नियुक्त हुए लोकपाल: खानापूर्ति या ?


2012 से आज तक कुछ नही हुआ जबकि केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए उस लोकपाल मुद्दे को आज विराम मिला है।
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अन्ना ने जिसके लिए आंदोलन किया था लेकिन 2012 से आज तक कुछ नही हुआ जबकि केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए उस लोकपाल मुद्दे को आज विराम मिला है। बहुत मेहनत मशक्कत, हो हल्ले के बाद आखिर देश को पहला लोकपाल मिल गया। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष देश के पहले लोकपाल होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और प्रसिद्ध एडवोकेट मुकुल रोहतगी की कमेटी ने उनके नाम पर मुहर लगा दी है। घोष की नियुक्ति की फाइल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास भेज दी गई है।

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हालांकि लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने सातवीं बार लोकपाल चयन समिति की बैठक का बहिष्कार किया। उनको बैठक में विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर बुला गया था। खड़गे के मुताबिक लोकपाल चयन समिति की बैठक में ‘विशेष आमंत्रित सदस्य’ का कोई प्रावधान नहीं है, और उनको इसी कैटेगरी के तहत बैठक में शामिल होने के लिए बुलाया गया था। वैसे सांसद कम होने की वजह से कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे तकनीकी तौर पर नेता प्रतिपक्ष नहीं हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि नेता विपक्ष न होने की स्थिति में विपक्षी दल के नेता को विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर शामिल किया जाएगा। मतलब गुड़ खाएंगे लेकिन गुलगुलों से परहेज करेंगे वाली स्थिति सरकार ने कर दी, जिसको हमेशा नेता प्रतिपक्ष माना उसे चयन समिति के लिए तकनीकी कारणों से मानने के लिए इनकार कर दिया।

खैर विपक्ष के विरोध के बीच पिनाकी चंद्र घोष के नाम को फाइनल कर दिया गया है। वे देश के पहले लोकपाल होंगे। लोकपाल भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाली संस्था है। जिसकी मांग करने के लिए देश मे बहुत बड़ा आंदोलन हुआ था, इतना बड़ा की सरकार ही बदल गई और आंदोलन की एक उपज एक अर्धराज्य के मुख्यमंत्री बन गए वो भी प्रचंड बहुमत से।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि लोकपाल की मांग को लेकर देश में 2012 में जोरदार आंदोलन हुआ था। सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे, दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पुदुचेरी की उप राज्यपाल किरण बेदी, विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह, कवि कुमार विश्वास समेत कई जानी मानी-हस्तियों ने देश में लोकपाल की नियुक्ति को लेकर तत्कालीन मनमोहन सरकार के खिलाफ देश भर में विशाल राजनीतिक आंदोलन चलाया था। करीब 12 दिन चले इस आंदोलन के दौरान देश भर में जबरदस्त प्रतिसाद देखने को मिला था। तत्कालीन सरकार ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए लोकपाल गठित करने का वादा किया था, तब से लगातार लोकपाल का गठन लटका हुआ था,अब जाकर ये फैसला हुआ है। वो भी तब जब लोकसभा चुनाव सर पर है।

एक बार पहले भी मैने लिखा था कि हमारे यहां राजनैतिक पार्टीया चाहे वो पक्ष में हो या विपक्ष में, अपना हर फैसला अपनी राजनीति को चमकाने के लिए करती है और इसका उन्होंने समय समय पर उदाहरण सहित हमे देखने का मौका भी दिया है, यह अलग बात है कि पार्टी के प्रति निष्ठा के कारण हम पूरा देख नही पाते है। इसी तरह यह निर्णय भी राजनैतिक निर्णय ही सिद्ध होगा ऐसा मुझे लग रहा है। वैसे देश मे इतने चौकीदारों के होते हुए अब लोकपाल की क्या आवश्यकता है यह आप भी महसूस तो करते ही होंगे।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय