धर्म पर टिप्पणी क्यो?


हमारा देश धर्म के नाम पर विभाजन हुआ था। उस समय हमारे तत्कालीन नेताओ ने हमारे देश को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा दिया था ।
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आज जो लिख रहा हूँ हो सकता है उससे आप सहमत न हो, हो सकता है आपको यह भी लगे कि मेरे ऊपर संघी मानसिकता हावी हो रही है, हो सकता है आप मुझे वामपंथी विचारधारा का विरोधी समझ लो, लेकिन ऐसा कुछ भी नही है। मैं आज का लेख लिखने से पूर्व यह बड़ी जिम्मेदारी से लिख रहा हूँ कि यह लेख भारत का वो नागरिक लिख रहा है जो सर्व धर्म समभाव में विश्वास रखता है, जो सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैदिक कालीन धारणा में विश्वास रखता है, जो वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धांत का अनुसरणकर्ता है। यह सत्य है कि मैं संघ विचारधारा का प्रबल समर्थक हूँ तथा मेरे व्यक्तित्व में कही न कही वो झलकती भी है, मेरी पहचान अन्य बातों से ज्यादा मेरे स्वयंसेवक होने की ज्यादा है पर मैंने आज दिन तक कभी भी मेरे लेखन में इसका प्रभाव केवल शब्द संरचना के अलावा नही आने दिया है ओर आज भी नही है।

हमारा देश जब आजाद हुआ था तब इसका धर्म के नाम पर विभाजन हुआ था। उस समय हमारे तत्कालीन नेताओ ने हमारे देश को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का दर्जा दिया था तथा सभी धर्मों को समान आदर देते हुए ही संविधान की रचना की थी। तथा यह आज तक है भी।
लेकिन जिस धर्म के हिस्से में यह भूभाग आया था वो हिन्दू धर्म बारबार यहां पर हासिये पर लाया गया। बारबार इसपर प्रश्नचिन्ह लगाया गया। बारबार इसके देवी देवताओं पर अनर्गल टिप्पणियां की गई। लेकिन हिन्दू धर्मावलंबियों द्वारा कोई विशेष प्रतिकार नही किया गया। इन सब मे विशेष बात यह भी रही कि ऐसा करने वाले ज्यादातर हिन्दू ही थे। जहां अन्य देशों में ईशनिंदा अपराध है वही यहां पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस विषय पर भी कुछ भी बोला जाता रहा है। यहां पर भगवान राम पर भी टिप्पणियां करते हुए कोई हिचकिचाहट नही होती है।

वर्तमान में हमारे देश मे चुनाव चल रहे है। यह बात निश्चित है कि अपनी विचारधारा के मतदाताओं का हर कोई पार्टी ध्रुवीकरण करती है ताकि वो लामबंद होकर उसे वोट दे तथा विजयश्री उसे प्राप्त हो। लेकिन क्या भिन्न विचारधारा वाले पर अनर्गल टिप्पणी वाजिब है? चुनाव आयोग कई बयानों पर एक्शन ले चुका है लेकिन नेता हैं कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। ताजा बयान सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी का आया है, जिसमें उन्होंने सवाल किया है कि क्या हिंदू हिंसक नहीं है, का दावा सही है?

सीताराम येचुरी ने कहा कि रामायण और महाभारत भी लड़ाई और हिंसा से भरी हुई थीं, लेकिन एक प्रचारक के तौर आप सिर्फ महाकाव्य के तौर पर उसे बताते हैं, उसके बाद भी दावा करते हैं कि हिंदू हिंसक नहीं है।

येचुरीजी को मैं कहना चाहता हूं कि उन सद्ग्रन्थों में आपको हिंसा तो दिख गई लेकिन उसका कारण तथा उसके सदुपदेश क्यो नही दिखाई दिए? उन ग्रन्थों में हिंसा किस कारण हुई उसका पता लगाया? महाभारत के युद्ध मे आमने सामने के पक्षो में भी जो तालमेल था उसका क्या आपने हिन्दू होने के नाते भी अध्ययन किया है? केवल एक पक्ष को देखकर बिना अध्ययन के सीधा धर्म पर अपनी राजनीति के लिए प्रश्नचिन्ह लगाना कहाँ तक जायज है?

इसके अलावा वो नेता भी विचार करे जो मुस्लिम धर्म पर प्रश्नचिन्ह लगाते है तथा वो भी विचार करे जो मुस्लिमो तथा हिंदुओ के वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए इनके मध्य वैमनस्यता का बीज बोते है।

यह देश प्राचीन काल से प्रेम तथा सद्भावना का संदेश देता रहा है। यहां की संस्कृति में परस्पर देवो भवः की भावना सदैव रही है फिर क्यो इस प्रकार की भावनाएं नेताओ द्वारा जनमानस पर उड़ेली जाती है? बस मेरा प्रश्न यही है और उत्तर आप सभी के पास है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय