सरकार बदलते ही इतिहास से छेड़छाड़ क्यो?


विगत कुछ दिनों से एक चर्चा बड़ी आम है, वो है राजस्थान की राज्य सरकार बदलने के बाद राजस्थान बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव।
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विगत कुछ दिनों से एक चर्चा बड़ी आम है, वो है राजस्थान की राज्य सरकार बदलने के बाद राजस्थान बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव। मैं पांच छह दिन से यह देख रहा हूँ तथा मन मे कुछ विचार भी कर रहा हूँ तो लगा कि इसे आज कलम के माध्यम से आप सभी के साथ सांझा करू।

आप सभी को ज्ञात होगा कि जैसे ही सरकार बनी तो पत्रकारों से नवनियुक्त शिक्षामंत्री गोविंद डोटासरा ने शिक्षा विभाग में ‘सब ठीक करने’ की बात कही थी। सर्किट हाउस में प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए डोटासरा ने कहा था कि भाजपा सरकार ने शिक्षा विभाग में आरएसएस की विचारधारा को थोपते हुए राजनीतिक दुर्भावना से पाठ्यक्रम में बदलाव किया है जिसे वो ठीक करेंगे।

अब उसके कुछ माह बाद ही जब नया सत्र प्रारम्भ हुआ तो राज्य सरकार ने इतिहास को भी दो तरह का कर दिया। हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार जीत को लेकर अलग अलग कक्षाओं में प्रदेश के बच्चे अब अलग अलग तथ्य पढेंगे। 7वीं कक्षा में पढ़ाया जाएगा कि इस युद्ध में महाराणा प्रताप को विजय मिली थी, जबकि 12वीं के बच्चे पढ़ेंगे कि प्रताप को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। हार जीत के यह दोनों ही तथ्य इस बार सिलेबस में नए सिरे से शामिल किए गए हैं।

इसके अलावा पिछली भाजपा सरकार ने महापुरुषों के चैप्टर से प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को ही गायब करने के साथ ही वीर सावरकर पर एक चैप्टर लिखा था, जिसमें उन्हें महान स्वतंत्रता स्वतंत्रता सेनानी बताया गया था। वीर सावरकर के जीवनी को महान क्रांतिकारी के रूप में लिखा गया था।

लेकिन जैसे ही सरकार बदली एक बार फिर से वीर सावरकर की जीवनी में जोड़ दिया गया है कि सेल्यूलर जेल में अंग्रेजों की यातनाओं से इतना तंग आ गए थे कि सावरकर ने 4 बार अंग्रेजों से माफी मांगी थी। बाद में उनके साथ काम करने के लिए तैयार भी हो गए थे। अध्याय में यह भी लिखा गया है कि उन पर साजिश रचने और नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी की हत्या करने में मदद करने का आरोप था।

हालांकि राजस्थान सरकार के शिक्षामंत्री गोविंद सिंह ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सरकार पाठ्यक्रम नहीं बनाती है, उसके लिए एक शिक्षाविदों की कमेटी होती है और शिक्षाविद् तय करते हैं कि क्या पढ़ाया जाए। सरकार पाठ्यक्रम के मामले में हस्तक्षेप नहीं करती है।

लेकिन क्या यह उचित है कि अपनी विचारधारा के अनुरूप पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिया जाए। इतिहास गवाह है महाराणा की वीरता का, वो किसी पाठ्यपुस्तक के किसी पाठ की मोहताज नही है उसकी गाथा तो जब तक सूर्य चंद्रमा रहेंगे तब तक गाई जाएगी। फिर क्यो इस प्रकार का कार्य किया जाता है। महाराणा प्रताप युद्ध जीते हो या हारे हो, उनके शौर्य के आगे सभी फीके है, मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम का उदाहरण अतुलनीय है, स्वतन्त्रता के लिए उनका त्याग अनुपम है। तो फिर यह क्यो नही पढ़ाया जाता।

वीर सावरकर के बारे में कुछ भी लिखने से पहले कोई यह क्यो नही सोचता कि दो दो उम्रकैद की सज़ा प्राप्त करने वाला इतिहास में दूसरा कौन स्वतन्त्रता सेनानी था? उनके द्वारा स्वदेश तथा विदेश की धरती पर किये गए क्रांतिकारी कार्यो को कोई क्यो भूल जाता है। केवल संघ से द्वेष होने के कारण क्या सावरकर के लिए अनर्गल लिखना उचित है?

कुलमिलाकर निष्कर्ष यही है कि छुद्र राजनीति के लिए इतिहास में बदलाव नही होना चाहिए। इतिहास उस प्रकार का पढ़ाना चाहिए जिससे बच्चे कुछ सीख ले, इस देश से प्रेम की, शौर्य की, स्वाभिमान की, आत्मगौरव की।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय