हनुमान जन्मोत्सव विशेष


आज हनुमान जन्मोत्सव है। पौराणिक कथाओं के अनुसार आज अतुलित बल के धाम हनुमानजी का प्रागट्य हुआ था।
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नमो अंजनीनन्दनम वायुपुत्रं,

सदा मंगला कर श्रीराम दुतम।।

आज हनुमान जन्मोत्सव है। पौराणिक कथाओं के अनुसार आज अतुलित बल के धाम हनुमानजी का प्रागट्य हुआ था। लोकमान्यता के अनुसार त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हनुमानजी का प्रागट्य आंजन नाम की पहाड़ी पर हुआ था। इस धरा पर जिन सात चिरन्जीवियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं। हनुमान जी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ। हनुमान जी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं। इन्होंने जिस तरह से राम के साथ सुग्रीव की मैत्री कराई और फिर वानरों की मदद से राक्षसों का मर्दन किया, वह अत्यन्त प्रसिद्ध है।

हनुमानजी को बजरंगबली के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनका शरीर वज्र की तरह कठोर था। एक कथा के अनुसार हनुमानजी ने सूर्य को ग्रहण कर लिया था तब इन्द्र के वज्र से हनुमानजी की ठुड्डी, संस्कृत में जिसे हनु कहते है, टूट गई थी। इसलिये उनको हनुमान का नाम ब्रह्माजी द्वारा दिया गया।

पुराणो के अनुसार हनुमानजी ने कई गुरुओ से शिक्षा ग्रहण करी थी जैसे भगवान सूर्य, नारद मुनि परन्तु इनके अलावा ऋषि मातंग से भी हनुमान ने शिक्षा ग्रहण की थी। ऋषि मातंग सबरी के भी गुरु थे। ऐसा कहा जाता है कि बचपन मे मारुति बहुत नटखट थे, वो ऋषियों को अपनी बालसुलभ चंचलता से काफी परेशान करते थे। चूंकि वो बाल्यावस्था से ही अतुलित बलशाली थे ओर इसी कारण गुरुकुल के लोग उनके नटखटपन से काफी परेशान रहते थे। इसी वजह से गुरुओं ने उन्हें श्राप दे दिया कि जब तक कोई याद नही दिलाएगा तब तक आपको अपना बल याद नही आएगा। इसी वजह से वो युवावस्था तक सामान्य जन की तरह ही वो रहे।

उन्हें भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त के रूप में सारा संसार जानता है। भगवान श्रीराम को उन्होंने हर कार्य मे मदद की। अगर हम प्रभु की लीलाओं का वर्णन करे तो हनुमानजी के जिक्र बिना सब अधूरा ही रहेगा। माता सीता के हरण के बाद हनुमानजी ने भगवान श्रीराम के काज सवारने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य रहा। माता सीता की खोज करने से लेकर भगवान के राज्याभिषेक तक उनके द्वारा किये कार्य अतुलनीय है।

भगवान राम के राज्याभिषेक के पश्चात सभी वानर अपने निवास को लौट गए थे लेकिन हनुमानजी ने अपने राजा सुग्रीव से अयोध्या में ही रहने की इच्छा व्यक्त की। उनके प्रभु के प्रति प्रेम को देखते हुए सुग्रीव ने सहर्ष उन्हें स्वीकृति प्रदान की। भगवान राम ने जब तक अपनी लीला का संवरण नही किया तब तक हनुमानजी अयोध्या में रहकर उनकी सेवा में रहे। माता जानकी ने उन्हें अजर अमर होने का वरदान दिया था। उसके फलस्वरूप वो आज भी चिरंजीवी है। प्रभु की लीला संवरण के बाद वो अयोध्या से चले गए तथा जंगलों में रहकर प्रभु भक्ति में लीन हो गए।

द्वापर युग के चतुर्थ चरण में जब भगवान श्री कृष्ण का अवतार हुआ तब हनुमानजी ने महाभारत से पूर्व भीम का अतुलित बलशाली होने का घमंड चकनाचूर किया था। कथानुसार भीम जंगल मे जा रहे थे तब हनुमानजी रास्ते मे बूढ़े वानर के भेष में लेटे हुए थे। उनकी पूंछ रास्ते पर थी तो भीम ने उन्हें उसे एक तरफ करने को कहा। अपनी वृद्धावस्था का जिक्र करते हुए उन्होंने भीम से ही उठाकर उसे एक तरफ करने को कहा। अपने आपको बलवान समझने वाला भीम उसे टस से मस भी न कर सका। तब उसको लगा कि बल का कोई पार नही है। हनुमानजी ने अपने असली रूप में उसे दर्शन दिया तथा युद्ध के समय अर्जुन की सहायता के लिए उसकी ध्वजा पर विराजने का आश्वासन दिया। इसीलिए अर्जुन को कपिध्वज भी कहा जाता है।

13 वीं शताब्दी में माधवाचार्यजी, 16 वीं शताब्दी में तुलसीदासजी, 17 वीं शताब्दी में रामदासजी तथा 20 वीं शताब्दी में भाईजी पोद्दारजी यह दावा करते है की इन्हे हनुमान जी के साक्षात दर्शन हुए है। इनके अलावा भी काफी लोग है जिनको हनुमानजी ने दर्शन दिया है।
हनुमानजी के जीवन से हमे सेवा तथा समर्पण के साथ साथ प्रगाढ़ प्रभुभक्ति की शिक्षा लेनी चाहिए। इसके साथ ही गर्वरहित जीवन की शिक्षा भी उनके जीवन से मिलती है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय