सूरत कपड़ा बाजार में नगद व्यापार असंभव


(PC : livemint.com)

जब तक बाजार में सरप्लस पूंजी व सरप्लस कपड़े का प्रवाह है, तब तक नगद व्यापार कोरी कल्पना मात्र ही रहेगी!

(गणपत भंसाली)

नगद में कपड़ा बिकना वर्तमान हालातों में तो बड़ा ही जटिल व टेढ़ा काम है। दरअसल जब तक बाजार में सरप्लस पूंजी व सरप्लस कपड़ा है, तो उस गाड़ी को उधार की पटरी से नगद की पटरी तक ले आना मुश्किल डगर है। भिवंडी, मालेगांव, इचलकरंजी, तिरुपुर, सूरत आदि ग्रे कपड़े की मुख्य उत्पादक मंडियां हैं। विवरों का धारा-धोरण सप्ताह भर का व तुरंत भुगतान का रहता है व कुछ आर्थिक रूप से समृद्ध विवर इन मंडियों में एक माह तक की उधार अपवाद स्वरूप देते भी होंगे। इसके बावजूद देश भर में ग्रे कपड़ा उधार में आपूर्ति होता है और वो है आढ़तियों की वजह से। जब ग्रे कपड़ा उधार में मिलता है, तथा डाइंग-प्रिंटिंग मिलों में कपड़ा प्रोसेस तक उधार में होता है तो स्वभाविक है कि तैयार कपड़ा भी उधार में ही बिकना है।

दरअसल अधिक मार्जिन व क्वालिटी कंट्रोल का अभाव उधार पद्धति के जनक हैं तथा सरप्लस स्टॉक व बाजारू मंदी उधार की जननी है, व पूंजी का ब्याज कमाने की प्रवृति उधार पद्दति को गति प्रदान करती है। आज सूरत में जो भी कारोबार में जुटे हुए हैं, अधिकांश अभिभावकों की एक ही मानसिकता है कि कम से कम पूंजी का ब्याज तो आ ही रहै है व बच्चे व्यापार में एंगेज तो हैं। मेरा मानना है कि सूरत सहित हिंदुस्तान की विभिन्न कपड़ा मंडियों में 5-10 प्रतिशत प्रतिष्ठान अपनी शर्तों से ही कपड़ा बेच पाते होंगे। GST आंदोलन से पूर्व देश के अधिक खपत वाली कपड़ा मंडियों में बड़ी मात्रा में अनसोल्ड कपड़ा स्टॉक रहता था। सम्भवतः ये सिलसिला ज्यादा नहीं तो आंशिक रूप से आज भी चलता ही होगा।

आज भी देश मे अनेकों कपड़ा मंडियां हैं जहां से कपड़े का बकाया भुगतान 3 से 6 माह तक कि अवधि में नहीं आ पाता है। उस पर भी ब्याज आधा-अधूरा ही वसूल हो पाता है। सूरत में भी हरिओम, तिरुपति, सांई आशाराम आदि मार्केटों में काफी व्यवसायी सम्भवतः नगद व कम अवधि की उधार में कपड़ा बेचते भी होंगे। औऱ भी कुछ मार्केटों में सीमित प्रतिष्ठानों में यह प्रणाली विकसित होगी भी।

वैसे खुदरा कारोबार व सेमी होलसेल जहां-जहां है वहां भी नगद में बिक पाता होगा। फेंट, सेकेंड ऑड, चिंदी आदि दुकानदार अपनी शर्तों से बेचते भी होंगे। खुदरा मार्केट के रूप में मशहूर मार्केट बॉम्बे मार्केट में नगद कारोबार होता है तो वो खुदरा प्रणाली के तहत ही हो पाता है। स्कूल यूनिफॉर्म, कर्टन क्लॉथ, साड़ी व ड्रेस मटेरियल्स के कुछ नामचीन उत्पादक व ट्रेडर्स अपनी शर्तों पर कपड़ा बेचते भी हैं व बेचते भी होंगे। कुछ व्यापारी अपने विरले क्रिएशन से तथा नए-नए अन्वेषण से अपनी शर्तों से व्यापार करते भी होंगे। लेकिन सम्पूर्ण सूरत में इस तरह की शर्तों से व नगद प्रणाली से व्यापार-व्यवहार करने वाले 5-10 प्रतिशत व्यापारी बमुश्किल ही होंगे।

