वतन पर जो हुए फिदा, हमारे दिलों में रहेंगे जिंदा


सभी नौजवानों के लिए युथ आइकॉन है जो उन्हें देश के के लिए कुछ कर गुजरने और देश के प्रति अपना योगदान प्रदान करने की प्रेरणा देते थे।
Photo/Loktej

वह देश, देश क्या है, जिसमें लेते हों जन्म शहीद नहीं,
वह खाक जवानी है, जिसमें मर मिटने की उम्मीद नहीं,
वह मां बेकार सपूती है,जिसने कायर सुत जाया है,
वह पूत, पूत क्या है, जिसने माता का दूध लजाया है,
पैदा हो तो फिर ऐसा हो, जैसे तात्या बलवान हुआ,
मरना हो तो फिर ऐसे मर,ज्यों भगतसिंह कुर्बान हुआ।।

मात्र 23 साल की उम्र में देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देने वाले अमर शहीद भगत सिंह का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में सबसे पहले लिया जाता है। भारत की आज़ादी की लड़ाई में भगत सिंह का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वह सभी नौजवानों के लिए युथ आइकॉन है जो उन्हें देश के के लिए कुछ कर गुजरने और देश के प्रति अपना योगदान प्रदान करने की प्रेरणा देते थे।

आज ही के दिन 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई थी। फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया।

आप इस बात से अंदाज लगा सकते हो कि अंग्रेज हमारे क्रांतिकारियों पर किस तरह जुल्म करते थे। अगर वो उनके पार्थिव शरीर के साथ भी इस प्रकार का अपमानजनक रवैया करते थे तो सोचिए की उनके द्वारा दी जाने वाली यातनाएं कितनी भयंकर होगी।

उन अमर क्रांतिकारियों के बारे में मेरे द्वारा की गई वैचारिक टिप्पणी वैसी ही होगी जैसे सूरज को दीपक दिखाना होता है। उनके उज्ज्वल चरित्रों को बस याद किया जा सकता है कि ऐसे मानव भी इस दुनिया में हुए हैं, जिनके आचरण भी किंवदंती हैं। भगतसिंह ने अपने अति संक्षिप्त जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, उनके बाद अब किसी के लिए संभव न होगी। उनके साथ ही राजगुरू तथा सुखदेव का नाम भी उसी आदर के साथ लिया जाता है। मात्र 23 24 वर्ष की आयु वाले युवकों ने अपनी जवानी भारत माता के नाम करके अपना नाम इतिहास के पन्नो में सुनहरे अक्षरों में अंकित कर लिया तथा देशभक्ति के लिए जिन्हें युगोयुगो तक याद किया जाएगा।

महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार प्रताप में भगत सिंह ने निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। सुतरखाना स्थित प्रताप प्रेस के पास तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र पत्रिकाएं उपलब्ध थीं। भगत सिंह यहां पर बैठक घंटों ही पढ़ते थे।

वैसे प्रताप प्रेस कुछ ऐसी बनी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। भगत सिंह ने तो प्रताप अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थीजी ने ही कानपुर में करायी थी।

लाहौर में साण्डर्स की हत्या और उसके बाद दिल्ली की सेण्ट्रल असेम्बली में बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को भगत सिंह ने बुलन्दी प्रदान की। इन्होंने असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप भगतसिंह सहित उनके साथियों राजगुरु तथा सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। इनको फांसी तय समय से पहले दी गई थी। फाँसी के पहले 3 मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था,
उन्हें यह फि़क्र है हरदम, नई तजऱ् ए जफ़़ा* क्या है?
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है?
दहर* से क्यों खफ़़ा रहें, चर्ख* का क्या गि़ला करें,
सारा जहाँ अदू* सही, आओ! मुक़ाबला करें।
उनके जज्बे तथा देशप्रेम को अनन्त कोटि प्रणाम।

* शब्द का अर्थ : (तर्ज ए जफ़ा- अत्याचार का तरीका, दहर- समय, चर्ख-चक्कर या समय का सायकल, अदू – दुश्मन)

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय