आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने जो कुछ पाया वो समर्पण, पवित्रता व विनम्रता से पायाः मुनि श्री कमल कुमार


वेसु विशाल धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमलकुमार।
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सूरत। वेसु स्थित श्याम-संगिनी अपार्टमेंट के परिसर में विशाल धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमलकुमार ने आचार्य श्री महाप्रज्ञ की दसवीं पुण्य तिथि पर कहा कि आचार्य श्री महाप्रज्ञ के प्रेक्षा ध्यान व जीवन विज्ञान जैसे अमूल्य अवदान संजीवनी स्वरूप है, आप तेरापंथ धर्म संघ के दसवें आचार्य थे, आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म 14 जून 1920 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के टमकोर कस्बे में हुआ, आपके बचपन का नाम नथमल था, बचपन मे ही पिता तोलाराम जी का छाया उठ गया, मां बालू ने उनका पालन-पोषण किया, उनकी माँ धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी, अतः उन्हें बचपन से ही धार्मिक संस्कार मिले थे, 29 जनवरी 1939 को उन्होंने 10 वर्ष की आयु में अपनी माता के साथ तेरापंथ के आचार्य कालूगणी से दीक्षा ग्रहण की थी, तेरापंथ के नवम आचार्य श्री तुलसी ने मुनि नथमल को उनकी प्रज्ञा से प्रभावित होकर उन्हें महाप्रज्ञ की उपाधि से अलंकृत किया, तब से उन्हें आचार्य श्री महाप्रज्ञ के नाम से जाना जाने लगा, विक्रम संवत 2035 को राजस्थान के राजलदेसर में उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया व वे महाप्रज्ञ से युवाचार्य महाप्रज्ञ हो गए, मुनि श्री ने कहा कि विक्रम संवत 2050 में राजस्थान के सुजानगढ़ में आचार्य श्री तुलसी ने अपने पद का विसर्जन कर युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य नियुक्त कर दिया, मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री महाप्रज्ञ अपने गुरु के प्रति विनयपूर्वक व्यवहार के लिए जाने जाते थे,उनका समर्पण बेमिशाल था, उन्होंने जो कुछ पाया अपने समर्पण व पवित्रता से पाया, आचार्य महाप्रज्ञ ने आचार्य श्री तुलसी के मार्गदर्शन में दर्शन, न्याय, व्याकरण,मनोविज्ञान,ज्योतिष, आयुर्वेद आदि तथा बौद्ध गर्न्थो, वैदिक गर्न्थो तथा प्राचीन गर्न्थो का गहन अध्ययन किया था, वे संस्कृत भाषा के आशु कवि थे।

मुनि श्री ने कहा कि दिगम्बर आचार्य विद्यानंद जी ने उनके प्रेक्षा ध्यान पद्धति के मुरीद रहे है, वे सर्व धर्म समभाव के प्रतीक थे, उनके साहित्य को हर जाति-धर्म व सम्प्रदाय तथा हर वर्ग का पाठक पसंद करता है, सही मायनों में वे विराट प्रज्ञा के धनी थे, मुनि श्री ने कहा कि हमारी विवेक चेतना जागृत होनी चाहिए, विनम्रता व पवित्रता से ही सम्मान बढ़ता है, मुनि श्री ने कहा कि जैन एकता के प्रयासों हेतु आचार्य श्री महाश्रमण जी व श्रमण संघ के आचार्य श्री शिवमुनि जी व अन्य आचार्यो के प्रयत्न प्रेरक व अनुकरणीय है, इस अवसर पर शासन गौरव मुनि श्री ताराचन्द जी के संथारे पूर्वक मृत्यु का वरण करने पर उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए, तथा श्रद्धा की प्रतिमूर्ति पार्वती देवी के संथारे पर भी भावांजलि दी गई, मुनि श्री नमिकुमार जी व मुनि श्री अमनकुमार जी ने भी अपने उद्गार व्यक्त किये, धर्म सभा मे महासभा के ट्रस्टी भीकमचंद पुगलिया, तथा श्री सम्पत राज बच्छावत, तेरापंथ सभा सूरत के उपाध्यक्ष श्री ललित खोखावत, मंत्री श्री जीतू भाई मेहता, तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री संजय भंसाली, अणुव्रत सिमिति के अध्यक्ष श्री नेमीचंद कावड़िया, तेरापंथ सभा के मैनेजिंग ट्रस्टी श्री बाबूलाल तलेसरा, महावीर एज्युकेशन ट्रस्ट के श्री जगदीश जैन, कमिश्नर श्री अमित जैन, जीवन विज्ञान के श्री गौतमचंद गादिया, तेरापंथ सभा के पूर्व अपाध्यक्ष श्री गणपत भंसाली ने भी अपने विचार प्रकट किए तथा कन्या मण्डल द्वारा गीतिका की प्रस्तुति दी गई।