी खबर यह है कि शैवाल और समुद्री शैवाल, जिनमें समुद्री सल्फेटेड पॉलीसेकेराइड (एमएसपी) होते हैं, समुद्र में उच्च मांग में हैं। इसलिए दुनिया भर के लोगों के लिए इससे दवा की लाखों खुराक बनाई जा सकती हैं।</div><blockquote class="twitter-tweet"><p lang="en" dir="ltr" xml:lang="en">The marine environment is a treasure trove for potential medicines<br /><br />Experts used computer-assisted methods to predict how MSPs would behave with the coronavirus <br /><br />"A marine-derived drug for treating COVID could be something we see in the future."<br /><br /> <a href="https://t.co/2UWWE2Wyg3">https://t.co/2UWWE2Wyg3</a></p>— The Conversation (@ConversationUK) <a href="https://twitter.com/ConversationUK/status/1458721332250783747?ref_src=twsrc%5Etfw">November 11, 2021</a></blockquote> <div>आपको बता दें कि वैज्ञानिकों ने समुद्री सल्फेटेड पॉलीसेकेराइड्स पर कई पुराने शोध पढ़े हैं जिनमें पाया गया है कि पिछले 25 वर्षों में 80 वैज्ञानिक रिपोर्टों ने एमएसपी की विशिष्टता का खुलासा किया है। यह पदार्थ कई तरह के वायरस को दूर करने और उनके संक्रमण को रोकने की क्षमता रखता है। इसके बाद वैज्ञानिकों ने और अधिक शोध किया और प्रकृति से ऐसे 45 पदार्थों की खोज की जिनमें एंटीवायरल क्षमता है, लेकिन इसकी जांच होनी बाकी है। ये 45 समुद्री सल्फेटेड पॉलीसेकेराइड विभिन्न प्रकार के समुद्री स्रोतों से आते हैं। उदाहरण के लिए, शैवाल, सूक्ष्म शैवाल, समुद्री ककड़ी आदि।</div><div>वहीं हेपरिन एमएसपी के समान एक रसायन है। अब तक की जांच में यह कोरोनावायरस के खिलाफ काफी मजबूत है। यह कोविड-19 वायरस में मौजूद स्पाइक प्रोटीन से बांधता है। कोरोनावायरस को कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकता है। समस्या यह है कि हेपरिन इलाज के साथ साथ खून को पतला कर देता है, इसलिए यह कोविड दवा के रूप में उपयुक्त नहीं है। जबकि पाए गए 45 एमएसपी में से नौ में हेपरिन जैसी विशेषताएं हैं, जो उन्हें कोविड -19 के लिए एक प्रभावी दवा बनाती है। इन 9 पदार्थों का इस्तेमाल भविष्य में कोरोना की स्थाई दवा या वैक्सीन बनाने में किया जा सकता है।</div>                                                                            ]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फिचर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Nov 2021 21:05:49 +0530</pubDate>
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                <title>ऐसी नींद लगी कि ये जानवर ढाई हजार किमी दूर पहुंच गया!</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तरध्रुव पर दिखाई देने वाला वॉलरस आयरलैंड के समंदर किनारे दिखा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/79848/it-was-such-a-sleep-that-this-animal-reached-two-and-a-half-thousand-km-away"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2021-04/9842_s9-02042021.jpg" alt=""></a><br /><div><span style="font-size:1rem;">आयरलैंड के समंदर किनारे समुदी जीव वोलरस के दिखाई देने के कारण लोगों को काफी अचरज फ़ेल गया है। उत्तर ध्रुव के बर्फीले प्रदेशों में दिखाई देने वाला यह जीव आयरलैंड किस तरह पहुँच गया इसे लेकर लोगों में काफी प्रश्न घूम रहें है। आखिर कार जानकारों ने यह निष्कर्ष निकाला की यह वोलरस किसी हिमशीला पर सो रहा होगा और वह हिमशीला पानी में तैरते हुये वहाँ आ पहुंची होगी। </span><br /></div><div><span style="font-size:1rem;">जब वह उठा तो वह अपने प्रदेश से काफी दूर पहुँच गया था। आयरलैंड के सबसे नजदीक के दो स्थल है जहां यह जीव देखने मिलता है। पहला ग्रीनलेंड का किनारा और दूसरा स्वालबार्ड का किनारा। हालांकि यह दोनों टापू यहाँ से अनुक्रम ढाई और 3 हजार किलोमीटर दूर है। ऐसे में यह माना जा रहा है की वॉलरस ने अनजाने में ही यह सफर तय कर ली है। </span><br /></div><div><span style="font-size:1rem;">अब सबसे बड़ी दुविधा यह है की यदि वॉलरस इस पर्यावरण में नहीं रह पाया तो उसे वापिस कैसे भेजा जाएगा। एक हजार किलो के वजन वाले यह जीव उत्तरध्रुव के अलावा और कही नहीं देखने मिलते। इस जीव के बड़े दाँत के कारण इन्हें दूर से ही पहचाना जा सकता है। फिलहाल तो आयरलैंड के निवासी अपने समंदर के किनारे इस जीव को देखने का लुत्फ उठा रहे है। </span><br /></div>                                                                            ]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फिचर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Apr 2021 18:13:30 +0530</pubDate>
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