जमात ए इस्लामी पर प्रतिबंध: सराहनीय कदम


केंद्र सरकार ने अलगाववादी संगठन जमात ए इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया है।
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कश्मीर में 22 फरवरी को हुई एक बड़ी कार्यवाही के दौरान पुलिस ने जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट और जमात ए इस्लामी के 130 से अधिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था। 22 फरवरी की रात दक्षिण, मध्य और उत्तरी कश्मी र के इलाकों में यह छापेमारी की गई थी, जिसमें जमात संगठन के प्रमुख अब्दुल हामिद फयाज सहित दर्जनों नेताओं को हिरासत में लिया गया। बीते सप्ताह में तकरीबन 500 के लगभग जमात के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया जा चुका है। इस कार्यवाही के बाद महबूबा मुफ्ती ने जमात ए इस्लामी के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की निंदा की थी। सभी यह सोच रहे थे कि अनुच्छेद 35A पर फैसला आने वाला है इसलिए एतिहातन तौर पर यह कदम उठाया गया है। लेकिन यह किसी ओर कदम का एतिहात था।

कश्मीर में अलगाववाद पर एक बड़ी कार्यवाही करते हुए केंद्र सरकार ने अलगाववादी संगठन जमात ए इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया है। इस संबंध में गुरुवार शाम गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करते हुए जमात ए इस्लामी पर पांच साल का प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया है। मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना में यह कहा है कि जमात ए इस्लामी ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है जो कि आंतरिक सुरक्षा और लोक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। ऐसे में केंद्र सरकार इसे एक विधि विरूद्ध संगठन घोषित करती है।
1990 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था। उस समय अलगाववादी संगठन जमात ए इस्लामी को आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का दाहिना हाथ माना जाता था। उस वक्त जमात ए इस्लामी, हिजबुल की राजनीतिक शाखा के तौर पर काम करता था। इसके विपरीत जमात ए इस्लामी खुद को हमेशा सामाजिक और धार्मिक संगठन बताता रहा है। आज भी जमात का एक एक बड़ा कैडर, हिजबुल से जुड़ा हुआ है।

जमात-ए-इस्लामी की नींव 1942 में पीर सैदउद्दीन ने रखी थी। कश्मीर में जमात और नेशनल कांफ्रेंस का ही सबसे बड़ा जनाधार माना जाता है। इसलिए खुद को सामाजिक और धार्मिक संगठन बताने वाले जमात की कश्मीर की सियासत में भी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन यह संघठन सदैव अलगाववादी गतिविधियों में शामिल रहा है। जमात ने ही कश्मीरी युवाओं में अलगाववाद और मजहबी कट्टरता के बीज बोए हैं। बीते चार सालों के दौरान जमात के कई नेता कश्मीर के विभिन्न जगहों पर आतंकियों का महिमामंडन करते भी पकड़े गए हैं। कट्टरपंथी सैय्यद अली शाह गिलानी, मोहम्मद अशरफ सहराई, मसर्रत आलम, शब्बीर शाह, नईम खान समेत शायद ही ऐसा कोई अलगाववादी होगा, जो जमात के कैडर में न रहा हो।

जमात की तरह ही ऑल पार्टीज हुर्रियत कांफ्रेंस (एपीएससी) यानी हुर्रियत पर भी घाटी में अलगाववाद को बढ़ावा देने और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप हमेशा से लगते रहे हैं। प्रमुख हुर्रियत और अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी भी जमात से जुड़े रहे हैं और उससे चुनाव भी लड़ चुके हैं। हालांकि अब वह इससे अलग हो चुके हैं। माना जा रहा है कि जमात पर शिकंजा करने के बाद अब बारी हुर्रियत की है।

सरकार को ओर सख्त कदम उठाकर जितने भी अलगाववादी संघठन कश्मीर में काम कर रहे है उन सभी पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। जिस देश मे रहते है उसी के साथ गद्दारी करना सबसे बड़ा अपराध है। यही अलगाववादी नेता मासूम कश्मीरियों को पत्थरबाज बनाते है। संसार के जन्नत समझे जाने वाले कश्मीर में इन्होंने अमन की जगह नफरत का सुर्ख रंग घोला है जिससे घाटी इतने सालों से सुलग रही है। हमारे देश की अक्षुण्णता तथा अखंडता से खिलवाड़ करने वालो के लिए नाबख्शी का फरमान जारी होना ही चाहिए। अनुच्छेद 370 से अधिक इन्होंने कश्मीर को हमसे अलग किया है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय