मूर्धन्य साहित्यकार श्री भगवतीकुमार शर्मा नहीं रहे, साहित्य के एक युग का अंत!


सूरत। गुजराती साहित्य में जिनका नाम बड़े अदब से लिया जाता था ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार एवं पत्रकार श्री भगवतीकुमार शर्मा का बुधवार, ५ सित्मबर, २०१८ को सूरत में ‌उनके निवास स्थान पर निधन हो गया। वे ८४ वर्ष के थे।

गुजरात के मूर्धन्य साहित्यकार श्री भगवतीकुमार शर्मा का आज बुधवार ५ सितम्बर, 2018 काे सूरत में उनके निवास स्थान पर प्रातः 6 बजे निधन ‌हो गया है। सदगत् की अंतिम यात्रा आज सायं 7.30 बजे उनके निवास स्थान बी-32, पवित्रा रो-हाऊस, सहज सुपर स्टोर के पास, अडाजण, सूरत से निकल का कुरूक्षेत्र जायेगी।

भगवतीकुमार हरगोविंद शर्मा का जन्म ३१ मई, १९३४ में सूरत में ही हुआ था। उन्होंने १९५० में सेकन्डरी स्कूल की पढ़ाई पूरी की और १९६८ में गुजराती और अंग्रेजी में आर्ट्स में स्नातक की उपाधि हासिल की।

कविताओं से पत्रकारिता का सफर

भगवतीकुमार शर्मा को शुरू से साहित्य में रूचि थी। उन्होंने ३१ जनवरी, १९४८ के दिन महात्मा गांधी के निधन पर अपनी पहली कविता लिखी। १८५१ में उनके दो सोनेट्स (कविताएं) स्थानीय समाचार पत्र गुजरात मित्र में प्रकाशित हुईं। १९५३ में उन्होंने कवि सम्मेलन में पहली बार काव्य पाठ किया। १९५३ में उन्होंने गुजरात मित्र दैनिक के संपादकीय विभाग से जुड़े और दशकों तक सूरत उनके धारदार, तार्किक एवं तथ्यपूर्ण संपादकीय लेखों का साक्षी रहा।

भगवतीकुमार शर्मा कई साहित्य‌िक, सांस्कृकि एवं सामाजिक संगठनों से भी जुड़े रहे, जिनमें कवि नर्मद युगाव्रत और नर्मद साहित्य सभा उल्लेखनीय हैं। वे २००९ से २०११ तक गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष भी रहे।

साहित्य में रचा-बसा जीवन

कहा जा सकता है कि भगवतीकुमार शर्मा का पूरा जीवन साहित्य और पत्रकारित के इर्द-गिर्द घूमता रहा। साहित्य की लगभग हर विधा पर उन्होंने हाथ आजमाया जैसे उपन्यास, गज़ल, गीत, सोनेट, जीवनी लेखन, अनुवाद आदि। उन्होंने आत्मकथा ‘सूरत मुझ घायल भूमि’ भी लिखी।

अपने सुदीर्घ साहित्य-जीवन में भगवतीकुमार शर्मा को कई सम्मान और पुरस्कार मिले, जिनमें कुमार चंद्रक, रंजीतराम सुवर्ण चंद्रक, साहित्य अकादमी पुरस्कार, कलापि एवोर्ड, हरिन्द्र दवे स्मारक पुरस्कार, नचिकेता एवोर्ड उल्लेखनीय हैं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजयेयी से पांच्जन्य नचिकेता एवोर्ड प्राप्त करते हुए भगवती कुमार शर्मा। (Image credit : tribuneindia.com)

लोकतेज के प्रति विशेष स्नेह

सूरत के सपूत भगवतीकुमार शर्मा का हिन्दी समाचार पत्र लोकतेज के प्रति भी विशेष स्नेह रहा। स्थापना-काल से उनका मार्गदर्शन लोकतेज को मिलता रहा। १९९१ में सूरत जैसे ‌अहिन्दी भाषी क्षेत्र में हिन्दी के अखबार के रूप में लोकतेज की शुरूआत से वे काफी खुश थे और लोकतेज के संस्थापक श्री घनश्यामप्रसाद सनाढ्य को समय-समय पर सुझाव देते रहते थे। १९९६ में जब लोकतेज के एक साप्ताहिक समाचार पत्र से दक्षिण गुजरात के सर्वप्रथम हिन्दी दैनिक में तब्दिल हुआ तो उसका लोकार्पण भी भगवतीकुमार शर्मा के करकमलों से ही संपन्न हुआ था।

लोकतेज परिवार भगवतीकुमार शर्मा के निधन पर अपनी संवेदनाएं प्रकट करता है और प्रभु से प्रार्थना करता है कि दिवंगत आत्मा को चिर-शांति प्रदान करे।