एक कहावत भी है कि कपड़े का जन्म उधार में ही हुआ है। आज से आधी शताब्दी यानी 50 वर्ष पूर्व सेंचुरी मिल का “नागराज” लट्ठा व मोरारजी मिल की “बॉबी” ड्रिल तक आढ़तियों के द्वारा मैंने मेरी बालोतरा (राज) के सदर बाजार स्थित कपड़े की दुकान पर उधार में खरीदी हुई है। ये मुझे आज भी स्मृ‌ति में हैं।

सूरत के विभिन्न टेक्सटाइल्स मार्केटों में वर्तमान में जो दुकानदारों की विशाल संख्या है, अगर उससे आधी भी रह जाए तो भी नगद में व्यापार करने की कोरी कल्पना मात्र ही की जा सकती है। वैसे अपवाद कहां नहीं होते? अतः कुछ नामचीन ब्रांड, तथा क्वालिटी कंट्रोल वाले व्यापारी व उत्पादक आदि कपड़ा कम अवधि की उधारी में व तयशुदा पीरियड की शर्तों से बेचते भी होंगे। लेकिन वे भी नगद में अपना सम्पूर्ण उत्पादन बेचने में सफल नहीं हो पाते होंगे।

हिंदुस्तान में कपड़ा उत्पादन की सिरमौर मंडियों की श्रंखला में सूरत, अहमदाबाद, मुम्बई, भीलवाड़ा, जैतपुर, पाली, बालोतरा, जसोल, सोलापुर, बेंगलोर, जयपुर, सांगानेर, जोधपुर, इरोड़, तिरुपुर, इचलकरंजी, हैदराबाद, गोरखपुर, कोयम्बटूर आदि का समावेश है। इन तमाम मंडियों के व्यापारियों व उत्पादकों के लिए नगद प्रणाली में व अपनी शर्तों से कपड़ा बेच पाना टेडी खीर ही है।

दरअसल समस्या ये है कि वर्तमान में देश भर में सिर्फ सूरत व अहमदाबाद ही वे गिनी-चुनी मंडियां हैं जहां आज भी भारत के कोने-कोने से व्यापारी अपना कारोबार प्रारम्भ करने पहुंच रहे हैं। बाकी देश की अन्य मंडियों में नए प्रतिष्ठानों का खुलना थमा भी नहीं है बल्कि उल्टे संख्या में कम होते जा रहे हैं।

आप इस बिंदु पर ध्यान दीजिए। आसाम जब अशांत हुआ तो व्यापारियों ने सूरत का रुख किया। जब बिहार में लालू शासन के दौरान रंगदारी प्रथा बढ़ी तो वहां के व्यापारी पलायन कर सूरत पहुंचे। उत्तरप्रदेश में जब-जब भी जाति-धर्म व मजहब आधारित सपा-बसपा की सरकारें बनीं तब भी वहां से व्यापारियों ने सूरत का चयन किया। इचलकरंजी, मालेगांव व भिवंडी के बाजारों में कमजोर कारोबार के चलते वहां का निवेशक सूरत लौट आया। बालोतरा, पाली में जब डाइंग-प्रिंटिंग इकाइयों पर प्रदूषण की तलवार लटकी तब वहां के व्यापारियों ने अपनी सूरत में इकाइयां प्रारम्भ कर दीं।

दरअसल समस्या ये है कि देश भर के व्यापारियों के पास किसी भी कारोबार से कमाई हुई जो बेपनाह पूंजी है, अब बैंकों में उस रकम का ब्याज नहीं आता। सराफी प्रणाली बन्द सी हो गई। गोल्ड, प्रोपर्टी, शेयर तमाम मार्केट साथ नहीं देने से पूंजी का पलायन हुआ व सूरत के टेक्सटाइल्स बाजारों में नियोजित हो गई। बहुत ज्यादा थी तो विभिन्न टेक्सटाइल्स मार्केटों व फ्लैटों, फॉर्म हाउसों आदि में निवेश कर दी गई। सारांश यही है कि टेक्सटाइल्स व्यवसाय में जब तक सरप्लस पूंजी है, तब तक नगद व्यापार की कोरी कल्पना मात्र ही रहेगी। ये एक्स्ट्रा पूंजी न सिर्फ उधार प्रवृति की जननी है बल्कि प्रतिस्पर्धा (कॉम्पिटिशन) का भी बड़ा कारण है।