जय परशुराम


आज वैसाख शुक्ला तृतीया है। आज का दिन अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है जिसे आम बोलचाल की भाषा मे आखातीज भी कहते है।
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आज वैसाख शुक्ला तृतीया है। आज का दिन अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है जिसे आम बोलचाल की भाषा मे आखातीज भी कहते है। भारतवर्ष में इस दिन का विशेष महत्व है। इस दिन को अबूझ मुहूर्त के रूप में भी जाना जाता है, मतलब इस दिन कोई भी शुभकार्य करने के लिए किसी ज्योतिष गणनाकार से मुहूर्त नही निकलवाना पड़ता है। जैन धर्म मे भी आज के दिन का विशेष महत्व है, आज के दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव को एक वर्ष की तपस्या के उपरांत उनके पौत्र श्रेयांश ने इक्षुरस पिलाकर पारण करवाया था। तभी से ही जैन धर्मावलंबी वर्षीतप का पारण इसी दिन करते है।

आज के दिन भगवान विष्णु के तीन अवतार हुए थे। नरनारायण, हयग्रीव तथा परशुराम अवतार आज ही के दिन हुआ था। इनमें से दो अवतार लक्ष्य पर्यंत तथा एक अवतार कल्पपर्यंत है।

परशुराम अवतार त्रेता युग मे रामायण काल से पूर्व हुआ था। उन्हें विष्णु का छठा अंशावतार भी कहा जाता है। उनके पितामह महर्षि भृगु तथा पिता महर्षि जमदग्नि थे। इसी कारण उन्हें भार्गव राम तथा जामदग्न्य के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव ने इन्हें दिव्य विद्युदभि नामक परशु प्रदान किया था जिसको धारण करने के फलस्वरूप इनका नाम राम से परशुराम हो गया।

भगवान परशुराम अयाचक ब्राह्मणों में श्रेष्ठ थे तथा अपने तपोबल से उन्होंने कई दिव्य सिद्धियां प्राप्त की थी। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का तेज रामावतार तक प्राप्त था। उससे पहले उन्होंने हैहयवंश के क्षत्रियों का इक्कीस बार वध करके धरा को आततायियों से मुक्त किया था।

हैहयवंश का अधिपति कार्तवीर्यार्जुन ने भगवान दत्तात्रेय के वरदान के फलस्वरूप सहस्त्र हाथो का बल प्राप्त किया था, जिसके कारण उसे सहस्त्रार्जुन के नाम से जाना जाता था। वो तथा भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि महाराज प्रसेनजित की पुत्रियों से विवाहित थे लेकिन महर्षि के आश्रम में उन्होंने कामधेनु की नन्दिनी को देख लोभ वश महर्षि की हत्या कर दी थी। उसके पश्चात भगवान परशुराम ने सहस्त्रार्जुन से युद्ध किया तथा उसका वंश सहित संहार किया।

रामावतार के समय जब भगवान राम ने भगवान शिव के धनुष को भंग किया तब वो स्वयम्बर स्थल पर आ गए थे तथा उनके ओर लक्ष्मण के मध्य वाकयुद्ध हुआ था। फिर जब उन्हें रामावतार का ज्ञात हुआ तब अपना धनुष तथा ईश्वरीय तेज भगवान राम को प्रदान कर महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए।

उसके बाद की उनकी कथाएं द्वापर युग की है। महर्षि भारद्वाज के आग्रह पर उन्होंने द्रोणाचार्य को धनुर्विद्या की शिक्षा दिव्यास्त्रों के मंत्रों सहित दी तथा माता गंगा के आग्रह पर भीष्म को भी शस्त्र विद्या सिखाई।

सूर्यपुत्र कर्ण ने भी स्वयं के ब्राह्मण होने का झूठ बोलकर उनसे विद्या ग्रहण की थी लेकिन एक दिन प्रषंगवश उन्हें ज्ञात हो गया कि कर्ण ब्राह्मण पुत्र नही है तब उन्होंने उसे शाप दिया कि जिस समय तुम्हें इन दिव्यास्त्रों की सबसे ज्यादा जरूरत होगी, उसी समय इनके प्रयोग की विधि तुम भूल जाओगे। इसी के फलस्वरूप अर्जुन से निर्णायक युद्ध के समय कर्ण अपनी विद्या भूल गया था।इस प्रसंग की सीख हमे यह है कि झूठ बोल कर हासिल की गई शिक्षा लंबे समय तक लाभ नहीं देती है। अगर हम लंबे समय तक कामयाबी हासिल करना चाहते हैं तो ईमानदारी और सच्चाई का साथ कभी न छोड़ें।

आज उनकी जन्मजयंती पर समस्त भारतीयों को शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए धर्म के मार्ग पर सदैव चलते हुए इस यशोभूमि के यश में ओर वृद्धि की कामना करता हूँ।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय