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                <title>High Court - Loktej</title>
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                <description>High Court RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सूरत : गर्मी में वकीलों को ड्रेस कोड में राहत, काले कोट से मिली छूट</title>
                                    <description><![CDATA[<p>सूरत।बार काउंसिल ऑफ़ गुजरात  के प्रयासों के बाद वकीलों को गर्मी के मौसम में ड्रेस कोड को लेकर बड़ी राहत मिली है। गुजरात हाई कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, राज्य की निचली अदालतों, सेशन और डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को हर साल 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक काला कोट पहनने से छूट दी गई है।</p>
<p>गौरतलब है कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया  के नियमों के तहत वकीलों के लिए निर्धारित ड्रेस कोड में काला कोट और टाई पहनना अनिवार्य होता है। हालांकि, गर्मियों के दौरान अत्यधिक गर्मी के कारण वकीलों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/146270/lawyers-get-relief-from-dress-code-in-surat-summer-exemption"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2021-05/7354_court-advocate-vakil-justice.jpg" alt=""></a><br /><p>सूरत।बार काउंसिल ऑफ़ गुजरात  के प्रयासों के बाद वकीलों को गर्मी के मौसम में ड्रेस कोड को लेकर बड़ी राहत मिली है। गुजरात हाई कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, राज्य की निचली अदालतों, सेशन और डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को हर साल 1 अप्रैल से 31 जुलाई तक काला कोट पहनने से छूट दी गई है।</p>
<p>गौरतलब है कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया  के नियमों के तहत वकीलों के लिए निर्धारित ड्रेस कोड में काला कोट और टाई पहनना अनिवार्य होता है। हालांकि, गर्मियों के दौरान अत्यधिक गर्मी के कारण वकीलों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता था, जिसमें डिहाइड्रेशन और अन्य गंभीर परेशानियां शामिल थीं।</p>
<p>इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए बार काउंसिल ऑफ गुजरात ने वर्ष 2009 में एक विशेष कमेटी गठित कर इस विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी थी। इसके आधार पर 18 मार्च 2009 को गुजरात हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 235 और क्रिमिनल मैनुअल 197 के तहत अधिसूचना जारी कर राहत प्रदान की।</p>
<p>नए प्रावधान के अनुसार, इस अवधि में वकीलों को काले कोट की जगह सफेद शर्ट, सफेद कॉलर और बार काउंसिल ऑफ गुजरात के लोगो वाली टाई पहनना अनिवार्य होगा। यह विशेष टाई बार काउंसिल ऑफ गुजरात के कार्यालय से निर्धारित शुल्क पर उपलब्ध कराई जाएगी।</p>
<p>इस फैसले से राज्यभर के वकीलों को गर्मी के मौसम में काम करने में काफी सहूलियत मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सूरत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 19:30:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, 26 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग को नहीं मिली गर्भपात की अनुमति</title>
                                    <description><![CDATA[<p>अहमदाबाद, 13 मार्च (वेब वार्ता)। गुजरात हाई कोर्ट ने वडोदरा की एक दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग द्वारा अपने 26 सप्ताह के भ्रूण को गिराने की याचिका खारिज कर दी है।</p>
<p>अदालत ने वडोदरा के एसएसजी (SSG) अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला सुनाया। डॉक्टरों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि गर्भधारण के इस उन्नत चरण में गर्भपात कराना नाबालिग के लिए सामान्य प्रसव की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति में प्रक्रिया अपनाने से नाबालिग की जान को गंभीर खतरा हो सकता है और यदि बच्चा जीवित पैदा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/145995/big-decision-of-gujarat-high-court-26-weeks-pregnant-minor"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-02/court-symbol5.jpg" alt=""></a><br /><p>अहमदाबाद, 13 मार्च (वेब वार्ता)। गुजरात हाई कोर्ट ने वडोदरा की एक दुष्कर्म पीड़िता नाबालिग द्वारा अपने 26 सप्ताह के भ्रूण को गिराने की याचिका खारिज कर दी है।</p>
<p>अदालत ने वडोदरा के एसएसजी (SSG) अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर यह फैसला सुनाया। डॉक्टरों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि गर्भधारण के इस उन्नत चरण में गर्भपात कराना नाबालिग के लिए सामान्य प्रसव की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक साबित हो सकता है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, इस स्थिति में प्रक्रिया अपनाने से नाबालिग की जान को गंभीर खतरा हो सकता है और यदि बच्चा जीवित पैदा होता है, तो उसे वेंटिलेटर सपोर्ट जैसी जटिलताओं की आवश्यकता होगी।</p>
<p>गर्भपात की अनुमति न देते हुए अदालत ने नाबालिग के भविष्य और सुरक्षा के लिए राज्य सरकार को कड़े निर्देश जारी किए हैं। हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि नाबालिग की डिलीवरी का पूरा खर्च सरकार वहन करेगी और जन्म के बाद छह महीने तक मां और बच्चे की देखभाल व इलाज की जिम्मेदारी भी प्रशासन की होगी।</p>
<p>यदि पीड़िता अपने परिवार के साथ नहीं रहना चाहती, तो उसे सरकारी महिला आश्रय गृह में रखने की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही, प्रसव के बाद यदि पीड़िता की इच्छा हो, तो बच्चे को किसी अधिकृत दत्तक ग्रहण एजेंसी (Adoption Agency) को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।</p>
<p>अदालत ने केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि पीड़िता के पुनर्वास पर भी जोर दिया है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को आदेश दिया गया है कि वे नाबालिग की आगे की शिक्षा और उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) की उचित व्यवस्था करें।</p>
<p>अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया है कि पूरी प्रक्रिया की निगरानी DLSA के सचिव करेंगे ताकि पीड़िता को किसी भी प्रकार की मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।</p>
<p>याचिकाकर्ता के वकील भौमिक शाह ने बताया कि अदालत का यह निर्णय पूरी तरह से मेडिकल बोर्ड द्वारा बताए गए चिकित्सकीय जोखिमों पर आधारित है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>गुजरात</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 16:30:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कामकाजी पत्नी के पक्ष में पारित गुजारा भत्ता आदेश रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रयागराज, 13 दिसंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक कामकाजी महिला के पक्ष में अधीनस्थ अदालत के गुजारा भत्ता आदेश को रद्द करते हुए कहा कि चूंकि महिला आय अर्जित कर रही है और उसके ऊपर कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए वह पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।</p>
<p>अंकित साहा द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा, “अधीनस्थ अदालत के आदेश पर गौर करने पर पता चलता है कि महिला ने अपने हलफनामा में स्वयं स्वीकार किया है कि वह एक स्नातकोत्तर ‘वेब डिजाइनर’ है और एक कंपनी में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/144563/allahabad-high-court-cancels-the-alimony-order-passed-in-favor"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2024-12/court-family-litigation-justice.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रयागराज, 13 दिसंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक कामकाजी महिला के पक्ष में अधीनस्थ अदालत के गुजारा भत्ता आदेश को रद्द करते हुए कहा कि चूंकि महिला आय अर्जित कर रही है और उसके ऊपर कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए वह पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है।</p>
<p>अंकित साहा द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा, “अधीनस्थ अदालत के आदेश पर गौर करने पर पता चलता है कि महिला ने अपने हलफनामा में स्वयं स्वीकार किया है कि वह एक स्नातकोत्तर ‘वेब डिजाइनर’ है और एक कंपनी में ‘सीनियर सेल्स कोऑर्डिनेटर’ के पद पर काम करते हुए प्रति माह 34,000 रुपये कमा रही है।”</p>
<p>अदालत ने कहा, “लेकिन जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि वह प्रति माह 36,000 रुपये कमा रही है। एक पत्नी के लिए जिस पर कोई अन्य जिम्मेदारी नहीं है, यह रकम मामूली नहीं कही जा सकती, जबकि अपीलकर्ता पर अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल और अन्य सामाजिक जिम्मेदारियां हैं।”</p>
<p>अदालत ने निष्कर्ष दिया कि सीआरपीसी की धारा 125(1)(ए) के तहत, प्रतिवादी अपने पति से गुजारा भत्ता मांगने की हकदार नहीं है, क्योंकि वह एक कमाऊ महिला है और अपना खर्च स्वयं उठा सकती है।</p>
<p>याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्रतिवादी ने अधीनस्थ अदालत में अपनी कमाई का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया और हलफनामा में खुद को बेरोजगार और निरक्षर बताया।</p>
<p>उन्होंने बताया कि जब अदालत में पति द्वारा दाखिल दस्तावेज प्रतिवादी को दिखाए गए, तो जिरह के दौरान उसने अपनी आय स्वीकार की।</p>
<p>अदालत ने तीन दिसंबर को पारित आदेश में कहा, “जो वादी सच का सम्मान नहीं करते और तथ्यों को छिपाने में संलिप्त रहते हैं, उनके मामले अदालत से बाहर फेंक दिए जाने चाहिए। इस प्रकार गौतम बुद्ध नगर की परिवार अदालत द्वारा 17 फरवरी 2024 को पारित आदेश को रद्द किया जाता है और मौजूदा आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार किया जाता।’’</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Dec 2025 15:06:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इंडिगो संकट पर उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से किया सवाल: ‘ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न हुई’</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, 10 दिसंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से बुधवार को सवाल किया कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई जिसके कारण इंडिगो की कई उड़ान रद्द करनी पड़ीं। अदालत ने इन हालात को “संकट” करार दिया।</p>
<p>उच्च न्यायालय ने कहा कि फंसे हुए यात्रियों को हुई परेशानी और उत्पीड़न के अलावा, यह अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान का भी सवाल है।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने यह सवाल भी किया कि ऐसी संकटपूर्ण स्थिति में दूसरी विमानन कंपनियां हालात का फायदा उठाकर यात्रियों से टिकटों के लिए भारी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/144504/high-court-questions-the-central-government-on-indigo-crisis-how"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-07/indigo1.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, 10 दिसंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से बुधवार को सवाल किया कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई जिसके कारण इंडिगो की कई उड़ान रद्द करनी पड़ीं। अदालत ने इन हालात को “संकट” करार दिया।</p>
<p>उच्च न्यायालय ने कहा कि फंसे हुए यात्रियों को हुई परेशानी और उत्पीड़न के अलावा, यह अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान का भी सवाल है।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने यह सवाल भी किया कि ऐसी संकटपूर्ण स्थिति में दूसरी विमानन कंपनियां हालात का फायदा उठाकर यात्रियों से टिकटों के लिए भारी कीमत कैसे वसूल सकती हैं।</p>
<p>अदालत ने सवाल किया, “जो टिकट 5,000 रुपये में मिल रहा था, उसका मूल्य 30,000 से 35,000 रुपये तक कैसे पहुंच गया? यदि यह संकट की स्थिति थी तो दूसरी विमानन कंपनियों को इसका लाभ कैसे उठाने दिया गया? किराया 35,000 और 39,000 रुपये तक कैसे पहुंच गया? अन्य विमानन कंपनियों ने शुल्क लेना कैसे शुरू कर दिया?”</p>
<p>पीठ ने इस मामले पर डेढ़ घंटे से अधिक समय तक सुनवाई की।</p>
<p>पीठ ने कहा कि यदि समिति द्वारा शुरू की गई जांच पूरी हो जाती है तो उसकी रिपोर्ट अगली तारीख 22 जनवरी को अदालत में सीलबंद लिफाफे में पेश की जाए।</p>
<p>अदालत ने कहा, “हम नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करते हैं, लेकिन हमें यह चिंता है कि आखिर ऐसी स्थिति कैसे उत्पन्न होने दी गई, जिसके कारण पूरे देश के हवाई अड्डों पर लाखों यात्री फंसे रहे।”</p>
<p>पीठ ने कहा, “यह न सिर्फ यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बना, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई, क्योंकि मौजूदा समय में यात्रियों का तेज आवागमन अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण पहलू है।”</p>
<p>केंद्र और नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की ओर से पेश वकील ने अदालत को सूचित किया कि कानूनी प्रावधान पूरी तरह लागू हैं और इंडिगो को कारण बताओ नोटिस जारी किया जा चुका है, जिसने काफी क्षमायाचना की है।</p>
<p>सरकार के वकील ने यह भी कहा कि यह संकट कई दिशानिर्देशों का अनुपालन न करने के कारण पैदा हुआ, जिनमें चालक दल के सदस्यों के उड़ान की ड्यूटी के घंटों से संबंधित नियम भी शामिल हैं।</p>
<p>अदालत ने कहा कि किराए में जो अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई थी, उसे अब नियंत्रित और सीमित कर दिया गया है, जो पहले किया जाना चाहिए था।</p>
<p>अदालत इंडिगो द्वारा सैकड़ों उड़ान रद्द किए जाने से प्रभावित यात्रियों को सहायता और भुगतान की गई राशि वापस दिलाने के लिए केंद्र को निर्देश देने संबंधी एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।</p>
<p>सुनवाई के दौरान पीठ ने इस बात पर असंतोष व्यक्त किया कि याचिका बिना सोच-विचार और दस्तावेजों के दाखिल कर दी गई।</p>
<p>इंडिगो की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि यह संकट कई कारणों और कुछ अप्रत्याशित समस्याओं के कारण उत्पन्न हुआ।</p>
<p>अदालत ने विमानन कंपनी को निर्देश दिया कि यात्रियों को न सिर्फ उड़ान रद्द होने के लिए बल्कि अन्य परेशानियों के लिए भी मुआवजा देने की व्यवस्था की जाए।</p>
<p>पीठ ने कहा, “चूंकि समिति का गठन हो चुका है और उसमें इंडिगो को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा, इसलिए हम फिलहाल उड़ान सेवाओं में व्यवधान के कारणों पर कोई टिप्पणी करने से परहेज करते हैं।”</p>
<p>पीठ ने कहा, “हमने यह मामला जनहित के तहत संज्ञान में लिया है, लेकिन यह स्पष्ट कर देते हैं कि हमारी टिप्पणियों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सरकार और विमानन कंपनी जनहित को सर्वोपरि रखें।”</p>
<p>अदालत ने यह निर्देश भी दिया कि स्थिति जल्द सामान्य की जाए और सभी विमानन कंपनियां पर्याप्त संख्या में पायलटों की नियुक्ति सुनिश्चित करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

                <link>https://www.loktej.com/article/144504/high-court-questions-the-central-government-on-indigo-crisis-how</link>
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                <pubDate>Wed, 10 Dec 2025 15:13:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों की मतगणना अब 21 दिसंबर को होगी : उच्च न्यायालय</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नागपुर, दो दिसंबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) को सभी स्थानीय निकाय चुनावों की मतगणना तीन दिसंबर के बजाय 21 दिसंबर को कराने का मंगलवार को निर्देश दिया।</p>
<p>अदालत ने 20 दिसंबर तक ‘एग्जिट पोल’ पर भी रोक लगा दी।</p>
<p>उच्च न्यायालय का यह निर्देश ऐसे दिन आया है, जब महाराष्ट्र में 264 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के लिए मंगलवार को मतदान प्रक्रिया जारी है।</p>
<p>एसईसी ने पिछले सप्ताह 24 स्थानीय निकायों के लिए चुनाव की तिथि पुननिर्धारित करते हुए 20 दिसंबर तय की थी।</p>
<p>उच्च न्यायालय एसईसी के 29 नवंबर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/144358/counting-of-votes-for-local-body-elections-in-maharashtra-will"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-02/court-symbol5.jpg" alt=""></a><br /><p>नागपुर, दो दिसंबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ ने महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) को सभी स्थानीय निकाय चुनावों की मतगणना तीन दिसंबर के बजाय 21 दिसंबर को कराने का मंगलवार को निर्देश दिया।</p>
<p>अदालत ने 20 दिसंबर तक ‘एग्जिट पोल’ पर भी रोक लगा दी।</p>
<p>उच्च न्यायालय का यह निर्देश ऐसे दिन आया है, जब महाराष्ट्र में 264 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के लिए मंगलवार को मतदान प्रक्रिया जारी है।</p>
<p>एसईसी ने पिछले सप्ताह 24 स्थानीय निकायों के लिए चुनाव की तिथि पुननिर्धारित करते हुए 20 दिसंबर तय की थी।</p>
<p>उच्च न्यायालय एसईसी के 29 नवंबर के संशोधित कार्यक्रम को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।</p>
<p>याचिकाओं में से एक में चंद्रपुर नगर परिषद के एक संभाग में चुनाव को 20 दिसंबर तक स्थगित किए जाने को चुनौती दी गई थी</p>
<p>हालांकि, संशोधित कार्यक्रम में शेष 26 वार्ड के लिए मतदान और परिणामों की घोषणा तथा मतगणना को मूल कार्यक्रम के अनुसार जारी रखने की अनुमति दी गई है।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं में से एक, सामाजिक कार्यकर्ता सचिन चुटे ने अनुरोध किया कि परिणामों की घोषणा ‘‘एक ही तिथि पर की जानी चाहिए, न कि अलग-अलग’’।</p>
<p>याचिका में दावा किया गया कि निर्वाचन आयोग के आदेश ने ‘‘इस मूलभूत सिद्धांत का उल्लंघन किया है कि चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष होने चाहिए और सभी उम्मीदवारों को समान अवसर प्रदान करने चाहिए’’।</p>
<p>चुटे के अधिवक्ता यश कुल्लरवार ने तर्क दिया कि सभी वार्ड के परिणाम एक साथ घोषित किए जाने चाहिए।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फिरदौस मिर्जा ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि उच्च न्यायालय ने स्थानीय निकाय चुनावों की मतगणना 21 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दी है।</p>
<p>उच्च न्यायालय एसईसी के संशोधित चुनाव कार्यक्रम के खिलाफ याचिकाओं पर अगली सुनवाई 10 दिसंबर को करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Dec 2025 15:44:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>घूस के पैसे से शेयरों में निवेश कर कमाया मुनाफा भी अपराध से अर्जित आय है : उच्च न्यायालय  </title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि घूस के पैसे से शेयर बाजार में निवेश करके कमाए गए मुनाफे को अपराध से अर्जित आय माना जाएगा और यह धन शोधन अपराध है।</p>
<p>अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने रिश्वत की राशि से निवेश किया है, तो उसकी कीमत बढ़ने पर भी उस धन का अवैध स्रोत शुद्ध नहीं हो जाता और यह बढ़ी हुई राशि भी उसी अवैध स्रोत से जुड़ी होती है।</p>
<p>न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने तीन नवंबर को दिए फैसले में कहा, ‘‘धन शोधन एक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/143881/profit-earned-by-investing-in-shares-with-bribe-money-is"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-09/delhi-high-court.-1.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि घूस के पैसे से शेयर बाजार में निवेश करके कमाए गए मुनाफे को अपराध से अर्जित आय माना जाएगा और यह धन शोधन अपराध है।</p>
<p>अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने रिश्वत की राशि से निवेश किया है, तो उसकी कीमत बढ़ने पर भी उस धन का अवैध स्रोत शुद्ध नहीं हो जाता और यह बढ़ी हुई राशि भी उसी अवैध स्रोत से जुड़ी होती है।</p>
<p>न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने तीन नवंबर को दिए फैसले में कहा, ‘‘धन शोधन एक सतत अपराध है, जो केवल अवैध धन अर्जित करने की प्रारंभिक क्रिया तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें उस धन के विभिन्न लेनदेन भी शामिल है।’’</p>
<p>पीठ ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई सरकारी अधिकारी रिश्वत लेकर उसे शेयर बाजार, रियल एस्टेट या मादक पदार्थ के धंधे में लगाता है, तो धन की अवैधता समाप्त नहीं होती और ऐसी पूरी राशि जब्ती योग्य होती है।</p>
<p>अदालत ने कहा, ‘‘यदि रिश्वत का पैसा शेयर बाजार में निवेश कर दिया जाए और बाद में उसका मूल्य बाजार परिस्थितियों के कारण बढ़ जाए, तो पूरा बढ़ा हुआ धन भी अपराध से अर्जित आय माना जाएगा।’’</p>
<p>यह फैसला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की अपील पर दिया गया, जिसमें उसने फतेहपुर कोल ब्लॉक आवंटन से संबंधित मामले में एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p>ईडी ने यह कहते हुए लगभग 122.74 करोड़ रुपये की संपत्ति को अस्थायी रूप से जब्त किया था कि कंपनी एम/एस प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने धोखाधड़ी से कोल ब्लॉक आवंटन प्राप्त किया और शेयरों की गलत जानकारी देकर शेयर की कीमतें बढ़ाईं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Nov 2025 14:15:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एसपी की मंजूरी के बिना वकीलों को समन नहीं भेज सकते जांच अधिकारी : उच्चतम न्यायालय</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, 31 अक्टूबर (भाषा) वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार की रक्षा के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण फैसले में उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को जांच एजेंसियों को मुवक्किलों को सलाह देने के वास्ते वकीलों को मनमाने ढंग से तलब करने पर रोक लगाने के लिए कई निर्देश जारी किए और कहा कि जांच अधिकारी आपराधिक जांच में उन्हें तब तक नहीं बुला सकते जब तक कि पुलिस अधीक्षक की मंजूरी न हो।</p>
<p>ईडी द्वारा वकीलों को भेजे गए समन को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह उन आरोपियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है जिन्होंने वकीलों को अपनी पैरवी के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/143803/investigating-officers-cannot-send-summons-to-lawyers-without-sps-approval"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2023-07/lawyer-justice-advocate-court-judge.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, 31 अक्टूबर (भाषा) वकील-मुवक्किल विशेषाधिकार की रक्षा के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण फैसले में उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को जांच एजेंसियों को मुवक्किलों को सलाह देने के वास्ते वकीलों को मनमाने ढंग से तलब करने पर रोक लगाने के लिए कई निर्देश जारी किए और कहा कि जांच अधिकारी आपराधिक जांच में उन्हें तब तक नहीं बुला सकते जब तक कि पुलिस अधीक्षक की मंजूरी न हो।</p>
<p>ईडी द्वारा वकीलों को भेजे गए समन को खारिज करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि यह उन आरोपियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है जिन्होंने वकीलों को अपनी पैरवी के लिए चुना था।</p>
<p>भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन तथा न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ ने ईडी द्वारा धन शोधन जांच के सिलसिले में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार और प्रताप वेणुगोपाल को तलब किए जाने के बाद स्वत: संज्ञान मामले में यह फैसला सुनाया।</p>
<p>पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा कि उसने वकीलों की सुरक्षा के लिए ‘‘नियम में छूट को सुसंगत बनाने’’ का अनुरोध किया है और जांच एजेंसियों के अनुचित दबाव से कानूनी पेशे की रक्षा के लिए नए निर्देश जारी किए हैं।</p>
<p>फैसले के मुख्य अंश सुनाते हुए न्यायाधीश ने कहा कि पीठ ने जांच एजेंसियों द्वारा समन जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट की निगरानी की आवश्यकता को खारिज कर दिया है।</p>
<p>न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा, ‘‘हमने साक्ष्य नियम को प्रक्रियात्मक नियम के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है और फिर निर्देश जारी किए हैं।’’</p>
<p>भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) की धारा 132 का हवाला देते हुए फैसले में कहा गया है कि यह मुवक्किल को दिया गया विशेषाधिकार है, जिसके तहत वकील को गोपनीय रूप से किए गए किसी भी व्यावसायिक संचार का खुलासा नहीं करना चाहिए।</p>
<p>पीठ ने कहा, ‘‘आपराधिक मामलों में जांच अधिकारी (आईओ), संज्ञेय अपराध में प्रारंभिक जांच करने वाले थाना प्रभारी अधिकारी, मामले का विवरण जानने के लिए अभियुक्त की पैरवी करने वाले वकील को समन जारी नहीं करेंगे, जब तक कि यह बीएसए की धारा 132 के तहत किसी भी अपवाद के अंतर्गत शामिल न हो।’’</p>
<p>उसने कहा, ‘‘जब किसी अपवाद के तहत अधिवक्ता को समन जारी किया जाता है, तो उसमें विशेष रूप से उन तथ्यों को निर्दिष्ट किया जाएगा, जिनके कारण अपवाद का सहारा लेना पड़ा और यह पुलिस अधीक्षक के पद के वरिष्ठ अधिकारी की सहमति से जारी किया जाएगा, जो समन जारी होने से पहले अपवाद के संबंध में लिखित रूप में अपनी संतुष्टि दर्ज करेगा।’’</p>
<p>इसमें कहा गया है कि अधिवक्ताओं को जारी किए गए समन भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत अधिवक्ता या मुवक्किल के कहने पर न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।</p>
<p>इसमें कहा गया है कि दस्तावेज प्रस्तुत करने के संबंध में संबंधित न्यायालय ही पक्षों की सुनवाई के बाद दस्तावेज प्रस्तुत करने के आदेश तथा उनकी स्वीकार्यता के संबंध में किसी भी आपत्ति पर निर्णय करेगा।</p>
<p>फैसले में कहा गया है कि यदि कोई डिजिटल उपकरण प्रस्तुत किया जाता है, तो न्यायालय उस पक्ष को नोटिस जारी करेगा, जिसके संबंध में डिजिटल उपकरण से विवरण प्राप्त करने की मांग की जा रही है तथा किसी भी आपत्ति पर उसे तथा वकील को सुना जाएगा।</p>
<p>इसमें कहा गया है कि यदि आपत्तियों को खारिज कर दिया जाता है, तो उपकरण को पक्षकार और अधिवक्ता की उपस्थिति में खोला जा सकता है, जिन्हें उनकी पसंद के विशेषज्ञों की सहायता प्रदान की जाएगी।</p>
<p>इसमें कहा गया है, ‘‘डिजिटल उपकरण की जांच करते समय अन्य मुवक्किलों की गोपनीयता से समझौता नहीं किया जाएगा।’’</p>
<p>हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘‘इन-हाउस वकील’’, जो अदालतों में वकालत नहीं कर रहे हैं, उन्हें बीएसए की धारा 132 के तहत दी गई सुरक्षा नहीं मिलेगी।</p>
<p>धारा 132 वकीलों के अपने मुवक्किलों के साथ पेशेवर संचार से संबंधित है।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय ने 12 अगस्त को खुद को देश के सभी नागरिकों का ‘‘संरक्षक’’ बताया था और मामलों में मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करते समय जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को तलब किए जाने के संबंध में स्वत: संज्ञान मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।</p>
<p>ईडी द्वारा दातार और वेणुगोपाल को तलब किए जाने के बाद न्यायालय ने इस मामले में सुनवाई शुरू की थी। दातार और वेणुगोपाल को समन भेजे जाने की ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (एससीबीए) और ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (एससीएओआरए) ने तीखी आलोचना की थी और इसे कानूनी पेशे को कमजोर करने के लिए ‘‘परेशान करने वाली प्रवृत्ति’’ बताया था।</p>
<p>विवाद के बाद ईडी ने 20 जून को आंतरिक निर्देश जारी कर अपने अधिकारियों को निदेशक की पूर्व स्वीकृति और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 132 के अनुपालन के अलावा धन शोधन के मामलों में वकीलों को तलब करने से रोक दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Oct 2025 15:18:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुमार सानू के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा की</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने गायक कुमार सानू के व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की रक्षा करते हुए सोशल मीडिया से उनके आपत्तिजनक वीडियो हटाए जाने का बुधवार को आदेश दिया।</p>
<p>न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने मौखिक रूप से कहा कि वह सानू के अधिकारों की रक्षा और आपत्तिजनक सामग्री को हटाए जाने के लिए एक विस्तृत अंतरिम निषेधाज्ञा पारित करेंगे।</p>
<p>अदालत कुमार सानू की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उनके नाम, आवाज, गायन शैली एवं तकनीक, गायन व्याख्या, गायन के तौर-तरीके, छवियों, व्यंग्यचित्रों, तस्वीरों और हस्ताक्षर समेत उनके व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/143623/delhi-high-court-protects-personality-rights-of-kumar-sanu"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-09/delhi-high-court.-1.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, 15 अक्टूबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने गायक कुमार सानू के व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की रक्षा करते हुए सोशल मीडिया से उनके आपत्तिजनक वीडियो हटाए जाने का बुधवार को आदेश दिया।</p>
<p>न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा ने मौखिक रूप से कहा कि वह सानू के अधिकारों की रक्षा और आपत्तिजनक सामग्री को हटाए जाने के लिए एक विस्तृत अंतरिम निषेधाज्ञा पारित करेंगे।</p>
<p>अदालत कुमार सानू की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उनके नाम, आवाज, गायन शैली एवं तकनीक, गायन व्याख्या, गायन के तौर-तरीके, छवियों, व्यंग्यचित्रों, तस्वीरों और हस्ताक्षर समेत उनके व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की सुरक्षा का अनुरोध किया गया था।</p>
<p>गायक ने तीसरे पक्ष द्वारा अनधिकृत या बिना लाइसेंस के उपयोग और व्यावसायिक दोहन के खिलाफ भी रक्षा का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि इससे आम जनता से धोखा और उनमें भ्रम की स्थिति पैदा होने की संभावना है।</p>
<p>सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि प्रतिवादियों में से एक के वकील ने दलील दी कि सानू ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर चार प्रोफाइल के बारे में शिकायत दर्ज कराई है और वादी द्वारा उपलब्ध कराए गए 334 यूआरएल अनुपलब्ध हो गए हैं।</p>
<p>अधिवक्ताओं शिखा सचदेवा और सना रईस खान के माध्यम से दायर इस मुकदमे में सानू को उनकी प्रस्तुतियों के दौरान कॉपीराइट अधिनियम के प्रावधानों के तहत प्रदत्त उनके नैतिक अधिकारों का भी उल्लंघन किए जाने का आरोप लगाया गया है।</p>
<p>याचिका में दावा किया गया है कि प्रतिवादी गायक के नाम, उनकी आवाज, समानता और प्रचार अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं।</p>
<p>हाल में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय बच्चन, उनके पति अभिषेक बच्चन, अभिनेता ऋतिक रोशन, फिल्मकार करण जौहर, तेलुगु अभिनेता अक्किनेनी नागार्जुन, ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के संस्थापक श्री श्री रविशंकर और पत्रकार सुधीर चौधरी ने भी अपने व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की रक्षा का अनुरोध करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था और अदालत ने उन्हें अंतरिम राहत प्रदान की थी।</p>
<p>प्रचार का अधिकार, जिसे व्यक्तित्व अधिकार के रूप में जाना जाता है, किसी की छवि, नाम या समरूपता की रक्षा करने, उसे नियंत्रित करने एवं उससे लाभ प्राप्त करने से जुड़ा अधिकार है।</p>
<p>सानू ने उनकी प्रस्तुतियों और आवाज से संबंधित ऐसे ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग का मुद्दा उठाया है जो उनकी बदनामी करते हैं और उन्हें "अप्रिय हास्य" का विषय बनाते हैं जिससे उनके नैतिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।</p>
<p>उन्होंने अपनी आवाज, गायन शैली और तकनीक, गायन के तरीके तथा उनके चेहरे के साथ छेड़छाड़ करके कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल कर बनाई गई सामग्री का भी मुद्दा उठाया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फिचर</category>
                                    

                <link>https://www.loktej.com/article/143623/delhi-high-court-protects-personality-rights-of-kumar-sanu</link>
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                <pubDate>Wed, 15 Oct 2025 14:49:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>करिश्मा के बच्चों को 1900 करोड़ रुपये मिले, और उन्हें क्या चाहिए: संजय कपूर की पत्नी ने पूछा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की पत्नी प्रिया कपूर ने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि संजय की पूर्व पत्नी करिश्मा कपूर के दोनों बच्चों को पारिवारिक ट्रस्ट से पहले ही 1,900 करोड़ रुपये मिल चुके हैं तथा ‘‘उन्हें और क्या चाहिए?’’</p>
<p>संजय और करिश्मा के बच्चों ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर अपने दिवंगत पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगी है और आरोप लगाया कि प्रिया ने जायदाद पर कब्जा करने के लिए संजय कपूर की वसीयत रची है।</p>
<p>हालांकि, न्यायमूर्ति ज्योति सिंह के समक्ष किए गए दावों का विरोध करते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/143001/karishmas-children-got-rs-1900-crore-and-what-they-want"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-09/delhi-high-court.-1.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, 10 सितंबर (भाषा) दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की पत्नी प्रिया कपूर ने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि संजय की पूर्व पत्नी करिश्मा कपूर के दोनों बच्चों को पारिवारिक ट्रस्ट से पहले ही 1,900 करोड़ रुपये मिल चुके हैं तथा ‘‘उन्हें और क्या चाहिए?’’</p>
<p>संजय और करिश्मा के बच्चों ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर अपने दिवंगत पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगी है और आरोप लगाया कि प्रिया ने जायदाद पर कब्जा करने के लिए संजय कपूर की वसीयत रची है।</p>
<p>हालांकि, न्यायमूर्ति ज्योति सिंह के समक्ष किए गए दावों का विरोध करते हुए प्रिया के वकील ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है कि लोगों को सड़कों पर छोड़ दिया गया है।’’</p>
<p>उन्होंने कहा कि वसीयत पंजीकृत नहीं थी, लेकिन यह ‘अवैध’ नहीं है।</p>
<p>न्यायाधीश ने पूछा था कि क्या वसीयत पंजीकृत की गई थी।</p>
<p>वकील ने कहा, ‘‘यह पंजीकृत नहीं है। अपंजीकृत होने से इसकी प्रकृति समाप्त नहीं होती। एक निर्णय है जो कहता है कि अपंजीकृत होने से इसकी वैधता समाप्त नहीं होती। जब मैं वसीयत तैयार करूंगा, तो मेरी पत्नी को यह जांचने का अधिकार होगा कि क्या यह संदिग्ध प्रकृति की है। मुकदमे से महज छह दिन पहले यह सब रोना-धोना चल रहा है। वादियों को ट्रस्ट से 1900 करोड़ रुपये मिले। वे और क्या चाहते हैं?’’</p>
<p>इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने अभिनेत्री करिश्मा कपूर के दोनों बच्चों- समायरा कपूर (20) और नाबालिग बेटे (15) द्वारा दायर एक याचिका दर्ज की, जिसमें उनके दिवंगत पिता संजय कपूर की कथित वसीयत को चुनौती दी गई थी।</p>
<p>अदालत ने साथ ही, बच्चों की सौतेली मां प्रिया कपूर को नोटिस जारी किया और सुनवाई नौ अक्टूबर तक स्थगित कर दी।</p>
<p>न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नोटिस जारी किया जाए। दो हफ्ते में जवाब दिया जाए, उसके एक हफ्ते बाद प्रत्युत्तर दें। जवाबों के साथ, प्रतिवादी 1 (प्रिया) प्रतिवादी 1 को ज्ञात सभी चल और अचल संपत्तियों की सूची दाखिल करेंगी। संपत्ति 12 जून तक घोषित की जानी है। सुनवाई की अगली तारीख 9 अक्टूबर है।’’</p>
<p>वकील ने संजय के साथ पहले चल रहे करिश्मा के तलाक के मामले का भी उल्लेख किया।</p>
<p>इस बीच, संजय की मां रानी कपूर ने भी वसीयत को चुनौती देते हुए कहा कि उनके पास कुछ नहीं बचा और पूरी प्रक्रिया ‘अपवित्र’ रही।</p>
<p>याचिका में दावा किया गया है कि न तो संजय कपूर ने वसीयत का जिक्र किया, न ही प्रिया कपूर या किसी अन्य व्यक्ति ने इसके अस्तित्व का जिक्र किया।</p>
<p>इसमें आरोप लगाया गया है कि प्रिया कपूर का आचरण ‘‘बिना किसी संदेह के, यह दर्शाता है कि कथित वसीयत उनके द्वारा गढ़ी गई है’’।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Sep 2025 14:07:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुत्ते इंसानों के अच्छे दोस्त हैं, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए : दिल्ली उच्च न्यायालय</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि कुत्ते इंसानों के अच्छे दोस्त हैं और उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए। साथ ही न्यायालय ने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि राजधानी में कुत्ते-मानव संघर्ष को कम किया जाए।</p>
<p>न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों को आवारा कुत्तों के पुनर्वास के संबंध में सिफारिशें देने का निर्देश दिया।</p>
<p>अदालत ने कहा, ‘‘कुत्ते दुनिया के सबसे प्यारे जानवर हैं और इंसानों के सबसे अच्छे दोस्त हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कुत्तों की सुरक्षा की जाए और उनके साथ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/142390/dogs-are-good-friends-of-humans-they-should-be-treated"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2021-12/2241_labrador-retriever-dog-pet-tongue-out-animal.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि कुत्ते इंसानों के अच्छे दोस्त हैं और उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाना चाहिए। साथ ही न्यायालय ने अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि राजधानी में कुत्ते-मानव संघर्ष को कम किया जाए।</p>
<p>न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अधिकारियों और अन्य संबंधित पक्षों को आवारा कुत्तों के पुनर्वास के संबंध में सिफारिशें देने का निर्देश दिया।</p>
<p>अदालत ने कहा, ‘‘कुत्ते दुनिया के सबसे प्यारे जानवर हैं और इंसानों के सबसे अच्छे दोस्त हैं। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कुत्तों की सुरक्षा की जाए और उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए।’’</p>
<p>यह बताए जाने पर कि लगभग 70 प्रतिशत कुत्तों की नसबंदी से समस्या का समाधान हो जाएगा, न्यायाधीश ने कहा कि प्रस्तावित समाधान पिछले तीन दशकों से जारी था, लेकिन कोई बदलाव नहीं आया।</p>
<p>अदालत ने कहा, ‘‘नसबंदी बिल्कुल भी कारगर नहीं है। यह समाधान नहीं है।’’</p>
<p>यह भी अदालत के संज्ञान में लाया गया कि लगभग 200 कुत्ते, जिन्हें पहले एक आश्रय गृह में भेजा गया था, अब सड़क पर छोड़े जाने वाले हैं क्योंकि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) द्वारा उस अस्थायी आश्रय गृह को ध्वस्त किया जाना है।</p>
<p>अदालत ने कहा कि दिल्ली के मुख्य सचिव द्वारा आयोजित बैठक में केवल कुत्तों की नसबंदी का प्रस्ताव ही आया था।</p>
<p>अदालत ने कहा कि विभिन्न पशु जन्म नियंत्रण केंद्र काम नहीं कर रहे हैं और 78 पशु चिकित्सालय बंद पड़े हैं।</p>
<p>अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर के लिए निर्धारित की।</p>
<p>इससे पहले, उच्च न्यायालय ने राजधानी के अधिकारियों से संस्थागत स्तर पर आवारा कुत्तों के पुनर्वास के लिए एक नीति बनाने को कहा था ताकि उन्हें सड़कों और गलियों से चरणबद्ध तरीके से हटाया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Aug 2025 20:46:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Loktej]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस: सबूतों के अभाव में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 12 आरोपियों को किया बरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मुंबई, 21 जुलाई (वेब वार्ता)। वर्ष 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया है। इस मामले में 12 आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट की ओर से इन्हें जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया है।</p>
<p>कोर्ट ने विशेष टाडा न्यायालय की ओर से दोषी ठहराए गए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। इनमें से 5 को मृत्युदंड और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्दोष करार देते हुए उन्हें तुरंत जेल से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/142048/2006-mumbai-train-blast-case-bombay-high-court-acquitted-12"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2022-10/1842_mumbai-bombay-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p>मुंबई, 21 जुलाई (वेब वार्ता)। वर्ष 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाया है। इस मामले में 12 आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट की ओर से इन्हें जेल से रिहा करने का आदेश दिया गया है।</p>
<p>कोर्ट ने विशेष टाडा न्यायालय की ओर से दोषी ठहराए गए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया है। इनमें से 5 को मृत्युदंड और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्दोष करार देते हुए उन्हें तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है।</p>
<p>यह फैसला 19 साल बाद आया है। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस. चांडक की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों में कोई ठोस आधार नहीं था। कोर्ट ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।</p>
<p>हाईकोर्ट ने न केवल आरोपियों की अपील को स्वीकार किया, बल्कि राज्य सरकार की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें मृत्युदंड की मांग की गई थी।</p>
<p>यह मामला 11 जुलाई 2006 का है, जब मुंबई की लोकल ट्रेनों में शाम के समय मात्र 11 मिनट के अंदर सात अलग-अलग जगहों पर सीरियल बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की जान चली गई थी और 827 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था।</p>
<p>नवंबर 2006 में इस मामले में चार्जशीट दाखिल की गई थी। इसके बाद 2015 में ट्रायल कोर्ट ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसमें 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।</p>
<p>इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। जनवरी 2025 में इस मामले की सुनवाई पूरी हुई थी, और तब से कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। येरवडा, नाशिक, अमरावती और नागपुर जेल में बंद आरोपियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Jul 2025 16:02:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Bhatu Patil]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिना सुनवाई के कैदी को हिरासत में रखना मुकदमा पूर्व सजा के समान, जमानत नियम है: अदालत</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="content-profession">
<p>मुंबई, 11 मई (भाषा) जमानत के सिद्धांत को नियम और इनकार को अपवाद बताते हुए बंबई उच्च न्यायालय ने कहा कि बिना सुनवाई के किसी कैदी को लंबे समय तक हिरासत में रखना ‘मुकदमे से पहले सजा’ के समान है।</p>
<p>न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की पीठ ने नौ मई को राज्य की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों के होने का भी संज्ञान लिया और कहा कि अदालतों को संतुलन बनाने की जरूरत है।</p>
<p>पीठ ने 2018 में अपने भाई की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार विकास पाटिल को जमानत देते हुए ये टिप्पणियां कीं।</p>
<p>न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि</p></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.loktej.com/article/140690/keeping-a-prisoner-in-custody-without-hearing-is-a-bail"><img src="https://www.loktej.com/media/400/2024-12/court-justice-law-order-customer-protection.jpg" alt=""></a><br /><div class="content-profession">
<p>मुंबई, 11 मई (भाषा) जमानत के सिद्धांत को नियम और इनकार को अपवाद बताते हुए बंबई उच्च न्यायालय ने कहा कि बिना सुनवाई के किसी कैदी को लंबे समय तक हिरासत में रखना ‘मुकदमे से पहले सजा’ के समान है।</p>
<p>न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की पीठ ने नौ मई को राज्य की जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों के होने का भी संज्ञान लिया और कहा कि अदालतों को संतुलन बनाने की जरूरत है।</p>
<p>पीठ ने 2018 में अपने भाई की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार विकास पाटिल को जमानत देते हुए ये टिप्पणियां कीं।</p>
<p>न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि आजकल मुकदमों को पूरा होने में काफी समय लग रहा है और कुछ क्षेत्रों में जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं।</p>
<p>पीठ ने कहा कि वह नियमित रूप से ऐसे मामलों की सुनवाई करती है, जहां विचाराधीन कैदी लंबे समय से हिरासत में हैं तथा वह जेलों की स्थिति से भी अच्छी तरह वाकिफ है।</p>
<p>न्यायमूर्ति जाधव ने आर्थर रोड जेल के अधीक्षक की दिसंबर 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जेल में स्वीकृत क्षमता से छह गुना अधिक कैदी हैं।</p>
<p>न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक बैरक में केवल 50 कैदियों को रखने की अनुमति होती है, लेकिन आज की तारीख में वहां 220- 250 कैदी हैं।</p>
<p>न्यायमूर्ति जाधव ने कहा, ‘‘इस तरह की असंगति हमें इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए प्रेरित करती है: न्यायालय दो ध्रुवों के बीच संतुलन कैसे बना सकता है?’’</p>
<p>अदालत ने कहा कि ये मामले विचाराधीन कैदियों की स्वतंत्रता से संबंधित हैं, जो लंबे समय से जेल में बंद हैं, जिससे उनके त्वरित न्याय पाने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार पर असर पड़ता है।</p>
<p>अदालत ने कहा कि मूल नियम यह है कि जमानत नियम है और इनकार अपवाद है।</p>
<p>न्यायमूर्ति जाधव ने दो विचाराधीन कैदियों द्वारा लिखे गए लेख ‘प्रूफ ऑफ गिल्ट’ का हवाला दिया, जिसमें मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे व्यक्तियों की लंबी कैद पर सवाल उठाया गया था।</p>
<p>उन्होंने कहा कि केवल लंबी कारावास अवधि को जमानत के लिए पूर्ण आधार नहीं माना जा सकता, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसपर त्वरित सुनवाई के अधिकार के साथ विचार किया जाना चाहिए।</p>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ज़रा हटके</category>
                                            <category>प्रादेशिक</category>
                                    

                <link>https://www.loktej.com/article/140690/keeping-a-prisoner-in-custody-without-hearing-is-a-bail</link>
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                <pubDate>Sun, 11 May 2025 18:45:02 +0530</pubDate>
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                            </item>

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