भक्तिकाल के अद्भुत कवि: सूरदास


आज मध्यकालीन युग के एक महान भक्त कवि सूरदास की जन्मजयंती है। वैसाख शुक्ला पंचमी के दिन ही उनका आविर्भाव इस संसार मे हुआ था।
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आज मध्यकालीन युग के एक महान भक्त कवि सूरदास की जन्मजयंती है। वैसाख शुक्ला पंचमी के दिन ही उनका आविर्भाव इस संसार मे हुआ था। मुझे भक्तिकालीन कवियों में तुलसीदास, कबीरदास, तथा सूरदास विशेष प्रिय है। कृष्णभक्ति के इनके पद वाकई में अद्भुत है। सूरदास नेत्रहीन थे, यह निर्विवाद है, किंतु वे जन्मांध थे या बाद में अंधे हुए, यह विवादग्रस्त है । उनके काव्य में दृश्य जगत् का जैसा यथार्थ वर्णन मिलता है वैसा बिना आँखों देखे किसी से संभव नहीं है। राधा-कृष्ण के रूप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

हालांकि सूरसागर के कई पदों में उन्होंने खुद को जन्म का अंधा ओर अभागा कहा है, फिर भी इस बारे में मतभिन्नता बरकरार है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व शक्ति के बारे में लिखा है कि सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है।

ओर यह निनान्त सत्य भी है आप कई पदों में यह पाओगे जो उन्होंने कृष्ण प्रेम में, राधाकृष्ण संवाद में, भृमर गीत में लिखे है।

सूरदास के गुरु श्रीमद वल्लभाचार्य जी थे जिन्होंने उन्हें भागवत का ज्ञान दिया था। उनके कई पदों में उनका भी जिक्र किया गया है। इसके बाद उन्हें श्रीकृष्ण का गुणगान शुरू कर दिया और जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इससे पहले वह केवल दैन्य भाव से विनय के पद रचा करते थे। वात्सल्य तथा श्रृंगार रस में उन्हें महारत हासिल थी।

सूरदास जी द्वारा लिखित पांच ग्रन्थ बताएं जाते हैं। जिनमें से सूर सागर, सूर सारावली और साहित्य लहरी के प्रमाण मिलते हैं। जबकि नल-दमयन्ती और ब्याहलो का कोई प्रमाण नहीं मिलता। नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के 16 ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। सूरसागर में करीब एक लाख पद होने की बात कही जाती है। वर्तमान संस्करणों में करीब पांच हजार पद ही मिलते हैं। सूर सारावली में 1107 छन्द हैं। इसकी रचना संवत 1602 में होने का प्रमाण मिलता है। वहीं साहित्य लहरी 118 पदों की एक लघु रचना है। रस की दृष्टि से यह ग्रन्थ श्रृंगार की कोटि में आता है।

वात्सल्य और श्रुंगार के क्षेत्रों का जितना सूक्षम चित्रण सूर ने अपनी बंद आँखों से किया उतना और किसी नेत्रवाले कवि ने नहीं । इन क्षेत्रों का तो वे कोना-कोना झाँक आए हैं । उनके अनेक पद एक-दूसरे से लताओं व वृक्षों की भाँति गुँथे हुए मिलते हैं । प्रस्तुत पद में हमें माता यशोदा के वात्सल्य और स्नेह का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है, जब वे अपनी सुमधुर लोरियाँ गा-गाकर बालक कृष्ण को पालने में सुला रही हैं,
“यशोदा हरि पालने झुलावै । हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै।”

प्रेम संगीतमय जीवन की एक चलती धारा है, जिसमें अवगाहन करनेवाले को दिव्य माधुर्य के अतिरिक्त और कहीं कुछ नहीं दिखाई देता ।

राधा-कृष्ण के रंग-रहस्य के इतने प्रकार के चित्र सामने आते हैं कि सूर का हृदय प्रेम की नाना उमंगों का अक्षय भंडार प्रतीत होता है ।

इसके विपरीत जब वो विरह का वर्णन करते है तो बहुत ही अनुपम जान पड़ता है। उध्दव गोपी संवाद का गोपी गीत एक विलक्षण रचना है जिसमे कृष्ण के कहने पर निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देने उद्धव गोकुल जाते है।

अविगत गति कछु कहत न पावे,
ज्यो गुंगहि मीठे फल को रस अंतरगत ही भावे।

उसके बाद उद्धव का हृदय परिवर्तन, वाकई में अद्भुत वर्णन है।

वर्तमान पीढ़ी को सुर तथा तुलसी के साहित्य का अध्ययन करना ही चाहिए जिससे उनके ज्ञान के साथ भक्ति का भी परिमार्जन हो सके।

आज उनके साथ ही आदि शंकराचार्य की भी जन्मजयंती है जिन्होंने भारतवर्ष में पुनः सनातन धर्म की स्थापना की थी।

महापुरुषों के अनुपम इतिहास वाले इस देश मे हम जन्म लिए है तो धन्यता अनुभव कर रहे है लेकिन यह सही मायने में तभी होगी जब हम उनके बारे में जानकर अनुशरण भी करेंगे।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय