श्रीराम से तुलना का औचित्य


बड़ी विडंबना है कि राजनैतिक पार्टियों ने अपने निजी स्वार्थों को साधने के लिए सर्वाधिक श्री राम नाम का उपयोग किया है।
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भगवान श्री राम का भारतीय जनमानस में कौन सा स्थान है, यह कोई समझाने की बात नही है। हर कोई जानता है कि हमारे जीवन मे तथा हमारे धर्म तथा आध्यात्म में भगवान श्री राम की महत्ता क्या है। लेकिन यह भी बड़ी विडंबना है कि राजनैतिक पार्टियों ने अपने निजी स्वार्थों को साधने के लिए सर्वाधिक श्री राम नाम का उपयोग किया है। 2007 में जिस कांग्रेस सरकार के समय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने हलफनामा दाखिल करके श्रीराम को काल्पनिक बताया था वो कांग्रेस भी अब श्रीराम नाम की महत्ता को जान चुकी है।

लेकिन कोई अपनी तुलना श्रीराम से करे यह बड़ा अजीब लगता है, अजीब तब भी लगता है जब कोई किसी अन्य की तुलना भी श्रीराम से करता हो। श्रीराम पारब्रह्म परमेश्वर है तथा किसी भी मायने में संसार के प्राणियों से वो अतुलनीय है। गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीराम के बारे काफी साहित्य लिखा है लेकिन जब किसी बात पर अगर रघुनाथ की तुलना की है तो उन्होंने राम के समान सिर्फ राम को ही पाया है तथा यही लिखा भी है। रघुबर छवि के समान रघुबर छवि बनिया, आपने पढ़ा या सुना होगा, मतलब उनके समान सिर्फ वही है।

लेकिन वर्तमान में अपने आप को कुछ अधिक ही महान समझने वाले नेता और चाटुकारिता में अव्वल आने को लालायित नेता खुद को या अपने नेता को राम घोषित करने में या उनसे तुलना में कोई गुरेज नही करते है। वो यह तनिक भी विचार नही करते कि सांसारिक जीव परमेश्वर से तुलना योग्य नही होता है। लेकिन अभी चुनाव चल रहे है तो ऐसी बाते आम बात हो गई है। कोई अपने नेता के श्रीराम छवि वाले पोस्टर छपा रहा है तो कोई उन्हें राम बता रहा है। मेरठ में चुनाव प्रचार करते हुए भाजपा नेता विनीत अग्रवाल ने कमल पर वोट देने की अपील करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को भगवान श्रीराम, सीएम योगी को लक्ष्मण और केशव प्रसाद मौर्य को भरत बता दिया। माता सीता की उपमा यहां नदारद रही, यह अच्छा ही रहा।

उसी उत्तरप्रदेश की बड़ी नेता समझी जाने वाली बहनजी कुमारी मायावती ने तो हद ही कर डाली। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने सुप्रीम कोर्ट में एक अजीबोगरीब हलफनामा दिया है। अपने एफिडेविट में मायावती ने कहा है कि जब भगवान राम की मूर्ति बन सकती है तो उनकी मूर्ति क्यों नहीं लग सकती? बता दें कि लखनऊ के अंबेडकर पार्क में मायावती की मूर्तियां लगाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार किया था और उनसे जवाब मांगा था।

मायावती ने कहा कि जनभावनाओं को देखते हुए उनकी मूर्तियां अंबेडकर और कांशीराम के साथ लगाई गईं और यह कैबिनेट के फैसले के बाद हुआ था। मायावती ने दलील दी है कि अपने समाज के लिए उन्होंने शादी नहीं की और पूरी जिंदगी बहुजन मिशन के साथ जुड़ने का फैसला किया। इसी त्याग की वजह से उनकी मूर्तियां लगाना सही है। इसी के साथ बसपा प्रमुख ने अयोध्या में लगने वाली भगवान राम की मूर्ति से अपनी तुलना कर डाली। मायावती ने पूछा है कि सरकारी पैसे से 221 मीटर की भगवान राम की मूर्ति बन सकती है तो उनकी क्यों नहीं?

अब इसका जबाब कौन दे? मेरे हिसाब से तो जनता ने पिछली बार के लोकसभा चुनाव में बड़े अच्छे से दिया था। इसबार भी चुनाव के दरम्यान इस तरह का बयान कही इतिहास को फिर से न दोहरा दे, क्योकि यह जनता जो है न, उसके अंदर भी श्रीराम है, ओर जब तक राम नाम सत्य न हो जाये वो किसी का भी राम निकालने में बड़ी सक्षम होती है।

खैर हमे क्या?

कबीरा तेरी झोंपड़ी, गल कटियन के पास,

जो करेगा, सो भरेगा, तू क्यो भयो उदास।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय।