शिव शिव होई प्रसन्न करू दया


श्रीमद आद्यशंकराचार्य द्वारा रचित निर्वाण शतक का यह श्लोक है। निर्वाण शतक में आचार्य शंकर आत्मा को शिव स्वरूप बताते है।
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न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम।
न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव,
मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था,
मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,
मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

श्रीमद आद्यशंकराचार्य द्वारा रचित निर्वाण शतक का यह श्लोक है। निर्वाण शतक में आचार्य शंकर आत्मा को शिव स्वरूप बताते है। लेकिन शिव क्या है वो भी समझने की जरूरत है।

शव शब्द पर इ की मात्रा लगाने के बाद शिव शब्द का निर्माण हुआ है। इ मतलब ईश्वर, मतलब शरीर मे इशतत्व अगर है तो वो शिव और जब वो तत्व शरीर से स्खलित हो जाये तो शव हो जाता है। इसीलिए श्रीमद आद्यशंकराचार्य ने शिवोहम का कहा था। चराचर जगत में जो भी प्राणवान है तथा दृश्यमान है वो सभी शिवतत्व से युक्त ही है। अतः शिव बिना सृष्टि की कल्पना भी नही की जा सकती है।
आज उसी तत्व के दैवीय स्वरूप भगवान शंकर के पूजन का महापर्व महाशिवरात्रि है। हमारे प्राचीन शास्त्रानुसार वर्षपर्यंत चार विशिष्ट रात्रियां मानी जाती है जिसमे किये गए साधना के कार्य अनन्त गुणा फलदायी होता है। मोहरात्रि, कालरात्रि, दारुणरात्रि तथा महारात्रि। इनमें से महारात्रि यानि कि अहोरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जो जीवन को धन्य बनाने वाली रात्रि है। इस दिन साधक भगवान शिव की विशेष चतुर्थ प्रहरी पूजा करते है तथा अपने आत्मशिव तथा जगतपिता शिव को अपनी साधना द्वारा प्रसन्न करते है।

यह दिन तपस्या के साथ व्रतप्रधान उत्सव भी है। यह व्यक्त से हटकर अव्यक्त में लीन होने का दिन है। भोग से हटकर योग तथा विकारों से हटकर निर्विकार में गोता लगाने का दिन है। ऐंद्रिक सुख क्षणिक होते है,जबकि आत्मा का सुख परम् शिवस्वरूप है। शिव तत्व में डूबना ही मोक्ष है।

महाशिवरात्रि के बारे में प्रचलित है कि इस दिन आदिदेव महादेव शंकर का विवाह माता पार्वती के साथ हुआ था। शिव तथा शक्ति का मिलन ही महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग के उदय से हुआ। इस बारे में एक कथा यह भी प्रचलित है कि समुद्र मंथन के पश्चात जब कालकूट विष पैदा हुआ था, उसके अंदर सृष्टि को खत्म की क्षमता थी, जब इससे संसार त्राहि त्राहि करने लगा तब देवताओं की विनती पर भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उस समय उसकी गर्मी से भगवान शिव के कंठ तप्त हो गए तब देवताओं ने सम्पूर्ण रात्रि आदिदेव को जल, दूध, दही, घी,मधु से महादेव का अभिषेक किया था जिससे उनको शीतलता प्राप्त हो। इसके साथ ही उन्होंने बड़े कृतज्ञ भाव से उनकी आराधना की। तभी से यह परंपरा है कि महारात्रि के दिन सम्पूर्ण रात्रि भगवान शिव की अर्चना करके भक्त उनको रिझाते है।

मेरे पूजनीय दादाजी द्वारा जो मेने बचपन से सुना है उन पंक्तियों के साथ विराम देता हूँ तथा यह प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर सदैव इस पुण्यभूमि भारत के प्रत्येक नागरिक सहित समस्त प्राणिमात्र के शुभ संकल्पों को पूर्ण करे।

शिव शिव होई प्रसन्न करू दाया,
करुणामय उदारकीर्ति, बलि जाऊ हरहु निज माया।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय