वीर सावरकर : सादर पुण्यस्मरण


हिंदुत्व को वर्तमान सन्दर्भ में परिभाषित करने वाले महानुभावों में सावरकर का नाम ऊपरी क्रम में अंकित है।
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हे अधम-रक्तरंजिते, सुजन पूजिते, श्रीस्वतंत्रते,
तुजसाठि मरण ते जनन, तुजवीण जनन ते मरण,
तुज सकल चराचर शरण, चराचर शरण,
श्रीस्वतंत्रते भगवती, त्वामहं यशोयुतां वंदे

यह पंक्तियां वीर सावरकरजी की है। मेरी यह इच्छा रहती है कि इस महान देश के लिए जिन्होंने अपने समस्त सुखों को त्याग कर जीवन समर्पित कर दिया, जिन्होंने भारत के इतिहास में अपना अप्रतिम योगदान दिया, लेकिन बिसरा दिए गए ऐसे महापुरुषों को उनकी जन्मतिथि, मृत्युतिथि के दिन याद करू तथा अपने विचार लोकतेज के माध्यम से आप तक पहुँचाऊ। आज बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी वीर सावरकर की पुण्यतिथि है। हिंदुत्व को वर्तमान सन्दर्भ में परिभाषित करने वाले महानुभावों में सावरकर का नाम ऊपरी क्रम में अंकित है।

विनायक दामोदर सावरकर किसी परिचय के मोहताज नही है। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के वो अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायः स्वातंत्र्यवीर , वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। वे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता,वकील, इतिहासकार,दूरदर्शी राजनेता तथा समाज सुधारक भी थे।

उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं के हिंदू धर्म को वापस लौटाने हेतु सतत प्रयास किये एवं आंदोलन चलाये। सावरकर ने भारत के एक सार के रूप में एक सामूहिक “हिंदू” पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा। उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व थे। सावरकर एक नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।

द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस:1857 नामक पुस्तक के रचयिता विनायक सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित १८५७ के संग्राम को गदर नहीं, अपितु भारत के स्वातन्त्र्य का प्रथम संग्राम सिद्ध किया था। अभिनव भारत की आपने 1904 में स्थापना की थी। सावरकर ने अपने मित्रो को बम बनाना और गुरिल्ला पद्धति से युद्ध करने की कला सिखाई। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अनेक षड्यंत्रों में शामिल रहने के कारण इन्हें 24 दिसम्बर 1990 को आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके बाद 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया। इस प्रकार सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने क्रान्ति कार्यों के लिए दो-दो आजन्म कारावास की सजा दी, जो विश्व के इतिहास की पहली एवं अनोखी सजा थी।

नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षडयंत्र काण्ड के अंतर्गत इन्हें 7 अप्रैल 1911 को काला पानी की सजा पर सेलुलर जेल भेजा गया। उन्होंने अपनी बायोग्राफी में लिखा कि यहां स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कैदियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था। साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था। इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमी व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था। रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थीं। इतने पर भी उन्हें भरपेट खाना भी नहीं दिया जाता था।
सावरकर 4 जुलाई 1911से 21 मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे। जिस दया याचिका के लिए आजकल कई नेता बोलते है, दरअसल 1920 में सरदार वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनकी रिहाई हुई थी। उनके कहने पर उन्होंने इस पर हस्ताक्षर किया था। वहां से निकलने के बाद भी वो रुके नही थे, न डरे थे। 1921 में मुक्त होने पर वे स्वदेश लौटे और फिर 3 साल जेल भोगी। जेल में उन्होंने हिंदुत्व पर शोध ग्रन्थ लिखा। उसके बाद उनका झुकाव हिंदुत्व की तरफ हो गया। इसी दरम्यान उनकी मुलाकात संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार से हुई थी। 1937 में वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के कर्णावती में हुए 19वें सत्र के अध्यक्ष चुने गये, जिसके बाद वे पुनः सात वर्षों के लिये अध्यक्ष चुने गये। 15 अप्रैल 1938 को उन्हें मराठी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। समाज सुधार के काम करते हुए आपने अश्पृश्यता उन्मूलन तथा विधवा विवाह आदि के लिए काम किया। इस पर उनकी कविताये भी प्रसिद्ध है।

भारत की स्वतंत्रता के समय उन्होंने विभाजन का विरोध किया था। इस अवसर पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे स्वराज्य प्राप्ति की खुशी है, परन्तु वह खण्डित है, इसका दु:ख है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य की सीमायें नदी तथा पहाड़ों या सन्धि-पत्रों से निर्धारित नहीं होतीं, वे देश के नवयुवकों के शौर्य, धैर्य, त्याग एवं पराक्रम से निर्धारित होती हैं। उन्होंने 15 अगस्त 1947 को तिरंगा ओर भगवा दो दो ध्वज फहराए थे। 5 फ़रवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के उपरान्त उन्हें प्रिवेन्टिव डिटेन्शन एक्ट धारा के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिया गया। आपने अपनी संस्था अभिनव भारत को मई 1952 में पुणे में विशाल सभा करके भंग कर दिया था क्योकि उसका उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्ति पूरा हो चुका था। पुणे विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधि प्राप्त सावरकर का स्वास्थ्य 1965 से गिरने लगा था तथा 1 फरवरी 1966 को उन्होंने आमरण उपवास करने का निर्णय ले लिया, ततपश्चात 26 फरवरी 1966 को मुम्बई में उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया था।

मैंने सावरकरजी के बारे में बहुत पढ़ा, सुना है। मेरी बात को विराम में श्रद्धेय अटलजी के शब्दों से देता हूँ
सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तेज, सावरकर माने तपस्या, सावरकर माने तत्व, सावरकर माने तर्क,सावरकर माने तारुण्य, सावरकर माने तिलमिलाहट, सागरा प्राण तलमला,सावरकर माने तितिक्षा, कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व….
सावरकर के बारे में पढ़े, जाने, ओर कोई भ्रांति फैलाता हो तो उसे रोके।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय