वर्तमान की जरूरत: भगवान महावीर की शिक्षाएं


सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य के पंचशील सिद्धान्त दिखाने वाले भगवान महावीर का आज छब्बीस सौ अठारवां जन्म कल्याणक है।
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अहिंसा,सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य के पंचशील सिद्धान्त संसार को प्रदान कर मानव मात्र को राह दिखाने वाले जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का आज छब्बीस सौ अठारवां जन्म कल्याणक है। भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को हुआ था।

वर्तमान विश्व मे जिसकी महती आवश्यकता है उस अहिंसा के सिद्धांत को भगवान महावीर ने जन जन तक पहुंचाया तथा अपने शिष्यों को इसके पालन के लिए प्रतिबद्ध भी किया। महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे। वे किसी के प्रति कठोर वचन भी नहीं बोलते थे और जो उनका विरोध करता, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। इससे परिचय हो जाने के बाद लोग उनकी महत्ता समझ जाते थे और उनके आंतरिक सद्भावना के प्रभाव से उनके भक्त बन जाते थे।

जिनके समस्त दर्शन, चरित्र, आचार विचार का आधार एक इसी अहिंसा सिद्धांत पर है। वैसे उन्होंने अपने अनुयायी प्रत्येक साधु और गृहस्थ के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के पांच व्रतों का पालन करना आवश्यक बताया है, पर इन सबमें अहिंसा की भावना सम्मिलित है। इसलिए जैन विद्वानों का प्रमुख उपदेश यही होता है कि अहिंसा ही परम धर्म है।

लेकिन वर्तमान में हम इन सिद्धांतों को कितना मानते है? हिंसा का अर्थ किसी सदेह, सजीव प्राणी का वध करने ही नही है बल्कि किसी भी देहधारी को मन, वचन, कर्म द्वारा शारीरिक तथा मानसिक कष्ट देना भी हिंसा की श्रेणी में आता है। अगर हम किसी को अपने कटु वचनों से आहत करते है तो वो भी हिंसा है। कुलमिलाकर सिर्फ अपने आनन्द अथवा लाभ के लिए किसी भी व्यक्ति या प्राणी को आहत करना हिंसा है, लेकिन जहां अतिआवश्यक हो तथा किसी को उसके किये का दण्ड देना हो तो मेरे मुताबिक हिंसा नही है। लेकिन स्वार्थवश ऐसा कृत्य करना हिंसात्मक वृति है तथा जघन्य पाप है।

इसी सन्दर्भ में उल्लेख करना चाहूंगा कि आज सूरत का कपड़ा बाजार फोस्टा की सूचना के प्रतिस्वरुप बन्द है। कल के घटनाक्रम में कुछ ऐसा हुआ कि काफी व्यापारी स्वेच्छिक बन्द के पक्षधर थे। इस कारण घर्षण की स्थिति भी बनी। कुछ जैन व्यापारी उग्र होकर अपशब्दों का प्रयोग भी कर बैठे थे। उस समय मुझे लगा कि भगवान महावीर के जन्मकल्याणक पर इस प्रकार का घर्षण क्यो? क्या पर्व की उजवणी के लिए सम्पूर्ण बन्द की आवश्यकता है? अगर बन्द नही भी रहे तो क्या भगवान महावीर के जन्मकल्याणक का महत्व कम नही हो जाता है। उनका जो स्थान जनमानस में है तथा उनके सिद्धान्त जो उन्होंने प्रतिपादित किये है उनका महत्व सृष्टिपर्यंत रहेगा। जब तक यह संसार रहेगा तब तक महावीर की शिक्षा का हमारे जीवन मे महत्व रहेगा। हमारे देश से निकले इन सिद्धांतों का सम्पूर्ण विश्व मे स्वीकार किया जा रहा है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय