रुख हवाओ का जिधर का है, उधर के ये है।


वर्तमान विश्व मे ऐसे भी कोई नेता बिना अपने फायदे को देखे कोई काम नही करते है, बाते करना अलग बात है।
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सत्ता का रंग बड़ा इंद्रधनुषी होता है, किसी को भी ललचा देता है। वर्तमान विश्व मे ऐसे भी कोई नेता बिना अपने फायदे को देखे कोई काम नही करते है, बाते करना अलग बात है। फायदा ही सबसे बड़ा कायदा आजकल बन रखा है, उसके सामने सभी कायदे, सभी विचारधाराएं धूमिल हो जाती है। येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति लगभग हर नेता का लक्ष्य होता है। जनता को भले ही वो सेवा का लक्ष्य बताते हो, यह बात अलग है।

अभी कल ही गुजरात मन्त्रीमण्डल का विस्तार हुआ है। तीन मंत्रियों को इसमे शामिल किया गया है जिनमे एक केबिनेट मंत्री तथा दो राज्यमंत्री शामिल है। इन तीनो मंत्रियों में दो मूल कांग्रेसी विचारधारा के व्यक्ति है, उनमे से एक जवाहर चावड़ा तो परसो ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए है। भाजपा का दामन थामते ही उन्हें उपहार स्वरूप या कहे कि वेलकम गिफ्ट के तौर पर केबिनेट मंत्री पद मिल गया है। इसके अलावा धर्मेंद्र सिंह जडेजा भी इसी विधानसभा चुनाव में भाजपा में शामिल हुए थे। उन्हें भी राज्यमंत्री का पद देकर थोड़ा देर से वेलकम किया गया है।

इससे पहले भी काफी नेता इधर से उधर हुए है। आपने निदा फाजली की वो गजल तो सुनी ही होगी,

“अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं”

बस कमोबेश वही बात इन नेताओं पर भी लागू होती है जो हवा के रुख के हिसाब से अपना पक्षपरिवर्तन कर लेते है।

इसके अलावा अल्पेश ठाकोर भी भाजपा में शामिल होकर मंत्री बनने का मन बना रहे थे, लेकिन कल उन्होंने प्रेस कांफ्रेस आयोजित कर कांग्रेस में ही रहने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि मुझे मंत्री बनना होता तो 6 महीने पहले ही बन गया होता। इस बीच यह भी चर्चा है कि अल्पेश की पत्नी को लोकसभा चुनाव में पाटण से टिकट दिए जाने के बाद ही वे माने हैं।

इस बीच एक खबर बिहार से भी है। यहां प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता तथा पूर्व महासचिव डॉ. विनोद शर्मा ने पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राहुल गांधी को पत्र लिखा जिसमे एयर स्ट्राइक के सुबूत मांगने पर एतराज जताते हुए लिखा कि आज कांग्रेस को जनता पाकिस्तानी एजेंट के रूप में देख रही है। इस समय मुझे कांग्रेसी कहलाने में शर्म आ रही है। मेरे लिये राष्ट्र पार्टी से उपर है। यह होना भी चाहिए, ईश्वर करे इसमे कोई निहित स्वार्थ नही छिपा हो।

इसके अलावा भी काफी उदाहरण पार्टी बदलने के देखने को मिलते है, पहले यह इतना अधिक था कि दलबदल कानून बनाना पड़ा था। सबसे बड़ी मुसीबत कार्यकर्ताओ के लिए होती है। शीर्ष नेतृत्व तो किसी को भी स्वीकार कर लेता है परन्तु कार्यकर्ता को उसे स्वीकारने में समय लगता है क्योकि वो निष्ठापूर्वक पार्टी की सेवा करता है तथा इसी सेवा के चक्कर मे वो अपने विपक्षियों के लिए दुर्भावना भी मन मे पाल लेता है, ओर जब अचानक वही विपक्षी गोद मे आकर बैठ जाये और उसे ही पालना पड़े तो केसी दुविधा होती है, वो आप समझ सकते हो।
राष्ट्र प्रथम की भावना सबके मन मे हो, हम यही प्रार्थना ईश्वर से कर सकते है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय