आचार्य महाप्रज्ञ की १०वीं पुण्यति‌थि पर विशेष : जन्म से जीवन का महत्व


संसार में आने वाले को एक दिन निश्चित जाना पड़ता है। परंतु जो व्यक्ति अपनी कर्मजा शक्ति का जागरण कर कुछ करिश्मा दिखा जाते है।
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आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी को शताब्दियाँ याद करेगी : मुनि कमलकुमार

सूरत। संसार में आने वाले को एक दिन निश्चित जाना पड़ता है। परंतु जो व्यक्ति अपनी कर्मजा शक्ति का जागरण कर कुछ करिश्मा दिखा जाते है। वे जन-जन के दिल-दिमाग मे अपना स्थान बना लेते हैं। ऐसे ही महापुरुष थे तेरापंथ धर्मसंघ के दशमेश आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का जन्म नाम नथमल था। उनका जन्म झुंझुनूं जिले के टमकोर गाँव के तोलाराम चोरडिय़ा के घर माता बालूजी की कुक्षी से हुआ था। बाल्याकाल से ही आप प्रतिभावान थे। मात्र ढाई वर्ष की आयु में ही आपके पिताश्री का देहावसान हो गया। परिवार में आजीविका की समस्या हो गई, आपका शैशव काल खींवसर के बच्छावत परिवार में व्यतीत हुआ। ननिहाल वालों ने नथमल की हर तरह से सुरक्षा की। लम्बे समय तक गाय के दूध से उदरपूर्ति का क्रम रहा। ताकि बालक का दिमाग तेजस्वी बना रहे।

बड़े होने पर पारिवारिक जन टमकोर ले आये, वहां प्रवासित मुनि छबिलालजी, मुनि मूलचंदजी का ध्यान बालक नथमल की तरफ केंद्रित हो गया और प्रारंभिक ज्ञान करवाया। जिससे बालक के मन में वैराग्य भावना का जागरण हुआ। मुनिद्वय की प्रेरणा से तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य के दर्शन गंगाशहर में किये। प्रथम दर्शन और प्रवचन से नथमल का वैराग्य और अधिक पुष्ट हुआ औऱ प्रतिक्रमण का आदेश भी मिल गया।

पूज्य कालूगणी गंगाशहर चातुर्मास के पश्चात सरदारशहर मर्यादा महोत्सव के लिए पधार रहे थे। उस समय नथमल ने माता बालुजी के साथ भादासर में गुरुदेव के दर्शन किये और दीक्षा की अर्जी की। पूज्य गुरुदेव ने नथमल को दीक्षा की स्वीकृति प्रदान कर दी, परन्तु माता को अनुमति नहीं मिली। नथमल ने आग्रह किया कि माता को भी दीक्षा की स्वीकृति प्रदान करावें। कालूगणी ने फरमाया कि अभी केवल तुम्हें ही अनुमति दी है। परन्तु नथमल के विनम्र निवेदन पर गौर करते हुए मां-बेटे दोनों को अनुमति मिल गई।

सरदार शहर में भंसालीजी के बाग में आपकी दीक्षा सम्पन्न हुई। दीक्षा के पश्चात गुरुवर ने मुनि तुलसी के पास वन्दना अर्ज करा दी। मुनि तुलसी के कुशल अनुशासन में आपका अध्ययन अध्यापन चला। मुनि तुलसी जब आचार्य बने आपको उनकी सेवा का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। कहा भी जाता है ‘जैसा संग वैसा रंगÓ यह युक्ति पूर्ण सत्य चरितार्थ हुई औऱ आप आचार्य श्री तुलसी के सक्षम पट्टधर बने।
आपकी विनम्रता, विद्वता, सरलता, समर्पण, गुरु भक्ति, आचार निष्ठा, अनुत्तर थी। इन्ही गुणों को देखकर गुरुदेव तुलसी ने अपने रहते ही अपना आचार्य पद विसर्जन कर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। तेरापंथ धर्मसंघ के लिए यह प्रथम घटना थी।

आचार्य महाप्रज्ञजी ने प्रेक्षाध्यान औऱ जीवन विज्ञान के द्वारा व्यक्तित्व निर्माण का महनीय कार्य कर जैन-अजैन सब को शांतिमय जीवन जीने की कला सिखाई। अनेक आगमों का सम्पादन कर अनेक पुस्तकें लिखकर संसार की जटिल समस्याओं का समाधान प्रदान किया। जिसे युग नहीं शताब्दियाँ याद करेगी।आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने सरदार शहर में ही दीक्षा ली और सरदार शहर में नश्वर देह से विदाई ली। आज उनके दशवें महाप्रयाण दिवस पर कोटि-कोटि श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ।

– मुनि कमलकुमार