शत नमन केशव चरण में


देश का मौजूदा भाग्य तब तक नहीं बदल सकता, जब तक लाखों नौजवान इस लक्ष्य के लिए अपना जीवन नहीं लगाते।
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देश का मौजूदा भाग्य तब तक नहीं बदल सकता, जब तक लाखों नौजवान इस लक्ष्य के लिए अपना जीवन नहीं लगाते। इसी के प्रति युवाओं की सोच को बदलना संघ का परम लक्ष्य है। यह कहने वाले डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का आज जन्मदिन है। मैं बड़े विनम्र ओर कृतज्ञ भाव से यह स्वीकार करते हुए हर्ष की अनुभूति करता हूँ कि मेरी भाषा शैली तथा मेरे वृकत्त्व में संघ का प्रभाव सर्वाधिक है जिसको मैने बाल्यावस्था से ही आत्मसात किया है। उसी संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार थे जिन्होंने एक बड़ा विजन रखकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी।

वैसे उनका जन्म आंग्ल तिथीनुसार 1 अप्रेल 1889 को हुआ था लेकिन उस दिन चूंकि वर्ष प्रतिपदा थी तो उनके सभी अनुयायी हिन्दू मतानुसार ही उनका जन्मदिन मनाते है। आज ही के दिन सभी स्वयंसेवक ध्वज से पूर्व आद्य सरसंघचालक प्रणाम करते है। डॉ साहब बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के थे और उन्हें अंग्रेज शासको से घृणा थी। इसी कारण वो अन्य सभी छात्रों से अलग थे जिसके किस्से आप सभी ने भी कमोबेश सुने ही होंगे।

1910 में मेडिकल की पढ़ाई करने कलकत्ता गए तथा वहां से वो डॉक्टर बनकर 1915 में नागपुर लौटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गये और कुछ समय में विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बन गये। 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का देश स्तरीय अधिवेशन हुआ तो डॉ साहब ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया तो तब पारित नही किया गया। 1921 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी और उन्हें एक वर्ष की जेल हुयी। तब तक वह इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी रिहाई पर उनके स्वागत के लिए आयोजित सभा को पंडित मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खा जैसे दिग्गजों ने संबोधित किया।

कांग्रेस में पुरी तन्मन्यता के साथ भागीदारी और जेल जीवन के पश्चात उन्होंने अनुभव किया कि समाज में जिस एकता के अभाव और धुंधली पड़ी देशभक्ति की भावना के कारण हम परतंत्र हुए है वह केवल कांग्रेस के जन आन्दोलन से जागृत और पुष्ट नही हो सकती। जनतन्त्र के परतंत्रता के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगाने का कार्य बेशक चलता रहे लेकिन राष्ट्र जीवन में गहरी हुयी विघटनवादी प्रवृति को दूर करने के लिए कुछ भिन्न उपाय की जरूरत है।

इसी जरूरत को पूर्ण करने तथा भारत माता को परम वैभव प्राप्त करवाने के विचार को जनमानस तक पहुंचाने के लिए उन्होंने विजयादशमी सन 1925 के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। नन्हे पौधे के रूप में स्थापित यह संघठन आज वटवृक्ष का रूप ले चुका है।

डाक्टर बालकृष्ण मुंजे और वीर सावरकर के सान्निध्य में डाक्टर हेडगेवार ने भारत की गुलामी के कारणों को बडी बारीकी से पहचाना और इसके स्थाई समाधान हेतु संघ कार्य प्रारम्भ किया। इन्होंने सदैव यही बताने का प्रयास किया कि नई चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें नये तरीकों से काम करना पड़ेगा और स्वयं को बदलना होगा, अब ये पुराने तरीके काम नहीं आएंगे। डॉ साहब 1925 से 1940 तक, यानि मृत्यु पर्यन्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। 21 जून 1940 को इनका नागपुर में निधन हुआ। इनकी समाधि रेशम बाग नागपुर में स्थित है, जहाँ इनका अंत्येष्टि संस्कार हुआ था।

कुछ लोग जो संघ को आजादी की लड़ाई से अलग बताते है उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि डॉ साहब ने स्वयं दो बार जेलवास किया था तथा सदैव वो क्रांतिकारियों का साथ देते थे। गांधीजी के अहिंसक असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलनों में उन्होंने भाग लिया था। 1928 में लाहौर में उप कप्तान सांडर्स की हत्या के बाद भगतसिंह ,राजगुरु और सुखदेव फरार हुए तो राजगुरु फरारी के दौरान नागपुर में डॉ हेडगेवार के पास पहुचे थे जिन्होंने उमरेड में एक प्रमुख संघ अधिकारी भय्या जी दाणी के निवास पर ठहरने की व्यवस्था की थी।

हम जब किसी के बारे में पूरा जानते है तभी हम उसके प्रशंसक या अनुगामी बन सकते है। लेकिन वर्तमान में बिना पूर्ण जानकारी के ही एकदूसरे के आदर्शों को नीचा दिखाने वालो की जैसे बाढ़ सी आई हुई है। उनसे सिर्फ इतना ही अनुरोध है कि पहले अध्ययन करें फिर विश्लेषण करें।

धन्य हो जीवन हमारा, अंश भी तब पा सके जो,

स्वप्न जो छोडा अधूरा, पूर्ण निश्चय हम करें वो,

राष्ट्रभक्ति को जगाने, हम बढें गिरि ग्राम वन में,

शत नमन केशव चरण में, शत नमन केशव चरण में।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय