कविता ने रचा इतिहास: रचनाएं पढ़ कोर्ट ने बदला फैसला


कविता किसी भी भाव को प्रगट करने की सबसे बढ़िया अभिव्यक्ति का साधन है।
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कविता किसी भी भाव को प्रगट करने की सबसे बढ़िया अभिव्यक्ति का साधन है। कविता के माध्यम से हम संक्षेप में अपने भावों को जतला सकते है। हिंदी साहित्य में उम्दा लिखने वाले काफी कवि हुए है जिनका नाम सदैव सम्मान के साथ लिया जाता है। मुझे खुद को भी कविता में गहरी रुचि है। कल हिंदी जगत की प्रख्यात कवियत्री सरोजनी नायडू की पुण्यतिथि थी। उन्हें भारत कोकिला भी कहा जाता है। वैसे आज उन्हें याद करने का कारण कुछ और है। क्योकि अगर पुण्यतिथि पर ही याद करना होता तो यह लेख आप कल ही पढ़ चुके होते।

भारत के इतिहास में अनूठी घटनाएं रोज होती रहती है। कुछ ऐसी घटनाएं भी होती है जो ज्ञात होती है तो कुछ अज्ञात ही रह जाती है। आजकल एक डायलॉग बड़ा फेमस हो गया है कि खबरे वो नही होती जो दिखाई जाती है, खबरे वो होती है जो छुपाई जाती है। शायद सभी खबरनवीस यही सोचते होंगे कि छुपाने वाली खबर को हमने एक्सप्लोज कर दिया है। खैर उनकी वो जाने, यहां ऐसा कुछ नही है। मुझे कुछ साधारण खबर असाधारण लगी, उसका जिक्र में करना चाहूंगा।

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक आरोपी की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है। वैसे यह कोई बड़ी बात नही है, काफी आरोपियों की सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार सज़ा बदलता है। लेकिन इस मामले में यह निर्णय कोर्ट ने अपराधी के द्वारा लिखी गई कविताओं को पढ़ने के बाद लिया है। जस्टिस एस.अब्दुल नजीर और जस्टिस एमआर शाह की सयुक्त बेंच ने कहा कि जेल में आरोपी के द्वारा लिखी गई कविताएं यह बताती हैं कि उसे अपनी गलती का अहसास है, जो उससे कम उम्र में हो गई थी। अब उसने सुधार किया है। इस अपराधी ध्यानेश्वर सुरेश बोरकर पर बच्चे के अपहरण और हत्या का चार्ज है। जिसको बॉम्बे हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की सज़ा सुनाई थी।

बेंच ने माना कि यह केस दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में आता है। अपराध के समय बोरकर की उम्र 22 साल थी। अब तक 18 साल वो जेल में बिता चुका है। जेल में उसका व्यवहार भी अच्छा था। वो कोई प्रोफेशनल किलर नहीं है। आरोपी ने फिर से समाज से जुड़ने की कोशिश की। खुदको बेहतर नागरिक के तौर पर स्थापित करने का प्रयास किया। जेल में ही बीए की पढ़ाई पूरी की। उसने आगे बढ़ने का प्रयास किया।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जानकारी के आधार पर आरोपी के फिर से कोई अपराध करने की कोई आशंका नहीं है। वो अब समाज के लिए कोई खतरा नहीं होगा। साक्ष्य और इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा जरूरी नहीं है। आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कोर्ट के सामने दलीलें पेश कीं। ग्रोवर ने कोर्ट को बताया कि आरोपी गांधी रिसर्च फाउंडेशन के अंतर्गत प्रशिक्षण ले रहा है।

यह सम्भवतया भारत का पहला मामला होगा जिसमे न्यायाधीश ने अपराधी की कविताएं पढ़कर अपना फैसला सुनाया तथा अपनी निचली अदालत के फैसले को बदल दिया। यद्यपि इस फैसले को प्राप्त करने में बोरकर के जीवन के काफी साल निकल गए लेकिन जो आधार इसके लिए बना वो वाकई में महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय है।

कविता में वाकई वो भावात्मक शक्ति होती है जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के दिल तथा दिमाग को प्रभावित करती है। ओर इसीलिए शायद भारत मे कवि सम्मेलन सर्वाधिक होते है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय