व्यापारी फर्जी कॉल से रहें सावधान, पूरी तसल्ली करके ही ऑर्डर का माल भेजें


रघुकूल मार्केट में बकाया वसूली के लिये महिला कर्मचारियों के साथ धरना देगा जॉबवर्क करने वाला व्यापारी

सप्लायर द्वारा ब्रोकरेज चुकाने की प्रथा है, तो ग्रे खरीदने पर व्यापारी क्यों दलाली दे?

(धर्मेन्द्र मिश्रा)

सूरत। व्यापार प्रगति संघ, सूरत व्यापार एवं व्यापारी हित के लिए सदैव तत्पर है, यही कारण है कि आज संस्था के साथ  तकरीबन 25 हजार से अधिक व्यापारी जुड़ गये हैं। व्यापारी एवं व्यापार हित के लिए प्रत्येक रविवार को रामचौक स्थित शिवाजी गार्डन में सुबह 8 से 9 बजे तक एक मीटिंग आहूत की जाती है, जिसमें व्यापारी अपनी समस्या एवं सुझाव आदान-प्रदान करते हैं।

 

फर्जी कॉल से रहें सावधान

बैठक में फर्जी कॉल से धोखाधड़ी के विषय में प्रकाश डाला गया। आजकल धोखाधड़ी का नया तरीका ढूंढा गया है। जिसके तहत शरारती तत्व किसी शहर के प्रतिष्ठित कंपनी के नाम से सूरत में व्यापारी को फोन करते हैं और फोन पर ऑर्डर देकर माल ‌किसी निश्चित पते पर या किसी निश्चित आंगड़िया या बस के द्वारा डिलीवरी करने को कहते हैं। व्यापारी ऑर्डर की लालच में बगैर रेफरेन्स लिये या संबंधित प्रतिष्ठित कंपनी कन्फर्म किये बगैर माल भेज देते हैं और धोखेबाज लोग माल की डिलीवरी लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं। ऐसा ही मामला वीपीएस के ध्यान में आया। जिसमें सूरत के एक व्यापारी को बेंग्लोर से इसी प्रकार फर्जी कॉल आया। लेकिन सचेत व्यापारी ने फोन कटने के बाद बेंग्लोर की उस कंपनी को फोन मिलाकर कन्फर्म किया तो उन्हें बताया गया कि इस प्रकार के ऑर्डर का कोई फोन उनकी ओर से नहीं किया गया। जब फर्जी कॉल करने वाले को दोबारा फोन मिलाया गया तो सामने से कोई रिस्पोंस नहीं था।

 

रघुकूल मार्केट में धरने का कार्यक्रम

रविवारीय बैठक में कई व्यापारियों ने बकाया संबंधी अपनी समस्याएं वीपीएस के पंचों के सामने रखी। एक व्यापारी ने रघुकूल मार्केट में कार्यरत एक कारोबारी से जॉब वर्क के बिल के बकाया वसूली में हो रही दिक्कतों का मामला उठाया। सभा में उपस्थित व्यापारियों की सलाह से उक्त व्यापारी ने तय किया है कि वह जल्द ही अपनी कंपनी की महिला कर्मचारियों सहित थाली व बेलन लेकर प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं। वहीं एक अन्य मामले में एक व्यापारी एनटीएम मार्केट की एक पार्टी के खिलाफ दुकान के सामने बैठकर धरना देने वाले है।

वहीं एक कपड़ा व्यापारी ने दिल्ली में एक पार्टी के यहां फंसे पेमेन्ट के लिये वीपीएस के संजय जगनानी और अरविंद गाड़िया से मदद ली और इन्होंने मामले को दिल्ली के एक कपड़ा एसोसियेशन के समक्ष उठाया। दिल्ली के एसोसियेशन के आला पदाधिकारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए व्यापारी को दिल्ली बुलाकर मामले को निपटाने में मदद का आश्वासन दिया है।

एक अन्य मामले में व्यापारी के माल का सूरत के ही ट्रांसपोर्टर के साथ पैंच फंसा हुआ था। वीपीएस के प्रयासों के बाद ट्रांसपोर्टर ने पूरे नुकसान का क्लेम सेटल करने का आश्वासन दिया है।

 

पुलिस का सहयोग न मिलने की शिकायत

व्यापारी अनिल लीलानी ने पूर्व में रघुकूल मार्केट में कार्यरत एक व्यापारी के साथ चैक रिटर्न होने के मामले का जिक्र किया। १.७० लाख रुपये के इस मामले में व्यापारी ने बाकायदा अदालत में केस किया और अदालत ने सामने वाली पार्टी के खिलाफ तीन बार गैर-जमानती वारंट भी जारी किये। लेकिन अनिलभाई के अनुसार चूंकि उक्त व्यापारी का अभी कोई अता-पता नहीं है, इसलिये वारंट के बावजूद उनकी समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। सूरत की सलाबतपुरा पुलिस से भी उनको सकारात्मक सहयोग नहीं मिल रहा है।

 

कोहिनूर टेक्सटाईल मार्केट की वीपीएस के पंचों की ठीम गठित

जैसा कि पिछले कुछ हफ्तों से सूरत शहर के रिंग रोड़ स्थित विभिन्न मार्केटों के अधिक से अधिक व्यापारियों की भुगतान संबंधी समस्याओं का निदान हो सके इसके उद्देश्य से मार्केट वाईज वीपीएस के पंचों की टीम का गठन हो रहा है। इसी क्रम में कोहिनूर टेक्सटाईल मार्केट की वीपीएस कार्यकारिणी का गठन कर लिया गया जिसमें ३६ सदस्य शामिल हुए हैं।

इस प्रकार अब तक एम-२ मिलेनियम हाऊस, रघुकूल मार्केट, अभिषेक मार्केट, मिलेनियम मार्केट, तिरुपति मार्केट और कोहिनूर मार्केट में वीपीएस के पंचों की टीम बन चुकी है। शेष मार्केटों में आने वाले दिनों में बैठकों का आयोजन होगा।

 

हर मामले में व्यापारी ही क्यों पीसे?

कपड़ा व्यापारी राजीव सर्राफ ने अपनी प्रतिक्रिया जारी करते हुए कपड़ा व्यापार के हर चरण में व्यापारियों को ही बलि का बकरा बनाने के चलन पर अपना रोष प्रकट किया। उन्होंने कहा कि व्यापारियों को अपने बेचे माल का भुगतान ६० से १५० दिनों में मिलता है। भुगतान में देरी होने पर व्यापारी को कोई एक रूपया ब्याज का देता नहीं। मध्यम श्रेणी के व्यापारी वैसे ही संकट के दौर से गुजर रहे है। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत यदि वीवर की बात करें तो उसे २०-२५ दिनों में ग्रे का भुगतान हो जाता है और वह तेजी-मंदी दोनों का लाभ भी उठाता है। वीवर को कहीं नुकसान का कोई एकाऊंट ही नहीं, ना कोई माल वापसी का झंझट। लेकिन व्यापारी ही है जो हर जगह पीसा जाता है। जीएसटी लगने के बाद वीवरों ने अपना एक-तरफा निर्णय लेते हुए वटाव धारा खत्म कर दी जबकि मिल, एम्बोइडरी तथा अन्य सभी जॉब करने वाले पुराने धारे पर ही काम कर रहे हैं। राजीव कहते हैं कि जब वीवरों ने वटाव पद्धति में बदलाव किया तभी इसका विरोध होना चाहिये था। वीवर जब मरजी करके मीटिंग करके अपना फरमान लागू कर देते हैं और व्यापारी है कि कुछ कर ही नहीं पाता। व्यापारियों को ग्रे-दलालों का भी सहयोग नहीं मिलता और वे वीवरों द्वारा लिये गये निर्णय को हम पर थोपकर चले जाते हैं। इन तमाम परिस्थितियों का सामना व्यापारियों को संगठित होकर करना पड़ेगा।

इस मुद्दे पर शिव हरि जोशी कहते हैं कि व्यापारियों को ग्रे उधार में नहीं चाहिये, बल्कि वटाव से चाहिये। वीवर वटाव सहित अपना भाव दें, माल भेजें और पेमेन्ट लेकर जाएं। ऐसा व्यापारियों की कोस्टिंग निकालने के इरादे से किया जा रहा है और वीवरों का इसमें नुकसान नहीं है, जो समझने की जरूरत है।

 

व्यापारीवीवर मिल बैठकर निकालें समाधान

व्यापारी दुर्गेश टिबड़ेवाल का कहना है कि ग्रे में वटाव संबंधी समस्या का समाधान व्यापारियों और वीवरों को मिलकर निकालना चााहिये। दोनों व्यापार रूपी ट्रेन की दो पटरियां हैं। दोनों को तरक्की करने के लिए आपसी तालमेल के साथ ही चलना चाहिए। वीवर अपना पेमेन्ट फूल वटाव कटवा कर ले जाऐ। व्यापारियों को उधार में ग्रे नहीं चाहिए। वटाव मिलने से कास्टिंग निकालने से व्यापारी को नुकसान नहीं होता हैं। कुछ दुकान के ऐसे खर्चे वटाव से निकल जाते हैं जो व्यापारी फिनिश माल बेचते समय नहीं जोड़ता हैं। व्यापारी कमाई कर मजबूत बनता है ओर कम्पटिशन के इस बाजार में टिका रहता है। जो वीवर और व्यापार जगत के लिये अच्छा है। वीवरों को इस मुद्दे पर गम्भीरता से चिन्तन और चर्चा कर ग्रे मे 6 पर्सेन्ट वटाव देकर टैक्स्टाइल मार्केट को मजबूत बनाने की पहल करनी चाहिए।

 

ग्रे की दलाली चुकाने संबंधी मामला

एक ओर जहां शहर के कपड़ा बाजार में विगत कुछ दिनों से व्यापारियों द्वारा खरीदे जाने वाले ग्रे के भुगतान से संबंधित वटाव पद्धति को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है, वहीं अब विगत कुछ दिनों से ग्रे की खरीद-बिक्री के सौदे में दलाली कौन चुकाए इस मुद्दे पर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। बता दें कि कपड़ा मार्केट में व्यापारी वीवरों से ग्रे कपड़ा ब्रोकरों के माध्यम से खरीदते हैं। जीएसटी लागू होने के पहले तक वीवर द्वारा उत्पादित कपड़ा बेचने के लिये ग्रे ब्रोकरों को वीवर्स ही ब्रोकरेज देते थे। लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद से यह प्रथा बदल गई और अब व्यापारी ही ग्रे दलाल को कुल माल के मूल्य का एक प्रतिशत दलाली देने लगे हैं। पहले वटाव और ब्रोकरेज फोर प्लस वन या फाईव प्लस वन प्रतिशत तय होता था। लेकिन जीएसटी के बाद वीवरों द्वारा वटाव धारा बंद होने के बाद ब्रोकरेज भी व्यापारियों को मिलना गंद हो गया। अब व्यापारी ही ब्रोकरों को ग्रे दे रहे हैँ।

इस मसले पर धोलिसती साड़ीज के राजीव सर्राफ दो टूक कहते हैं कि जिस तरह कपड़ा व्यापारी अपने द्वारा किसी दलाल के माध्यम से बेचे गये माल पर दलाल को दलाली देते हैं, न कि ग्राहक देता है – ठीक उसी प्रकार से ग्रे बेचने वाले वीवर को ही दलाल को दलाली स्वयं देना चाहिये। एक ग्राहक के रूप में ग्रे की दलाली व्यापारी क्यों दे?

वहीं राघव सिल्क मिल्स के संजय अग्रवाल कहते हैं कि ग्रे की दलाली वीवर को ही देनी चाहिये क्योंकि हर जगह व्यापार में माल बेचने वाल ही दलाली देता है। सूरत के व्यापारियों को मिलकर इसका पूर्ण समर्थन करके वीवर को दलाली के लिये बाध्य करना चाहिये।

कैशबाजार.कॉम के संदीप गुप्ता के अनुसार वर्क में दलाली सप्लायर देता है, फिनीश में दलीली सप्लायर देजा है तो ग्रे में दलाली बायर क्यों देवे?

 

इस प्रकार देखा जा सकता है कि व्यापार प्रगति संघ के प्रयासों से सही मायनों में सूरत के व्यापारियों को लाभ हो रहा है और उनकी डूबती पूंजी फिर से वर्किंग कैपिटल बनकर व्यापार में लग रही है।

 

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व्ययापार प्रगति संघ के सदस्य बनें। यदि आपके पास कोई सुझाव हैं तो अगली रविवारीय बैठक में अवश्य दें।

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