क्या चुनाव में ही दिखाई देने वालो को चुनना चाहिए?


चुनाव आता है तब जनता के द्वार पर नेता आते है, वोट मांगने अलग अलग तरह के वादे लेकर।
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चुनाव आता है तब जनता के द्वार पर नेता आते है, वोट मांगने अलग अलग तरह के वादे लेकर। लेकिन बाद में कई नेता ऐसे भी होते है जो घुम हो जाते है। पता नही नेपथ्य में कहाँ खो जाते है। जीतने के बाद जनता केवल यह सन्तोष करके रह जाती है कि अमुक व्यक्ति हमारा सांसद है। लेकिन खुदा न खास्ता अगर पार्टी उनका टिकिट रिपीट कर देती है तो जनता भी हिसाब किताब करने के लिए लालायित हो जाती है। फिर तो नेताजी से त्रस्त हुई जनता क्या करदे यह कहना मुश्किल है। बेनर तो आपने भी देखे होंगे कि हमारे क्षेत्र का सांसद या विधायक गुमसुदा है, तलाश कीजिये, ओर जब वो गुमसुदा जनप्रतिनिधि वापिस वोट मांगने आ जाये तो क्या करना चाहिए?

यह सीखना है तो कोई सलेमपुर जिले के देवरिया वालो से सीखे।यहां की पब्लिक ने नेताजी के दिखाए सपनों का हिसाब मांग लिया। उनके द्वारा किये गए वादों का ब्योरा मांग लिया। नेताजी चुनाव प्रचार करने आए थे, वोट मांगने आए थे लेकिन जनता के आक्रोश के सामने उन्हें उल्टे पैर वापिस भागना पड़ा।

हुआ यह कि सलेमपुर के सांसद है रविंद्र कुशवाहा, भाजपा ने फिर से उन्हें चुनावी मैदान में उतारा है। दो दिन पहले वो जनता के बीच वोट मांगने पहुंचे। तभी उनकी गांव वालों से बहस हो गई। सांसद के साथ इलाके के बीजेपी विधायक काली प्रसाद भी थे। गांव वालों ने सांसद को गाड़ी से नीचे तक नहीं उतरने दिया। मामला इतना बिगड़ गया कि नौबत हाथापाई तक पहुंच गई। नेताओं के विरोध का जो वीडियो वायरल हो रहा है उसमें इतनी गाली है कि आप पूछो ही मत।

दरअसल गांव वालों का यह कहना था कि सांसद के यहां किसी काम से जाने पर वो उन्हें पहचानते नहीं हैं और लोगों का अपमान भी करते हैं, और आज वोट मांगने आए हैं। मतलब कि वो ऐसे हो गए थे कि मतलब निकल गया तो पहचानते नही वाले, लेकिन चुनाव फिर आया,पार्टी ने फिर टिकिट दे दी तो क्या करे, जिन्हें पहचानते नही थे उसने पहचान निकालने के लिए पहुंच गए। पर जनता भी समझदार हो गई, उन्होंने भी भली प्रकार से नेताजी को पहचान लिया था तो उनके साथ वैसा ही व्यवहार कर दिया जो कोई आक्रोशित करता है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि सांसद और विधायक ने गांव के युवकों को गाली दी और कहा कि हमें तुम लोगों का वोट नहीं चाहिए। इस पर उत्तेजित हुए ग्रामीण सांसद के काफिले को गांव से बाहर भगाने लगे थे। अब जो भी हुआ हो लेकिन यह बात तय है कि जनता आजकल बख्शती नही है।

वैसे हम इस मामले में ठीक है, मेरे इलाके के सांसद की जनसम्पर्क के मामले में प्रधानमंत्री भी तारीफ कर चुके है। हाँ मेरे आजूबाजू वाले क्षेत्र के सांसदों को जरूर उनसे सीख लेनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव जीतने के बाद सांसद जनप्रतिनिधि होता है, वो किसी पार्टी का नही बल्कि पूरे संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है तो उसे सबका ख्याल जरूर रखना चाहिए और समय समय पर मिलते रहना चाहिए जिससे यह न लगे कि खाली चुनाव में ही नेताजी के दर्शन देते है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय