शिक्षा पद्धति तथा अभिभावकों की सोच में सुधार की आवश्यकता


अक्षर ज्ञान के साथ साथ आध्यात्म, संस्कार, अच्छे बुरे की परख की पद्धति के साथ साथ योग्य तरीके से जीवनयापन सिखाने की पद्धति ही शिक्षा हैं।
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सब को खुशहाल देखने की हमारी भारतीय संस्कृति हैं। सदियों से चली आ रही इस दैवीय संस्कृति को परम्परागत रूप से चलाने हेतु तथा समय समय पर परिष्कृत करने हेतु अनेक ऋषियों ने अपने जीवन को अर्पित किया और अपने अनुभवों को आम लोगो तक पहुचाने का परमार्थ कार्य किया। सबके समेकित प्रयास थे। जीव जगत सारा खुशनुमा हो यही प्रकृतिजन्य विचार सभी का रहा।

मानव के सुखमय जीवन और खुशहाली के लिए उसकी आर्थिक सबलता अत्यंत आवश्यक है। ओर उसके लिए जरूरी होती है काबिलियत लायकात, हुनर, तालीम, कुशलता या संक्षेप में कहे तो योग्य शिक्षा। हर व्यक्ति अपने द्वारा अर्जित शिक्षा से अपने काबिलियत अनुसार आर्थिक अर्जन कर अपना एवम अपने परिवार के भरण पोषण कर पाए तथा आर्थिक अर्जन का सही उपयोग करे एवम जीवन सुव्यस्थित रूप से व्यतीत कर सके। उसके लिए उसे संस्कार एवम रहन सहन की समझ देने को भी शिक्षा में जोड़ा गया ओर ऐसी पद्धति भारतीय गुरुकुलो में शुरू हुई जहां आध्यात्मिक तथा व्यवहारिक शिक्षा तथा अक्षर ज्ञान की समझ विकसित की जाती थी। अनेको अनुभवो तथा ज्ञान को संग्रह कर भविष्य के उपयोगी बने ऐसे संस्कार सिंचित किये जाते थे।

अक्षर ज्ञान के साथ साथ आध्यात्म, संस्कार, अच्छे बुरे की परख की पद्धति के साथ साथ योग्य तरीके से जीवनयापन सिखाने की पद्धति ही शिक्षा हैं। और यही हमारी शिक्षा पद्धति सैंकड़ो वर्षो तक भारत मे चलती रही। उसके फलस्वरूप अनेक ऋषि, दार्शनिक , ज्ञानी, विज्ञानी, भारत मे पैदा हुए। जिनका लक्ष्य सिर्फ मानवता के लिए जीवन सरलता की ओर हो सबलता की ओर हो, उनके अनुसंधान, अनुभव , प्रयोग को समाज को समर्पित किये ओर अपने सम्पूर्ण जीवन को भी उन्होंने समर्पित किया। यही था उनका शिक्षण, पर आज इसके विपरीत परिस्थितिया पैदा हो रही हैं। शिक्षित लोग शिक्षा को व्यापार बना रहे हैं। तो माता पिता भी अपनी संतानों को शिक्षा नही बल्कि वैभवशाली सुविधाओं को देने की होड़ में हैं। सामाजिक, राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान कही पर भी सचोट कारगर नही हैं।

यही सोचनीय विषय हैं। हम मानव की मूलभूत जरूरत शिक्षा का व्यापार कर रहे हैं। जो दुःखद हैं। हर राजनीतिक नैतृत्व के चुनावी घोषणा पत्र में अनेक प्रकार के वायदे होते हैं। बेरोजगार, किसान, व्यापारियों को कर्ज माफी,पेंशन की घोषणाएं होती हैं। लेकिन मानव को सबलता के लिए काबिलियत देने की शिक्षा व्यवस्था का किसी ने नही सोचा है। या फिर अगर घोषणा की भी है तो वो घोषणा ही रही है।

सरकारी स्कूल में शिक्षा स्तर पर सुधार के प्रयास क्यों नही होते? शिक्षा और संस्कार की संस्कृति वाले भारत मे शिक्षा का स्तर सुविधाओं के स्तर पर धन से क्यो तोला जा रहा हैं? अभिभावकों को बच्चो के संस्कार सहित शिक्षा की चिंता के बजाए सुविधाओं से सम्पन्न व्यवस्थाओं की मांग क्यो हो रही है? क्या अक्षर ज्ञान ही शिक्षा हैं? या वैभवशाली जीवन शैली का प्रभाव इतना निम्न हो चुका हैं कि बच्चो को विपरीत परिस्थितियों में जीने के लिए हम तैयार ही नही करेंगे? यहां प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कमी तो हैं ही पर माता पिता पर हुआ वैभवशालीता का प्रभाव बच्चो के हर परिस्थितियों का सामना करने के संस्कार पर अवरोध बन रहा हैं। शिक्षा नीति सरल हो,सुलभ हो,सर्वव्यापी हो, एक जैसी हो, बच्चो के सर्वांगीण विकास की हो। न कि केवल उन्हें पढ़ाकू बनाने तक ही सीमित हो।

हमारे संस्कार तथा संस्कृति को संजोते हुए काबिलियत बच्चो में बढ़े ऐसी शिक्षा पद्धति की वर्तमान में महती आवश्यकता है। तभी हम विश्वगुरु का बिरुद पुनः प्राप्त कर पाएंगे।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय