चुनावी सराब: बहुत खराब


एक होती है मृगतृष्णा, जिसका कोई अस्तित्व नही होता है पर आभास होता है कि कुछ है तो सही, ओर व्यक्ति उसके पीछे भागता रहता है।
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एक होती है मृगतृष्णा, जिसका कोई अस्तित्व नही होता है पर आभास होता है कि कुछ है तो सही, ओर व्यक्ति उसके पीछे भागता रहता है, क्योकि उसे उसको प्राप्त करना होता है। उसे ही मृगमरीचिका भी कहते है। आजकल जब चुनावो का दौर चल रहा है तब नेताओ द्वारा जनता को यह गाहेबगाहे दिखाई ही जाती है और हमारी भोली जनता इसमे यकीन भी कर लेती है। अभी हाल ही में जो राहुल गांधी द्वारा आर्थिक रूप से गरीबो को न्यूनतम आय का वादा किया गया है वो हो चाहे अमित शाह जिसे चुनावी जुमला बता चुके है वो पंद्रह लाख वाली बात हो , सभी कमोबेश मृगतृष्णा ही है जो वोटर को दिखाई तो जाती है पर मिलती नही है।

कल अपनी एक चुनावी रैली में विपक्ष को घेरते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसका जिक्र कर डाला। दरअसल उत्तरप्रदेश की चुनावी गणित को सपा, बसपा ओर रालोद का गठबंधन बिगाड़ रहा है। पहले ही प्रधानमंत्री इसे महमिलावट की संज्ञा दे चुके है लेकिन वो उन्होंने सारे विपक्ष के लिए दी थी। लेकिन इस बार उन्होंने सपा, रालोद, बसपा के गठबंधन को सराब की संज्ञा प्रदान की।

मेरठ में मोदी ने महागठबंधन को लेकर कहा कि सपा का स, रालोद का र, बसपा का ब मतलब ‘सराब’। अच्छी सेहत के लिए ‘सराब’ से बचना चाहिए या नहीं बचना चाहिए? ये ‘सराब’ आपको बर्बाद कर देगी। मोदी के इस बयान पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस ने ऐतराज जताया। खैर यह तो क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है और होनी ही चाहिए। अगर परसो के अंतरिक्ष मिशन के लिए विपक्ष सवालिया निशान लगा सकता है तो इस बयान के लिए क्यो नही?

लेकिन बात खाली विरोध की ही नही रही। सपा के नेता, मतलब नेताजी के पुत्र अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री मोदी को भाषा का ज्ञान दे दिया। उन्होंने तुरंत ट्वीट करके शराब और सराब का अंतर बता दिया।

उन्होंने कहा कि आज टेलीप्रॉम्प्टर ने यह पोल खोल दी कि सराब और शराब का अंतर वह लोग नहीं जानते जो नफ़रत के नशे को बढ़ावा देते हैं। सराब को मृगतृष्णा भी कहते हैं और यह वह धुंधला सा सपना है जो भाजपा 5 साल से दिखा रही है लेकिन जो कभी हासिल नहीं होता। अब जब नया चुनाव आ गया तो वह नया सराब दिखा रहे हैं।

अब आप ही बताओ कि अपने भाषणों में भाषा पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले नरेंद्र मोदी को अगर अखिलेश यादव भाषा का अर्थ बताता है तो यह बात तो विस्मयादिबोधक तो होनी ही चाहिए। प्रधानमंत्री की भाषा पर जबरदस्त पकड़ होते हुए भी वो यहां चूक कैसे गए यह बड़ी बात नही है परन्तु तुरन्त अखिलेश यादव का जबाब देना बहुत बड़ी बात है क्योकि सराब का अर्थ तो बिना गूगल देखे शायद मेरे इस आलेख के निन्यानबे प्रतिशत पाठक भी नही जानते होंगे।

खैर इसको देखकर यह तो लगता है कि चुनाव के लिए सब कोई होमवर्क तो पूरा कर रहे है।वो भी कर रहे है जो आजतक जातिगत आधार पर जीते है और वो भी कर रहे है जिन्होंने गाहेबगाहे धर्म को भी अपना मुद्दा बना लिया। नेता चाहे जो भी करे पर भाल मेरी माँ भारती का गौरव से ऊंचा ही रहना चाहिए बस इतना सा ही निवेदन है।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय